'दो दीवाने सहर में': बेअसर कहानी में बेजान रोमांस…!


'दो दीवाने सहर में' हां, बिल्कुल सही लिखा है। शब्द 'सहर' है, 'शहर' नहीं। सहर का अर्थ उर्दू में 'सुबह' होता है। हालांकि, इस 'सुबह' से फिल्म का कोई लेना-देना नहीं है। अब, चूंकि फिल्म का हीरो 'श' को 'स' बोलता है, तो फिल्म के टाइटल में भी 'स' है। वैसे फिल्म की हीरोइन को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उसका हीरो 'श' को 'स' बोले या 'फ'। फिल्म के अंत तक वह अपने रिश्ते को लेकर 'फ्योर', मतलब 'स्योर', नहीं हो पाती है। निर्देशक रवि उदयवार की कारकिर्दगी भी कुछ-कुछ ऐसी ही लगती है।

जो लोग इस फिल्म को साल 1977 की फिल्म 'घरौंदा' में गुलजार के गीत 'दो दीवाने शहर में...' की 'आत्मा' से जोड़कर भ्रमित होने के चलते देखने जा रहे हों तो उन्हें यहां ऐसा कुछ नहीं मिलेगा। 'घरौंदा' में मुंबई जैसे शहर में अपने लिए घर ढूंढ रहे एक जोड़े के अनुभव की कहानी जुड़ी है। यहां बिल्कुल भी ऐसा नहीं है। हीरो का पिता पहले से ही बहुत बड़ा 'बिल्डर' है, लेकिन पटना में। अच्छी बात यह है कि फिल्म में इस गाने को बिगाड़ने की कोई कोशिश नहीं की गई है। यहां तक कि फिल्म के आखिरी क्रेडिट्स के लिए भी बिल्कुल बकवास नया गाना 'दो दीवाने सहर...' में बनाया गया है। 

Read in English: 'Do Deewane Sahar Mein': Romance without soul, Story misses the mark...

करीब 137 मिनट की रोमांटिक फिल्म देख लेने के बाद एक भी गाना याद नहीं रहता है तो लगने लगता है कि फिल्म 'घरौंदा' के मूल गाने को ही ज्यों का त्यों आखिरी क्रेडिट में चला देते तो शायद कुछ पैसे वसूल हो जाते। अभिरुचि चंद की बहुत ही नीरस सी कहानी में जब इला इरुण, अचिंत कौर, आयशा रजा, विराज गेहलानी व नवीन कौशिक कुछ सरस से संवाद बोल जाते हैं, तो थकान थोड़ी कम होती सी लगती है।

फिल्म से संजय लीला भंसाली के जुड़े रहने के चलते जब इंटरवल से ठीक पहले "कुछ रिश्तों को फुल स्टॉप लगाना जरूरी है, कॉमा लगाकर बात को आगे मत बढ़ाओ…" जैसा संवाद सुनाई पड़ता है तो उम्मीद बढ़ती है। लेकिन, इंटरवल के बाद फिर वही ढाक के तीन पात। फिल्म में हीरो सिद्धांत चतुर्वेदी व हीरोइन मृणाल ठाकुर इतने 'बेदम' लगते हैं कि कई जगह तो चौकीदार और वेटर जैसी भूमिकाएं निभा रहे कलाकार 'लाइम लाइट' उड़ा ले जाते हैं।

सिद्धांत चतुर्वेदी को 'गली बॉय' के बाद से ही कोई ढंग का काम नहीं मिला है। उनमें प्रतिभा है और उनसे अच्छे काम की दरकार है। वह खुद भी थोड़ी सजगता से फिल्मों का चयन करें तो बेहतर होगा। सिद्धांत चतुर्वेदी से ज्यादा मृणाल ठाकुर से उम्मीदें हैं। जब उनके खाते में पहले से ही कई बढ़िया फिल्में रही हैं तो क्या मजबूरी है इस तरह के प्रोजेक्ट को हाथ लगाने की। खैर, होंगी कुछ व्यक्तिगत मजबूरियां। यदि ऐसा ही है तो दर्शक सजग रहें...।



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