पेजेश्कियन और मीरवाइज की मुलाकात के कूटनीतिक मायने

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन की नई दिल्ली यात्रा के दौरान मीरवाइज उमर फारूक से हुई मुलाकात ने भारत की कूटनीति और कश्मीर की राजनीति को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए। किसी ईरानी राष्ट्रपति का भारत की राजधानी में कश्मीर के एक प्रमुख धार्मिक और राजनीतिक चेहरे से मिलना निश्चित रूप से सामान्य घटनाक्रम नहीं माना जा सकता है। इसके बावजूद, इस मुलाकात को केवल कश्मीर के नजरिए से देखना शायद ईरान की मौजूदा कूटनीतिक रणनीति को पूरी तरह समझने में मदद नहीं करेगा।

मीरवाइज के साथ पेजेश्कियन की मुलाकात उस कार्यक्रम के दौरान हुई जिसे भारत में ईरानी दूतावास की ओर से आयोजित किया गया था। इसमें धार्मिक नेताओं, बुद्धिजीवियों, कारोबारियों और कई अन्य प्रमुख लोगों को आमंत्रित किया गया था। यानी, यह भारत और ईरान के बीच कश्मीर को लेकर कोई औपचारिक वार्ता नहीं थी। मीरवाइज इस व्यापक संवाद का महज एक हिस्सा थे। फिर भी, उनकी मौजूदगी और ईरानी राष्ट्रपति के साथ उनकी मुलाकात का अपना राजनीतिक महत्व है, क्योंकि मीरवाइज केवल एक धार्मिक नेता नहीं हैं बल्कि कश्मीर के सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में वह लंबे समय से एक प्रभावशाली भूमिका निभाते रहे हैं।

ईरान का कश्मीर से जुड़ाव भी नया नहीं है। तेहरान ने अलग-अलग मौकों पर कई बार कश्मीर के सवाल पर अपनी चिंता व्यक्त की है और ईरानी नेतृत्व की ओर से कश्मीर का उल्लेख मुस्लिम समुदायों से जुड़े व्यापक मुद्दों के संदर्भ में होता रहा है। परिणामस्वरूप, अतीत में भारत ने ईरान की ऐसी टिप्पणियों पर अपनी असहमति भी जाहिर की है। खासकर, जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति में बदलाव के बाद इस मुद्दे पर भारत और ईरान के बीच बड़े मतभेद सामने आए थे।

लेकिन, ईरान की विदेश नीति को केवल इन बयानों के आधार पर समझना मुश्किल है। तेहरान ने कभी भी कश्मीर के सवाल को भारत के साथ अपने व्यापक संबंधों पर हावी नहीं होने दिया। इसके पीछे ठोस रणनीतिक और आर्थिक कारण हैं। भारत ईरान के लिए व्यापार, संपर्क, मध्य एशिया तक पहुंच और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण देश है। दूसरी ओर, भारत के लिए ईरान पश्चिम एशिया और मध्य एशिया तक पहुंच का महत्वपूर्ण द्वार है। चाबहार बंदरगाह इस रिश्ते की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।

पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बनाने की भारत की रणनीति में चाबहार की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसी तरह, इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर भारत को ईरान के रास्ते मध्य एशिया और यूरोप से जोड़ने की संभावनाएं पैदा करता है। इसलिए, नई दिल्ली और तेहरान के बीच रिश्ते केवल पारंपरिक मित्रता या ऊर्जा सहयोग तक सीमित नहीं हैं बल्कि इनके पीछे दीर्घकालिक भू-राजनीतिक हित जुड़े हुए हैं।

ऐसे में मीरवाइज से पेजेश्कियन की मुलाकात को भारत विरोधी संकेत के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। इसके बजाय, इसे ईरान की उस कूटनीति का हिस्सा समझा जा सकता है जिसमें वह भारत के साथ अपने सरकारी और रणनीतिक संबंधों को मजबूत रखते हुए भारतीय समाज के विभिन्न प्रभावशाली वर्गों के साथ संपर्क भी कायम रखना चाहता है। धार्मिक नेतृत्व के साथ संवाद ईरान की विदेश नीति में कोई असामान्य बात नहीं है और नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में मीरवाइज के अलावा अन्य भारतीय धार्मिक हस्तियों की मौजूदगी भी इसी ओर संकेत करती है।

हालांकि, इस मुलाकात का पाकिस्तान के लिए एक अलग महत्व है। इस्लामाबाद लंबे समय से कश्मीर को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर प्रमुख मुद्दा बनाने की कोशिश करता रहा है। ऐसे में पाकिस्तान के लिए यह दृश्य राजनीतिक रूप से उपयोगी है कि कश्मीर के एक प्रमुख धार्मिक नेता की मुलाकात किसी महत्वपूर्ण मुस्लिम देश के राष्ट्रपति से भारत की राजधानी में हुई। इससे पाकिस्तान को अपने इस तर्क को दोहराने का अवसर मिलता है कि कश्मीर केवल भारत और पाकिस्तान के बीच का मामला नहीं है बल्कि व्यापक अंतर्राष्ट्रीय चिंता का विषय है।

लेकिन, यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है। ईरान का मीरवाइज से संपर्क बनाए रखना और पाकिस्तान के कश्मीर संबंधी दृष्टिकोण का समर्थन करना दो अलग-अलग बातें हैं। उपलब्ध घटनाक्रम में ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं है कि पेजेश्कियन ने भारत के खिलाफ पाकिस्तान की स्थिति का समर्थन किया हो या ईरान ने अपनी आधिकारिक कश्मीर नीति में कोई बदलाव किया हो। केवल एक मुलाकात को ऐसी नीति का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा।

दरअसल, ईरान और पाकिस्तान के संबंध भी अपने आप में बेहद जटिल हैं। दोनों देश धार्मिक और भौगोलिक निकटता के बावजूद सीमा सुरक्षा, आतंकवाद और क्षेत्रीय प्रभाव जैसे मुद्दों पर कई बार असहज स्थिति में रहे हैं। इसके चलते, तेहरान के लिए इस्लामाबाद के साथ संबंध महत्वपूर्ण होने के बावजूद अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखना जरूरी है। भारत और पाकिस्तान के बीच संतुलन साधना भी ईरानी कूटनीति की मजबूरी है और एक अवसर भी।

पेजेश्कियन की भारत यात्रा का मुख्य केंद्र भी यही व्यापक रणनीतिक संबंध थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी बातचीत में द्विपक्षीय सहयोग के अलावा पश्चिम एशिया की स्थिति, समुद्री सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे विषयों पर चर्चा हुई। ऐसे समय में जब ईरान स्वयं गंभीर क्षेत्रीय दबावों का सामना कर रहा है और समुद्री मार्गों की सुरक्षा वैश्विक चिंता बनी हुई है, तब भारत जैसे बड़े देश के साथ संवाद तेहरान के लिए विशेष महत्व रखता है।

यहीं से मीरवाइज के साथ मुलाकात का एक दूसरा अर्थ सामने आता है। ईरान शायद यह संकेत देना चाहता है कि वह भारत के साथ अपने राजकीय संबंधों को एक स्तर पर और भारतीय मुस्लिम तथा कश्मीरी नेतृत्व के साथ संवाद को दूसरे स्तर पर देखता है। दोनों को एक दूसरे का विकल्प बनाने की जरूरत नहीं है। यही बहुस्तरीय कूटनीति ईरान को अलग-अलग पक्षों के साथ संपर्क बनाए रखने की गुंजाइश देती है।

भारत के लिए यह स्थिति पूरी तरह सहज भी नहीं हो सकती है। नई दिल्ली निश्चित रूप से यह नहीं चाहेगी कि कोई विदेशी शक्ति कश्मीर के राजनीतिक प्रश्न को फिर से अंतर्राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाने की कोशिश करे। खासकर तब, जब भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा हो कि जम्मू-कश्मीर से जुड़े मुद्दे उसके और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय विषय हैं। इसलिए, मीरवाइज के साथ पेजेश्कियन की मुलाकात भले ही औपचारिक कूटनीतिक विवाद का रूप न ले, लेकिन इसके राजनीतिक संकेतों पर भारत की नजर रहना स्वाभाविक है।

फिर भी, भारत के लिए ईरान के साथ संबंधों की व्यापक तस्वीर कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। पश्चिम एशिया में बदलते शक्ति समीकरण, ऊर्जा सुरक्षा, चाबहार, अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक संपर्क तथा समुद्री व्यापार जैसे विषय दोनों देशों को एक-दूसरे के करीब लाते हैं। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच मतभेदों के बावजूद संवाद कभी पूरी तरह बाधित नहीं हुआ है।

इस पूरी घटना का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि एक ही यात्रा में पेजेश्कियन ने भारत के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व से रणनीतिक बातचीत की और भारतीय मुस्लिम तथा कश्मीरी धार्मिक नेतृत्व से भी संवाद किया। इसे विरोधाभास की तरह देखने के बजाय ईरान की व्यावहारिक विदेश नीति के उदाहरण के रूप में देखना अधिक उचित होगा। तेहरान अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर अलग-अलग शक्ति केंद्रों से रिश्ते बनाए रखना चाहता है और किसी एक मुद्दे को पूरे द्विपक्षीय संबंधों पर हावी नहीं होने देना चाहता।

इसे यदि भारत की ओर से देखें तो भी इससे यही साबित होता है कि हमारा लोकतंत्र और हमारी व्यवस्था गहरे वैचारिक मतभेदों के बावजूद हमारे हर तबके, व्यक्ति, समुदाय और संस्थाओं को बात करने का  लोकतंत्रिक हक और मौके देता है। इसलिए, मीरवाइज और पेजेश्कियन की मुलाकात को लेकर सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि ईरान ने अचानक कश्मीर पर अपना रुख बदल लिया है या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि क्या तेहरान भविष्य में कश्मीर के मुद्दे पर अपनी सार्वजनिक भाषा को और मुखर करता है या नहीं। यदि आने वाले समय में ईरानी नेतृत्व आधिकारिक स्तर पर कश्मीर का उल्लेख बढ़ाता है या भारत की नीतियों पर प्रत्यक्ष टिप्पणी करता है, तो इस मुलाकात को व्यापक रणनीतिक संकेत के रूप में देखा जा सकता है। फिलहाल, ऐसा निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं।

मौजूदा घटनाक्रम से जो तस्वीर बनती है, उसमें ईरान भारत के साथ अपने रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देता हुआ दिखाई देता है, लेकिन साथ ही वह भारत के मुस्लिम और कश्मीरी नेतृत्व के साथ अपने संपर्क के रास्ते भी बंद नहीं करना चाहता है। पाकिस्तान इस संपर्क को अपने राजनीतिक कथ्य के लिए इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन इसे ईरान की ओर से पाकिस्तान के कश्मीर दृष्टिकोण की स्वीकृति मानना सही नहीं होगा।

पेजेश्कियन की दिल्ली यात्रा का वास्तविक संदेश शायद यही है कि ईरान बदलती वैश्विक और क्षेत्रीय परिस्थितियों में अपने विकल्प खुले रखना चाहता है। मीरवाइज से मुलाकात इसी व्यापक कूटनीतिक तस्वीर का एक हिस्सा है। इसका महत्व निश्चित रूप से है, लेकिन इसका अर्थ निकालते समय भारत-ईरान संबंधों की पूरी रणनीतिक पृष्ठभूमि को नजरअंदाज करना तस्वीर को जरूरत से ज्यादा सरल बना देगा।