राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस ने महात्मा गांधी की हत्या क्यों की और इस संगठन पर लगातार प्रतिबंध क्यों लगते रहे? साथ ही, प्रतिबंध उतनी ही बार 'हटते' भी क्यों रहे? इमरजेंसी के दौरान आरएसएस ने इंदिरा गांधी को चिट्ठियां क्यों लिखीं? आरएसएस ने बाबरी मस्जिद क्यों गिराई? आरएसएस द्वारा किए जाने वाले सेवा कार्यों का क्या सबूत है? केरल और पश्चिम बंगाल में आरएसएस ने स्वयं को 'पीड़ित' दिखाने के लिए ख़ुद अपने स्वयंसेवकों की हत्या क्यों कराई? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अक्सर पूछे जाने वाले इन पांच सवालों के जवाब फिल्म 'आखिरी सवाल' में देने की कोशिश की गई है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारतीय राजनीति और समाज का शायद सबसे अधिक प्रभावशाली और साथ ही सबसे अधिक विवादित सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन रहा है। संघ को लेकर एक वर्ग के पास उसके राष्ट्रवाद, अनुशासन, सेवा और संगठन क्षमता की कहानियां हैं, तो दूसरे वर्ग के पास सांप्रदायिकता, राजनीतिक प्रभाव, अल्पसंख्यकों के प्रति दृष्टिकोण और हिंसक राजनीति से जुड़े सवाल हैं। यही वजह है कि आरएसएस को समझना केवल उसके समर्थकों या विरोधियों के नजरिये से संभव नहीं है। इसी जटिलता को बड़े पर्दे पर सामने लाने की कोशिश यह फिल्म करती है।
फिल्म को लेकर सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह केवल आरएसएस की आलोचना या प्रशंसा करने के बजाय कुछ ऐसे सवाल सामने रखती है, जिनके जवाब जानने के लिए दर्शकों को इतिहास की ओर लौटना पड़ता है। लेकिन, यहां एक सावधानी जरूरी है। फिल्म में प्रस्तुत निष्कर्षों को ऐतिहासिक तथ्य मान लेने के बजाय उन्हें एक व्याख्या के रूप में देख जाना चाहिए। क्योंकि, इनमें से कई प्रश्नों पर राजनीतिक और ऐतिहासिक बहस लगातार जारी है।

सबसे पुराना और गंभीर सवाल यह है कि क्या आरएसएस ने महात्मा गांधी की हत्या की थी? महात्मा गांधी की हत्या 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने की थी। हत्या के तुरंत बाद सरकार ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया। संघ के तत्कालीन सरसंघचालक एमएस गोलवलकर को भी गिरफ्तार किया गया और सरकार ने संघ को 'प्रतिबंधित संगठन' घोषित किया। आरएसएस के अपने ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार 4 फरवरी 1948 को प्रतिबंध लगाया गया और बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों को गिरफ्तार किया गया।
गांधी हत्या के मुकदमे में नाथूराम गोडसे को दोषी ठहराया गया और उसे फांसी दी गई। बाद में गांधी हत्या की साजिश की जांच के लिए बने कपूर आयोग ने भी आरएसएस को संगठन के रूप में गांधी हत्या का जिम्मेदार नहीं ठहराया। आयोग की रिपोर्ट भारत सरकार के गृह मंत्रालय की आधिकारिक सामग्री के रूप में संसद के डिजिटल अभिलेख में उपलब्ध है।
साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट में गांधी हत्या से संबंधित पुनः जांच की मांग वाली याचिका के दौरान नियुक्त न्यायमित्र ने भी अदालत को बताया था कि नाथूराम गोडसे के अलावा किसी दूसरे व्यक्ति की मौजूदगी या किसी रहस्यमय दूसरे शूटर के संबंध में पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं। इसलिए, यह कहना ऐतिहासिक रूप से अधिक सटीक होगा कि गांधी की हत्या के लिए आरएसएस को संगठन के रूप में दोषी ठहराने का निर्णायक न्यायिक प्रमाण मौजूद नहीं है। दूसरी ओर, गोडसे के आरएसएस से पुराने संबंध, हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों के बीच उस समय के वैचारिक संबंध और गांधी के प्रति कट्टरपंथी हिंदू राजनीति के एक हिस्से की शत्रुता, ऐसे विषय हैं जिन पर इतिहासकारों ने लंबे समय से बहस की है।
यानी सवाल समाप्त नहीं होता है, बल्कि उसका स्वरूप बदल जाता है। प्रश्न यह नहीं रह जाता कि “आरएसएस ने गांधी को गोली मारी?”, बल्कि यह बनता है कि 1940 के दशक की हिंदू राष्ट्रवादी राजनीति और गांधी-विरोधी वातावरण में संघ और उससे जुड़े व्यक्तियों की वास्तविक वैचारिक तथा संगठनात्मक भूमिका क्या थी।
फिर आरएसएस पर प्रतिबंध क्यों लगा? यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। गांधी की हत्या के बाद देश का राजनीतिक वातावरण अत्यंत तनावपूर्ण था। सरकार ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगाते समय उसके ऊपर ऐसी गतिविधियों और वातावरण को बढ़ावा देने के आरोप लगाए जिन्हें वह सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानती थी।
आरएसएस का अपना इतिहास इस बात को स्वीकार करता है कि गांधी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगाया गया था, लेकिन वह इस प्रतिबंध को गांधी हत्या में अपनी संगठनात्मक भूमिका का प्रमाण नहीं मानता है। संघ के अनुसार बाद में बातचीत और सत्याग्रह के बाद 12 जुलाई 1949 को प्रतिबंध हटा लिया गया और इसी दौर में संघ का लिखित संविधान भी सामने आया।
इस घटना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि प्रतिबंध हटाने के लिए आरएसएस को अपने संगठनात्मक ढांचे को अधिक स्पष्ट और औपचारिक रूप देने की दिशा में भी जाना पड़ा। इसलिए, 1948-49 का दौर केवल गांधी हत्या के बाद का राजनीतिक संकट नहीं था, बल्कि संघ और नवस्वतंत्र भारतीय राज्य के बीच संबंधों को परिभाषित करने वाला निर्णायक दौर भी था।
आरएसएस से पूछे जाने वाला एक और चिर-परिचित सवाल यह है कि आपातकाल के दौरान संघ ने इंदिरा गांधी को चिट्ठियां क्यों लिखीं? ध्यान रहे, 25 जून 1975 को इंदिरा गांधी सरकार ने देश में आपातकाल लागू किया। राजनीतिक विरोधियों की गिरफ्तारी, प्रेस पर सेंसरशिप और नागरिक स्वतंत्रताओं पर अंकुश के कारण यह भारतीय लोकतंत्र का सबसे विवादास्पद दौर बना। इस दौरान, आरएसएस पर भी प्रतिबंध लगाया गया और उसके अनेक कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए।
इसी अवधि में, तत्कालीन सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ही नहीं, बल्कि उनके उत्तराधिकारी बालासाहब देवरस भी जेल में थे। उन्होंने इंदिरा गांधी को पत्र लिखे। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार अगस्त 1975 के पत्र में उन्होंने इंदिरा गांधी के स्वतंत्रता दिवस के भाषण की प्रशंसा की और आरएसएस के खिलाफ लगाए गए आरोपों को खारिज करते हुए प्रतिबंध हटाने की अपील की। नवंबर 1975 के एक अन्य पत्र में उन्होंने आरएसएस को जेपी आंदोलन, गुजरात आंदोलन और बिहार आंदोलन से जोड़ने का विरोध किया। यही वह जगह है जहां आरएसएस के इतिहास का एक विरोधाभास सामने आता है।
एक तरफ संघ के हजारों कार्यकर्ताओं ने आपातकाल के विरोध में भूमिगत गतिविधियों और लोकतांत्रिक प्रतिरोध में भाग लिया। दूसरी तरफ, संघ नेतृत्व ने सरकार के साथ संवाद और प्रतिबंध हटाने के लिए पत्राचार भी किया। इसलिए, इन पत्रों को केवल ‘इंदिरा गांधी के सामने आत्मसमर्पण’ या केवल ‘रणनीतिक संवाद’ कह देना इतिहास को बहुत सरल बना देना होगा।
राजनीतिक संगठनों के लिए दमनकारी परिस्थितियों में दो समानांतर रणनीतियां अपनाना असामान्य नहीं है। एक ओर प्रतिरोध और दूसरी ओर बातचीत। आरएसएस के मामले में भी यही दोहरा व्यवहार दिखाई देता है।
बाबरी मस्जिद विध्वंस में आरएसएस की भूमिका भी एक चर्चित मुद्दा रहा है। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी ढांचा गिरा दिया गया। यह घटना स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े राजनीतिक और सामाजिक विभाजनों में से एक का कारण बनी।
यहां आरएसएस की भूमिका को लेकर भी दो बिल्कुल अलग दावे हैं। संघ का पक्ष लंबे समय तक यह रहा कि मस्जिद का विध्वंस किसी पूर्व नियोजित संगठनात्मक योजना का परिणाम नहीं था, बल्कि अयोध्या में जमा हुए लोगों के आक्रोश और घटनाओं के नियंत्रण से बाहर चले जाने का परिणाम था।
दूसरी ओर, बाबरी विध्वंस की जांच करने वाले लिब्रहान आयोग ने आरएसएस और व्यापक संघ परिवार की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए। आयोग ने अयोध्या आंदोलन को संघ परिवार की दीर्घकालीन राजनीतिक परियोजना के रूप में देखा और उसकी संगठनात्मक क्षमता को विध्वंस की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण माना। इसलिए, बाबरी मस्जिद को लेकर “आरएसएस ने अकेले मस्जिद गिराई” कहना भी अतिसरलीकरण होगा और “आरएसएस का इससे कोई संबंध नहीं था” कहना भी उपलब्ध ऐतिहासिक रिकॉर्ड के साथ सहजता से नहीं बैठता है।
असल तस्वीर कहीं अधिक जटिल है। आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, भाजपा और दूसरे संगठनों के बीच वैचारिक और संगठनात्मक रिश्ते थे। अयोध्या आंदोलन में इन सभी की अलग-अलग भूमिकाएं थीं। लिब्रहान आयोग ने इसी व्यापक नेटवर्क को ‘संघ परिवार’ के रूप में देखा था।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आयोग की रिपोर्ट एक जांच आयोग की रिपोर्ट थी, कोई आपराधिक अदालत का फैसला नहीं। इसलिए, उसके निष्कर्षों और आपराधिक दोषसिद्धि को एक ही चीज मानना कानूनी रूप से सही नहीं होगा।
आरएसएस द्वारा लंबे समय से किए जा रहे कई तरह के सेवा कार्यों के प्रमाणों पर भी आलोचकों और समर्थकों के बीच सबसे अधिक असहमति दिखाई देती है। आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों का दावा है कि उनका एक बड़ा हिस्सा शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, स्वावलंबन, आपदा राहत और सामाजिक जागरण जैसी सामाजिक सेवाओं में लगा हुआ है। इस दावे को केवल 'संघ का प्रचार' कहकर खारिज करना उचित नहीं होगा, क्योंकि सेवा कार्यों के संबंध में संगठन और उससे जुड़े संस्थानों द्वारा वार्षिक रिपोर्टें प्रकाशित की जाती हैं।
आरएसएस की 2024-25 की एक रिपोर्ट के अनुसार सेवा भारती से जुड़े स्वयंसेवकों ने 89,706 सेवा गतिविधियों में भाग लिया, जिनमें शिक्षा, चिकित्सा, सामाजिक जागरण और स्वावलंबन से संबंधित कार्यक्रम शामिल थे। आरएसएस ने 2025 में भी अपने सेवा विभाग के माध्यम से हजारों गतिविधियों और शिक्षा एवं स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रमों के आंकड़े जारी किए हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि संगठन द्वारा बताए गए हर आंकड़े स्वतंत्र रूप से सत्यापित आंकड़े हैं। लेकिन, यह जरूर बताता है कि आरएसएस का सेवा नेटवर्क केवल एक काल्पनिक दावा नहीं है। देश के अनेक हिस्सों में संघ से जुड़े संगठनों द्वारा वास्तविक सामाजिक गतिविधियां संचालित की जाती रही हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण वैचारिक सवाल फिर भी बचा रहता है कि क्या सामाजिक सेवा और राजनीतिक विचारधारा को अलग-अलग देखा जा सकता है? आरएसएस के समर्थक कहते हैं कि सेवा राष्ट्र निर्माण का माध्यम है। आलोचक पूछते हैं कि क्या सेवा गतिविधियों के माध्यम से वैचारिक विस्तार भी होता है। यही बहस आरएसएस को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
क्या केरल और पश्चिम बंगाल में आरएसएस ने अपने ही स्वयंसेवकों की हत्या कराई? इस प्रश्न को सबसे ज्यादा सावधानी से देखने की जरूरत है। केरल, विशेषकर कन्नूर, में आरएसएस और सीपीआई(एम) के बीच दशकों से राजनीतिक हिंसा का खूनी इतिहास रहा है।
उपलब्ध पुलिस और न्यायिक रिकॉर्ड पर किए गए एक विस्तृत अध्ययन में पाया गया था कि 1995 के बाद कन्नूर में राजनीतिक हत्याओं के मामलों में आरएसएस या भाजपा और सीपीआई(एम), दोनों पक्षों के लोग मारे गए। जांच में दोनों पक्षों के बीच हिंसा के चक्र और न्यायिक प्रक्रिया की गंभीर कमियों की ओर भी संकेत किया गया। इसलिए यह कहना कि “आरएसएस ने खुद अपने स्वयंसेवकों की हत्या कराई ताकि वह पीड़ित दिख सके”, एक बहुत गंभीर आरोप है। इसके लिए ठोस आपराधिक जांच, दस्तावेजी साक्ष्य या अदालत के निष्कर्ष की जरूरत होगी। उपलब्ध विश्वसनीय स्रोतों में ऐसा कोई व्यापक प्रमाण सामने नहीं आता जिससे इस दावे को स्थापित तथ्य की तरह लिखा जा सके।
बल्कि, उपलब्ध रिकॉर्ड राजनीतिक हिंसा की तस्वीर को कहीं अधिक उलझा हुआ बताते हैं। कई मामलों में आरएसएस कार्यकर्ताओं की हत्या के आरोप सीपीआई(एम) कार्यकर्ताओं पर लगे, तो दूसरी ओर सीपीआई(एम) कार्यकर्ताओं ने भी आरएसएस या भाजपा से जुड़े लोगों पर हत्या के गंभीर आरोप लगाए हैं।
पश्चिम बंगाल में भी राजनीतिक हिंसा के कई दौर रहे हैं, लेकिन “आरएसएस ने अपने ही लोगों को मरवाया” जैसी व्यापक साजिश का दावा प्रमाणित तथ्य के रूप में स्वीकार करना उचित नहीं होगा।
फिल्म ‘आखिरी सवाल’ की सबसे बड़ी ताकत शायद उसके किसी एक निष्कर्ष में नहीं, बल्कि उन सवालों को एक साथ रखने में है। गांधी हत्या, संघ पर प्रतिबंध, आपातकाल, इंदिरा गांधी को लिखे पत्र, बाबरी मस्जिद और सेवा कार्य, ये अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं। इन सबको जोड़कर देखने पर एक ऐसे संगठन की तस्वीर बनती है जिसने स्वतंत्र भारत के लगभग पूरे राजनीतिक इतिहास में किसी न किसी रूप में अपनी मौजूदगी बनाए रखी है।
यही कारण है कि आरएसएस को केवल ‘एक सांस्कृतिक संगठन’ कह देना भी अधूरा है और केवल ‘राजनीतिक संगठन’ कह देना भी। वह सामाजिक संगठन, विचारधारा, स्वयंसेवक नेटवर्क और उससे जुड़े अनेक संस्थानों का विशाल ढांचा है, जिसका भारतीय राजनीति पर प्रभाव निर्विवाद रूप से बहुत बड़ा है।

फिल्म की निर्माण गुणवत्ता को लेकर मतभेद हो सकते हैं। लेकिन, इसकी विषयवस्तु में राजनीतिक बहस पैदा करने की पूरी क्षमता है। संजय दत्त और नमाशी चक्रवर्ती ने फिल्म में प्रमुख भूमिकाएं निभाई हैं। निखिल नंदा इसके निर्माता हैं और उन्होंने एमएस गोलवलकर की भूमिका भी निभाई है। अभिजीत मोहन वारंग निर्देशक हैं। कुमार विश्वास ने गीत लिखे हैं और मॉन्टी शर्मा ने उन्हें अपने संगीत से सजाया है। स्क्रीन पर जब 'नमस्ते सदा वत्सले' गूंजता है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
नमाशी चक्रवर्ती खुद से घृणा पैदा कराने में कामयाब रहते हैं। संजय दत्त का प्रोफेसर वाला किरदार विचारों के टकराव को आगे बढ़ाता है। फिल्म का उद्देश्य शायद दर्शक को किसी राजनीतिक दल का सदस्य बनाना नहीं, बल्कि यह पूछने के लिए मजबूर करना है कि वह जिस संगठन के बारे में राय रखता है, उसे वास्तव में वह कितना जानता है।
फिल्म देखने के बाद दर्शक को केवल फिल्म की कहानी पर विश्वास करके नहीं रुकना चाहिए। गांधी हत्या के दस्तावेज देखने चाहिए, कपूर आयोग को पढ़ना चाहिए, आपातकाल के इतिहास में देवरस के पत्र देखने चाहिए, बाबरी विध्वंस के लिए लिब्रहान आयोग और अदालतों के रिकॉर्ड देखने चाहिए तथा संघ और सेवा भारती की अपनी रिपोर्टों को भी पढ़ना चाहिए। क्योंकि, आरएसएस को समझने का सबसे अच्छा तरीका न तो अंधसमर्थन है और न अंधविरोध।
सवाल पूछना जरूरी है। लेकिन, सवाल का जवाब भी उतनी ही गंभीरता से तलाशना जरूरी है। शायद यही ‘आखिरी सवाल’ का सबसे बड़ा संदेश है। किसी संगठन को समझने के लिए उसके बारे में सुनी-सुनाई हुई कहानियां पर्याप्त नहीं होती हैं। इतिहास, दस्तावेज, अदालतों के फैसले, संगठन के अपने दावे और उनके स्वतंत्र परीक्षण, इन सबको साथ रखकर ही तस्वीर पूरी होती है। वैसे, फिल्म का नाम 'पांच सवाल' होता तो ज्यादा बेहतर होता।

धर्मेंद्र कुमार





Related Items
विदेशी पैसे से समाज सेवा या कोई और खेल…!
प्रकाश से सक्रिय होने वाले नैनो-रोबोट से हो सकता है स्तन कैंसर का उपचार
सवाल पूछना है बेहद जरूरी, लोकतंत्र का पोषण है ‘आलोचना’