सेमीकंडक्टर आधुनिक प्रौद्योगिकी के आधारभूत घटक और आर्थिक शक्ति की नींव हैं। वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, दूरसंचार, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, रक्षा और उन्नत विनिर्माण को शक्ति प्रदान करते हैं। इंटरनेट ऑफ थिंग्स, 5जी/6जी, डेटा सेंटर और स्वायत्त वाहनों जैसी प्रौद्योगिकियां भी चिप्स की मांग को लगातार बढ़ा रही हैं।
सेमीकंडक्टर के बढ़ते महत्व का प्रतिबिंब वैश्विक सेमीकंडक्टर बाजार के तेजी से विस्तार में भी दिखाई देता है। वर्ष 2014 से 2024 के बीच वैश्विक सेमीकंडक्टर बाजार में 6.5 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की गई। अगले 5–10 वर्षों में इसके 8.5 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान है। हालांकि, हाल के व्यवधानों ने परस्पर सम्बंधित ग्लोबल सेमीकंडक्टर वैल्यू चैन की कमजोरियों को उजागर किया है। भू-राजनीतिक तनावों ने आपूर्ति पर निर्भरता से जुड़े जोखिमों को भी और स्पष्ट किया है। इसलिए, प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं अपने तकनीकी और आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए घरेलू सेमीकंडक्टर क्षमताओं को मजबूत कर रही हैं।
भारत में भी सेमीकंडक्टर की मांग तेजी से बढ़ रही है। वित्त वर्ष 2030 तक इसके 110 अरब अमेरिकी डॉलर और वित्त वर्ष 2035 तक 200 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक होने का अनुमान है, जबकि घरेलू विनिर्माण अभी प्रारंभिक अवस्था में है। भारत ने वित्त वर्ष 2017 से वित्त वर्ष 2025 के दौरान सेमीकंडक्टर उत्पादों के आयात पर लगभग 150 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च किए। इस अवधि में आयात में 23 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की गई। यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है, तो वर्ष 2035 तक वार्षिक आयात 240 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच सकता है। इसलिए, एक व्यापक सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का निर्माण तत्काल राष्ट्रीय प्राथमिकता है। सरकार आत्मनिर्भरता, सुरक्षा, कौशल और तकनीकी प्रतिस्पर्धात्मकता को आगे बढ़ाने के लिए इस इकोसिस्टम को मजबूत कर रही है।
सेमीकंडक्टर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों का मूल आधार हैं। इसलिए, एक मजबूत सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का निर्माण तकनीकी सुदृढ़ता, आर्थिक सुरक्षा और राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता के लिए आवश्यक है। इस रणनीतिक महत्व को पहचानते हुए, सरकार नीतिगत सहयोग, बुनियादी ढांचे और वैश्विक साझेदारियों के माध्यम से सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को मजबूत कर रही है।
सिलिकॉन सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली सेमीकंडक्टर सामग्री है। इसे सिलिका से प्राप्त किया जाता है, जो रेत में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। चिप निर्माण की शुरुआत अत्यधिक शुद्ध किए गए सिलिकॉन से होती है, जिसे बेलनाकार ठोस छड़ों के रूप में तैयार किया जाता है। इन ठोस छड़ों को पतले वेफर्स में काटकर पॉलिश किया जाता है। वेफर्स को फैब्रिकेशन संयंत्रों में सैकड़ों सावधानीपूर्वक नियंत्रित प्रक्रियाओं से गुजारा जाता है। इनमें डिपोजिशन, फोटोलिथोग्राफी, एचिंग और आयन इम्प्लांटेशन जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं।
इन सभी प्रक्रियाओं के सम्मिलित परिणामस्वरूप वे जटिल संरचनाएं तैयार होती हैं, जो अरबों ट्रांजिस्टर और अन्य घटकों का निर्माण करती हैं। फोटोलिथोग्राफी के दौरान प्रकाश का उपयोग करके पैटर्न को वेफर पर स्थानांतरित किया जाता है। ये पैटर्न उन संरचनाओं को निर्धारित करते हैं, जो अंततः ट्रांजिस्टर, इंटरकनेक्ट और चिप के अन्य हिस्सों का निर्माण करते हैं। ट्रांजिस्टर चिप पर मौजूद सूक्ष्म इलेक्ट्रॉनिक स्विच होते हैं, जो विद्युत धारा के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं। जटिल इंटीग्रेटेड सर्किट बनाने के लिए इस प्रक्रिया को कई परतों में दोहराया जाता है।
इसके बाद तैयार सेमीकंडक्टर उपकरण असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग अथवा आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट प्रक्रियाओं से गुजरते हैं। पैकेजिंग चिप की सुरक्षा करती है और उसे अन्य इलेक्ट्रॉनिक घटकों से जोड़ने में सक्षम बनाती है। टेस्टिंग यह सुनिश्चित करती है कि तैयार उपकरण आवश्यक प्रदर्शन और गुणवत्ता मानकों को पूरा करते हैं।
सेमीकंडक्टर नोड विनिर्माण प्रौद्योगिकी की एक पीढ़ी को दर्शाता है। ऐतिहासिक रूप से, 90 एनएम, 45 एनएम और 28 एनएम जैसे लेबल कुछ विशिष्ट भौतिक आयामों को दर्शाते थे। आज, नोड के नाम मुख्य रूप से किसी प्रक्रिया प्रौद्योगिकी की पीढ़ी के लिए संक्षिप्त संकेत के रूप में उपयोग किए जाते हैं। छोटा नोड अधिक ट्रांजिस्टर घनत्व, बेहतर प्रदर्शन या कम ऊर्जा खपत को संभव बना सकता है, लेकिन इसका परिणाम सर्किट डिजाइन, सामग्रियों, पैकेजिंग और इच्छित अनुप्रयोग पर भी निर्भर करता है। उन्नत नोड विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग और अत्याधुनिक प्रोसेसर को सक्षम बनाते हैं। वहीं, परिपक्व नोड ऑटोमोबाइल, औद्योगिक इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार, विद्युत प्रणालियों और अनेक उपभोक्ता उत्पादों के लिए आवश्यक बने हुए हैं। भारत अब स्थापित नोड से लेकर अधिक उन्नत सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकियों तक क्षमताओं का विकास कर रहा है।
सेमीकंडक्टर आर्थिक विकास, तकनीकी नेतृत्व और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक रणनीतिक संसाधन के रूप में उभरे हैं। आज ताइवान, दक्षिण कोरिया, जापान, चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका वैश्विक सेमीकंडक्टर विनिर्माण में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। अकेले ताइवान का वैश्विक चिप उत्पादन में 60 प्रतिशत से अधिक और उन्नत चिप्स के उत्पादन में लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा है। इस संकेंद्रण ने सुरक्षित, विविधीकृत और सुदृढ़ सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखलाओं की आवश्यकता को रेखांकित किया है।
भारत के लिए घरेलू सेमीकंडक्टर क्षमताएं केवल एक औद्योगिक अवसर से कहीं अधिक हैं। ये आयात पर निर्भरता कम करने, राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने और उच्च-मूल्य वाले रोजगार के अवसर सृजित करने के लिए आवश्यक हैं। ये तकनीकी आत्मनिर्भरता को भी मजबूत कर सकती हैं और रणनीतिक क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की कमजोरियों को कम कर सकती हैं। कोई भी एक देश संपूर्ण सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला को नियंत्रित नहीं करता। विभिन्न अर्थव्यवस्थाएं चिप डिजाइन, फैब्रिकेशन, उपकरण, सामग्री, मेमोरी और पैकेजिंग के क्षेत्रों में अग्रणी हैं। इस विशेषज्ञता ने दक्षता में सुधार किया है, लेकिन इसके साथ आपूर्ति के संकेंद्रण का जोखिम भी पैदा होता है। इसलिए, भारत की नीति मजबूत घरेलू क्षमता के साथ-साथ विश्वसनीय साझेदारियों पर भी केन्द्रित है।
सेमीकंडक्टर प्रयोगशाला, मोहाली उपग्रहों और प्रक्षेपण यानों के लिए अंतरिक्ष-उपयोग योग्य चिप्स विकसित करती है, जिन्हें अंतरिक्ष की कठोर परिस्थितियों का सामना करने के लिए डिजाइन किया जाता है। चंद्रयान-3 के लैंडर में भारत में निर्मित कैमरा चिप लगी थी, जिसने लैंडर की इमेजिंग प्रणालियों को सहायता प्रदान की। एससीएल का विक्रम प्रोसेसर उपग्रह प्रक्षेपण यानों और रॉकेटों में उपयोग किया जाता है। सूर्य के अध्ययन के लिए भारत के मिशन आदित्य-एल1 में एससीएल द्वारा विकसित रेडिएशन-हार्डेंड एडीसी चिप्स का उपयोग किया गया है।
भारत की सेमीकंडक्टर यात्रा रणनीतिक क्षमताओं के निर्माण से आगे बढ़कर एक व्यापक घरेलू इकोसिस्टम के सृजन तक विकसित हुई है। सेमीकंडक्टर प्रयोगशाला जैसे शुरुआती संस्थानों ने इसकी आधारशिला रखी, जबकि हालिया नीतिगत हस्तक्षेपों ने निवेश, नवाचार और प्रतिभा विकास को गति प्रदान की है। इन प्रयासों से भारत को सेमीकंडक्टर की संपूर्ण मूल्य श्रृंखला में भागीदारी के लिए सक्षम बनाया जा रहा है।
कुल मिलाकर, भारत की सेमीकंडक्टर यात्रा ने बहुत कम समय में तेजी से प्रगति की है। वर्ष 2021 में देश में कोई वाणिज्यिक चिप संयंत्र नहीं था। वर्ष 2026 तक 12 इकाइयों को मंजूरी मिल चुकी है और पांच इकाइयों में उत्पादन शुरू हो चुका है। सैकड़ों कॉलेजों के विद्यार्थी अब चिप डिजाइन कर रहे हैं।
आगे की राह चुनौतीपूर्ण है। चिप विनिर्माण दुनिया के सबसे जटिल उद्योगों में से एक है। इसके लिए धैर्य, सटीकता और निरंतर नीतिगत समर्थन की आवश्यकता होती है। इससे युवा इंजीनियरों को अपने घर के करीब उच्च-मूल्य वाले रोजगार के अवसर मिलेंगे। एक छोटी-सी चिप अपने भीतर एक बड़ा वादा समेटे हुए है और भारत ने अब इसे देश में ही बनाने का संकल्प लिया है।

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