प्यासा भारत, सूखती नदियां; ‘डे ज़ीरो’ अब कहानी नहीं, दस्तक है…


नल खुलता है। पानी गिरता है। हम चैन की सांस लेते हैं। लेकिन ज़मीन के नीचे? सन्नाटा है। सूखी दरारें हैं। और एक डर है, जो धीरे-धीरे हमारे भविष्य को खा रहा है।

क्या हम सचमुच पानी के देश में रहते हैं? या बस एक भ्रम में जी रहे हैं? नदियों को पूजते हैं और प्रदूषण से दम घोंटते हैं! Read in English: ‘Day Zero’ isn’t a distant fear; it’s knocking at our door

भारत आज पानी के संकट की दहलीज़ पर खड़ा है। और यह कोई दूर का खतरा नहीं। यह आज का सच है। अभी का।

एक तस्वीर देखिए। जल जीवन मिशन की सफलता का जश्न मना रहे हैं। 2019 में जहाँ सिर्फ़ 17 फीसदी ग्रामीण घरों में नल था, आज 81 फीसदी से ज़्यादा घरों तक पाइप से पानी पहुंच चुका है। लगभग 15.8 करोड़ परिवार। यह उपलब्धि छोटी नहीं है। यह सरकार की इच्छाशक्ति और क्षमता का प्रमाण है।

लेकिन दूसरी तस्वीर? शहर प्यासे हैं। खेत सूख रहे हैं। और ‘डे ज़ीरो’, जब नलों में पानी आना बंद हो जाए, अब कोई दूर देश की कहानी नहीं रही। बेंगलुरु। चेन्नई। दिल्ली। हैदराबाद। चेतावनी हैं।

नीति आयोग साफ़ कहता है: 2030 तक पानी की मांग, उपलब्धता से आगे निकल जाएगी। 82 करोड़ लोग संकट में होंगे। 2050 तक प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता घटकर 1,140 क्यूबिक मीटर रह जाएगी।

यह ‘एब्सोल्यूट स्कैरसिटी’ की सीमा है। और इसका असर? अर्थव्यवस्था पर छह फीसदी तक की चोट।

शहर क्या कर रहे हैं? भाग-दौड़। तात्कालिक इलाज। कहीं पाइपलाइन, कहीं टैंकर, कहीं समुद्र के पानी को मीठा बनाने की योजनाएं। लेकिन, असली कहानी ज़मीन के नीचे लिखी जा रही है।

भूजल, हमारा सबसे बड़ा, सबसे चुप साथी, सबसे ज़्यादा शोषित है। जल शक्ति मंत्रालय की 2025 की रिपोर्ट कहती है कि ओवर-एक्सप्लॉइटेड यूनिट्स 17 फीसदी से घटकर 10.8 फीसदी हो गईं।

सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन, आधी सच्चाई, पूरी झूठ के बराबर होती है। देश के 730 क्षेत्र अब भी ‘रेड ज़ोन’ में हैं। भारत हर साल 247 बिलियन क्यूबिक मीटर भूजल निकाल रहा है। सुरक्षित सीमा? उससे बहुत कम। कुल दोहन 60 फीसदी से ऊपर।

कुछ राज्य तो सीमाएं तोड़ चुके हैं। पंजाब 156 फीसदी पानी खींच रहा है।राजस्थान 147 फीसदी। हरियाणा, कर्नाटक, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, कहानी एक ही है।

यह वैसा ही है जैसे कोई बैंक से अपनी जमापूंजी ही निकालता जाए। न ब्याज, न संतुलन। बस खाली खाता है।

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं: अगर एक्वीफर ‘टिपिंग पॉइंट’ पार कर गया, तो वापसी लगभग नामुमकिन होगी।

ऊपर से मौसम का खेल। जलवायु परिवर्तन ने आग में घी डाल दिया है। तापमान बढ़ रहा है। पानी तेजी से उड़ रहा है। मानसून अब भरोसेमंद नहीं रहा है। कभी बाढ़। कभी सूखा। रीचार्ज की लय टूट चुकी है। और शहर? उन्होंने अपने ‘स्पंज’ खुद नष्ट कर दिए। तालाब। झीलें। वेटलैंड्स। कभी ये शहरों की सांस थे।

बेंगलुरु ने 1973 से 2016 के बीच 79 फीसदी जल निकाय खो दिए। पंजाब ने अपने आधे जल स्रोत गंवा दिए। कंक्रीट और खेती के नाम पर। ये जलाशय सिर्फ़ सुंदरता नहीं थे। ये भूजल को रिचार्ज करते थे। बाढ़ रोकते थे। पानी साफ़ करते थे। शहर को ठंडा रखते थे। हमने उन्हें मिटा दिया। और अब टैंकरों के पीछे भाग रहे हैं।

अप्रैल 2026 है। गर्मी अभी शुरू ही हुई है। फिर भी 166 बड़े जलाशयों में सिर्फ़ 56.7 फीसदी पानी बचा है। दक्षिण और मध्य भारत में कई डैम आधे से भी कम भरे हैं।

मतलब साफ़ है। गर्मी आते ही संकट गहराएगा। किसान परेशान होंगे। फसलें झुलसेंगी। फैक्ट्रियां उत्पादन घटाएंगी। और शहरों में पानी के लिए लाइनें लगेंगी।

पानी का संकट सिर्फ़ प्यास नहीं लाता। यह भूख भी लाता है। भारत दुनिया की 18 फीसदी आबादी को खिलाता है। लेकिन उसके पास सिर्फ़ चार फीसदी जल संसाधन हैं। यह संतुलन पहले ही नाजुक था।

अब टूटने के कगार पर है। अनुमान डराने लगे हैं। तापमान बढ़ने से गेहूं उत्पादन 50 फीसदी तक गिर सकता है।चावल 40 फीसदी तक। सोचिए। पानी नहीं, तो सिंचाई नहीं।

सिंचाई नहीं, तो अनाज नहीं। और अनाज नहीं, तो महंगाई, भूख, कुपोषण। स्वास्थ्य का संकट अलग है।

भारत का लगभग 70 फीसदी भूजल प्रदूषित है: आर्सेनिक, फ्लोराइड और बैक्टीरिया से।

डायरिया, हैजा, टाइफॉइड; हर साल लाखों लोग बीमार पड़ते हैं। हजारों जानें जाती हैं। यानी जो पानी है, वह भी सुरक्षित नहीं है।

तो रास्ता क्या है? क्या बारिश हमें बचा सकती है? हां, अगर हम उसे नारा नहीं, नीति बनाएं।

रेनवॉटर हार्वेस्टिंग। रूफटॉप सिस्टम। रीचार्ज पिट्स। पुराने कुएं, बावड़ियां, तालाबों का पुनर्जीवन।

चेन्नई ने रास्ता दिखाया है। कानून बना। लागू हुआ। असर भी दिखा। अब ज़रूरत है इसे हर शहर में लागू करने की। हर नई बिल्डिंग में अनिवार्य। पुरानी इमारतों में रेट्रोफिटिंग।

साथ ही झीलों और वेटलैंड्स की रक्षा। भूजल दोहन पर सख्त नियंत्रण। यह आसान नहीं है।

लेकिन नामुमकिन भी नहीं। तस्वीर साफ़ है। भूजल घट रहा है। जलाशय दबाव में हैं। झीलें गायब हैं। मौसम अनिश्चित है और खाद्य सुरक्षा खतरे में है। चेतावनियां नई नहीं हैं।

रिपोर्ट्स सालों से आ रही हैं। फर्क सिर्फ इतना है, अब समय कम बचा है।

तो सवाल सीधा है। क्या हमारे पास इच्छाशक्ति है?

सरकारों को प्राथमिकताएं बदलनी होंगी। शहरों को ज़मीन के नीचे झांकना होगा। कानून बनाना नहीं, लागू करना होगा।

और हम? हमें पानी को ‘अनलिमिटेड’ समझना बंद करना होगा। नल में बहता पानी अनंत नहीं है।

जल जीवन मिशन ने दिखाया, इरादा हो तो बदलाव संभव है।

अब समय है एक शहरी जल क्रांति का। वरना ‘डे ज़ीरो’ कोई हेडलाइन नहीं रहेगा। यह हमारी दिनचर्या बन जाएगा। पानी सिर्फ़ संसाधन नहीं है।यह सभ्यता की नब्ज़ है।

इसे बचाइए। इसे बहने दीजिए। वरना आने वाली पीढ़ियां पूछेंगी कि नदियां कहां गईं? और हमारे पास कोई जवाब नहीं होगा।



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