नदियों के पानी की लहरों में छिपा है यूरोप का दिल!

यूरोप की मेरी हाल की यात्रा को अगर एक शब्द में बांधना हो, तो वह शब्द होगा, ‘पानी’। मैंने वहां आधा दर्जन से ज़्यादा नदियां, नहरें और झीलें नज़दीक से देखीं। कभी क्रूज़ पर बैठकर, कभी फेरी में, कभी पुल से झांककर और कभी किनारे बैठकर। नाविकों, फेरीवालों, क्रूज़ मैनेजरों और गोंडोला चलाने वालों से बातें कीं। किनारे बैठे आम लोग भी देखे, जो दोपहर की सुनहरी धूप में नदी को निहार रहे थे, बातें कर रहे थे या बस ज़िंदगी को थोड़ी देर आराम दे रहे थे। धीरे-धीरे एक बात दिल में उतर गई कि नदी सिर्फ पानी से ज़िंदा नहीं रहती है बल्कि नदी तब ज़िंदा रहती है, जब लोग उससे प्यार करते हैं।

लंदन की टेम्स ने सबसे पहले नज़र खींची। क्रूज़ पर बैठते ही लगा जैसे लंदन अपनी पूरी कहानी नदी के सामने खोल रहा हो। संसद भवन, पुरानी इमारतें, पुल, म्यूज़ियम, लंदन आई और चमकता आधुनिक शहर एक-एक करके सामने आते गए। किनारे लोग टहल रहे थे, फेरी दौड़ रही थीं, पर्यटक तस्वीरें खींच रहे थे और कुछ चुपचाप पानी की लहरों में खोए हुए थे। टेम्स सिर्फ नदी नहीं थी। वह लंदन की सड़क भी थी, सैरगाह भी, इतिहास की खुली किताब भी और शहर का आंगन भी।

फिर पेरिस की सीन नदी आई। अगर टेम्स लंदन का दरवाज़ा है, तो सीन पेरिस का आईना है। क्रूज़ पर बैठकर पेरिस को पानी से देखना अपने आप में एक जादू था। एफिल टावर की ऊंचाई से नीचे नदी को निहारना एक अद्भुत अनुभव था। पुलों के नीचे से नाव निकलती और अगले ही पल कोई शानदार इमारत, म्यूज़ियम या ऐतिहासिक स्मारक सामने आ जाता। किनारे लोग घूम रहे थे, बैठे थे, हंस-बोल रहे थे।  पेरिस ने नदी को शहर के पीछे नहीं धकेला। उसने नदी को बीचों-बीच जगह दी है। सीन सिर्फ बहती नहीं बल्कि पेरिस उसके साथ जीता है।

एम्स्टर्डम की नहरों ने कहानी को नया रंग दिया। यहां पानी कोई रुकावट नहीं, पानी ही राह है। छोटी-बड़ी नावें नहरों में तैरती रहती हैं। पुल एक-दूसरे को जोड़ते हैं। पुराने मकान पानी की ओर झुके लगते हैं। लोग किनारे बैठते हैं और पर्यटक नावों से शहर देखते हैं। डच लोगों ने पानी से एक प्यारा सा समझौता कर लिया है। पानी को हराने की बजाय उसके साथ रहना सीख लिया। नहरें यहां परिवहन भी हैं, सैर भी, इतिहास भी और दिल का सुकून भी।

वेनिस में तो बात ही अलग थी। यहां सड़क से ज़्यादा पानी दिखता है। गोंडोला, नावें और जल-टैक्सियां रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा हैं। गोंडोला चलाने वाला सिर्फ नाविक नहीं लगता; वह चलता-फिरता कहानीकार लगता है। महलों और पुरानी इमारतों के बीच से गोंडोला गुज़रता है तो लगता है इतिहास अभी भी सांस ले रहा है। वेनिस ने एक बड़ी बात सिखाई, कभी-कभी प्रकृति को जीतने से बेहतर होता है, उसके साथ जीना सीखना।

हायर एडुकेशन के लिए प्रख्यात, जर्मनी के हीडलबर्ग शहर में नेकर नदी का अपना जादू था। ऊपर पहाड़ी पर पुराना किला और नीचे बहती नदी। आसपास पुराने पुल, इमारतें और हरी-भरी वादियां। नाव पर बैठकर शहर देखना ऐसा लगा जैसे कोई पुरानी किताब धीरे-धीरे खुल रही हो। यही नदी-यात्रा का असली जादू है; आप शहर को नहीं देखते बल्कि शहर खुद आपके सामने आ जाता है।

राइन ने यूरोप का दूसरा चेहरा दिखाया। यह सिर्फ सुंदर नहीं, व्यापार और आवागमन की बड़ी धुरी भी रही है। मालवाहक जहाज़, पर्यटक क्रूज़ और किनारे के कस्बे, किले और पुरानी इमारतें नदी की कहानी को और गहरा बना देते हैं। यहां समझ आया कि यूरोप की नदियां सिर्फ सजावट नहीं हैं। वे शहरों की आर्थिक और सांस्कृतिक ज़िंदगी की रेखा हैं।

फ्लोरेंस में आर्नो नदी ने अलग रंग दिखाया। मशहूर पोंटे वेक्कियो के नीचे बहती आर्नो और आसपास की पुरानी इमारतें ऐसी लगती हैं जैसे पूरा शहर नदी में अपना अतीत देख रहा हो। यहां नदी कला, संस्कृति और इतिहास से जुड़ी हुई है। 

फिर आल्प्स की 'इन' नदी आई, जो ऑस्ट्रिया के इंसब्रुक जैसे शहरों से गुज़रती है। पहाड़ों के बीच बहती यह नदी दूर से चांदी की चमकती लकीर जैसी लगती है। आसपास की खूबसूरती इतनी भव्य है कि नदी खुद भी उस नज़ारे की धड़कन बन जाती है। यहां नदी व्यापार से ज़्यादा प्रकृति और ज़िंदगी का अहसास कराती है।

स्विट्ज़रलैंड के इंटरलाकेन में थून और ब्रिएंज की विशाल झीलों ने दिल मोह लिया। चारों तरफ आल्प्स के पहाड़ और उनके बीच फैला नीला-शांत पानी। ऐसा लगा जैसे पहाड़ों ने अपने सामने दो बड़े आईने रख दिए हों। कोई शोर नहीं, बस पानी, पहाड़, हवा और दूर तक फैली हरियाली। 

कभी-कभी यात्रा में ऐसे नज़ारे मिलते हैं जहां कैमरा भी बेबस हो जाता है। आंख तस्वीर ले लेती है और दिल उसे हमेशा के लिए रख लेता है। इन सैरों के दौरान एक बात बार-बार दिल में घूमती रही। यूरोप की नदियों के किनारे आमतौर पर गंदगी और प्लास्टिक के ढेर नहीं दिखे। लोग या मवेशी नदी में नहाते नहीं दिखे। हां, बतखें और पक्षी पानी में मस्ती करते ज़रूर दिखे। 

कई जगह मज़बूत तटबंध हैं, पत्थर-टाइलों के रास्ते हैं, चौड़े पैदल मार्ग हैं, लॉन हैं, फूलों की झाड़ियां हैं और सुंदर बुलेवार्ड हैं। और सबसे खास बात — नदी के किनारे ज़िंदगी है। संगीत, थिएटर, नावें, फेरी, रेस्तरां, म्यूज़ियम, पर्यटन और सामुदायिक कार्यक्रम। लोग नदी के पास आते हैं और उसे अपना मानते हैं। 

नाविकों और क्रूज़ वालों से बातचीत में यही बात महसूस हुई। नदी तभी सुरक्षित रहती है जब लोग उसके पास आते हैं। लोग आएंगे तो देखेंगे, देखेंगे तो चिंता करेंगे, चिंता करेंगे तो सवाल पूछेंगे और सवाल पूछेंगे तो सरकारों को भी जवाब देना पड़ेगा।

इन यूरोपीय नदियों के बीच अचानक वर्षों पुरानी एक यात्रा याद आ गई। काहिरा की नील नदी पर क्रूज़। पानी पर चलती नाव, आसपास का शहर, शाम का माहौल और नदी से दिखाई देता काहिरा। नील ने भी वही अहसास दिया था कि नदी किसी शहर की रूह बन सकती है।

लेकिन, यूरोप की इन खूबसूरत नदियों के बीच मेरी नज़र बार-बार यमुना पर जाकर ठहर जाती। आगरा की यमुना; वही नदी जिसके किनारे ताज महल खड़ा है, वही नदी जिसने सदियों से आगरा का इतिहास देखा है। आज हम नदी को देखते हैं तो अक्सर पानी से ज़्यादा गंदगी, प्लास्टिक, कूड़ा, दुर्गंध और उपेक्षा दिखती है। सवाल यह है, क्या नदी को सिर्फ सफाई अभियान और सरकारी योजनाओं से बचाया जा सकता है? 

यूरोप से जवाब कुछ अलग मिला। नदी को पहले लोगों की ज़िंदगी में वापस लाना होगा। यमुना के किनारे साफ-सुथरे पैदल मार्ग हों, सुरक्षित घाट हों, हरियाली हो, फूल हों, नावें चलें, जहां संभव हो मछली पकड़ने की अनुमति हो, संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम हों, स्थानीय समुदाय जुड़े और बच्चे नदी को करीब से देखें। नदी किनारे शाम की रौनक हो। लोग वहां बैठें और कहें, “चलो, आज यमुना किनारे चलते हैं।” बस यही एक वाक्य नदी को बदल सकता है।

यूरोप की यात्रा से लौटकर एक बात और साफ हो गई। नदी को सिर्फ पानी की धारा समझना भूल है। नदी अर्थव्यवस्था है, संस्कृति है, इतिहास है, पर्यटन है, मनोरंजन है और स्मृति है। और, सबसे बढ़कर, नदी लोगों को जोड़ने वाली जगह है। दुर्भाग्य से, आगरा में यमुना को नाला बनाकर छोड़ दिया है।

यूरोप की नदियों ने अपने शहरों को पहचान दी है। उन्होंने शहरों को पैसा भी दिया, पर्यटन भी दिया और इतिहास को ज़िंदा रखने का मंच भी दिया। ,तो फिर आगरा की यमुना क्यों नहीं? क्यों न यमुना को आगरा का सबसे बड़ा खुला सांस्कृतिक मंच बनाया जाए? क्यों न नदी के किनारे शाम को संगीत बजे, बच्चे खेलें, बुज़ुर्ग बैठें, पर्यटक नौका में शहर देखें और स्थानीय लोग गर्व से कहें कि यह हमारी नदी है? 

नदी को बचाने का सबसे आसान रास्ता शायद यही है कि लोगों को नदी से फिर प्यार करा दीजिए। नदियां सिर्फ शहरों से होकर नहीं गुज़रतीं, बल्कि जब शहर उनकी कद्र करते हैं, तो नदियां उन शहरों को रूह दे देती हैं।