‘गोविंदा’ बनते ही पटरी से उतर जाते हैं वरुण धवन

वरुण धवन ‘गोविंदा’ बनने की कोशिश क्यों करते हैं? यह सवाल इसलिए दिलचस्प है क्योंकि वरुण धवन के करियर को ध्यान से देखें तो जवाब उनकी अभिनय क्षमता में नहीं, बल्कि उनकी अभिनय-शैली के चुनाव में छिपा हुआ दिखाई देता है।

वरुण धवन में ऊर्जा है, स्क्रीन प्रेजेंस है, डांस की सहजता है, कॉमेडी करने का आत्मविश्वास है और जरूरत पड़ने पर वह गंभीर भूमिकाओं में खुद को साबित करने की क्षमता भी रखते हैं। जब वह इन खूबियों को अपनी शैली में इस्तेमाल करते हैं तो अभिनेता के रूप में उनका कद बढ़ता जाता है। लेकिन, जब वह गोविंदा की चाल, हाव-भाव, संवाद अदायगी और कॉमिक देह भाषा को ‘पकड़ने’ की कोशिश करते हैं तो अक्सर उनकी अपनी पहचान बहुत पीछे छूट जाती है। यही वरुण धवन के करियर का शायद सबसे बड़ा विरोधाभास है। वह जब ‘वरुण धवन’ होते हैं तो बेहतर लगते हैं; लेकिन, जब गोविंदा ‘बनने’ लगते हैं तो बनावटी दिखने लगते हैं।

उनकी शुरुआत ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ से हुई। ‘रोहन नंदा’ के रूप में वह उस समय के बॉलीवुड के नए, चमकदार, और शहरी हीरो की तस्वीर थे। फिल्म में अभिनय की बहुत बड़ी चुनौती नहीं थी, लेकिन वरुण के भीतर मौजूद आत्मविश्वास और शारीरिक ऊर्जा साफ दिखाई देती थी। वह किसी पुराने अभिनेता की कॉपी नहीं लग रहे थे। यह महत्वपूर्ण बात थी, क्योंकि उनकी अपनी स्क्रीन पर्सनैलिटी शुरू से ही मौजूद थी।

‘मैं तेरा हीरो’ में पहली बार वह उस रास्ते पर जाते दिखाई दिए जिसे बाद में गोविंदा-शैली की कॉमेडी कहा जाने लगा। तेज संवाद, शरारती नायक, शारीरिक कॉमेडी, लड़कियों के पीछे भागता हुआ किरदार और हर स्थिति में अतिउत्साही प्रतिक्रिया, इन सबमें गोविंदा की फिल्मों की याद आना स्वाभाविक था। लेकिन, फर्क यह था कि वरुण में ऊर्जा अपनी थी। समस्या तब शुरू होती है जब वह उस ऊर्जा को गोविंदा की हूबहू नकल में बदल देते हैं।

‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’ में वरुण ने एक अलग तरह की राह पकड़ी। ‘हम्प्टी’ का चरित्र न तो गोविंदा था, न सलमान खान और न शाहरुख खान। वह एक पंजाबी, बेफिक्र, दोस्ताना और भावुक लड़का था। वरुण की सहजता यहां उनकी ताकत बनी।

फिर ‘बदलापुर’ आई और वरुण ने अपने करियर का शायद सबसे महत्वपूर्ण काम किया। ‘राघव’ के रूप में उन्होंने दिखाया कि उनके भीतर सिर्फ डांस, कॉमेडी और रोमांस करने वाला अभिनेता नहीं है। एक साधारण दिखने वाले व्यक्ति के भीतर बदले की आग, अपराधबोध, हिंसा और मानसिक टूटन को उन्होंने जिस तरह निभाया, उसने उनके बारे में बनी सीमित धारणा को तोड़ा। यहां गोविंदा की कोई छाया नहीं थी। यह सिर्फ वरुण था। और, यही बात फिल्म ‘अक्टूबर’ में और मजबूत हुई।

‘अक्टूबर’ शायद इस बहस का सबसे बड़ा प्रमाण है। ‘डेनिश वालिया’ के रूप में वरुण ने अपने स्टारडम को लगभग किनारे रख दिया। किरदार की चुप्पी, उसकी बेचैनी, उसकी भावनात्मक उलझन और बिना बहुत कुछ कहे महसूस कराने की क्षमता ने दिखाया कि वरुण के पास अभिनेता बनने की गंभीर संभावना है। वह फिल्म इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि उसमें वरुण ने कोई कठिन भावुक दृश्य कर दिखाया, बल्कि इसलिए कि उन्होंने अपने सामान्य चंचल स्क्रीन व्यक्तित्व को नियंत्रित किया। उन्होंने अभिनय को ‘करने’ के बजाय किरदार को ‘जीने’ की कोशिश की।

इसीलिए, ‘अक्टूबर’ और बाद की ‘बॉर्डर 2’ जैसी फिल्मों में वरुण का काम देखते हुए सवाल उठता है कि आखिर उन्हें बार-बार ‘गोविंदा’ बनने की जरूरत क्यों पड़ती है। ‘बॉर्डर 2’ में ‘मेजर होशियार सिंह दहिया’ का किरदार उनकी उस दूसरी छवि को सामने लाता है जिसमें वह अपने स्टारडम से अधिक किरदार पर भरोसा करते हैं। फिल्म में उनके प्रदर्शन को लेकर मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया भी इस बात की ओर इशारा करती है कि दर्शक उन्हें सिर्फ कॉमेडी हीरो के रूप में नहीं देखना चाहते हैं।

लेकिन, ‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनियां’ और ‘बदलापुर’ के बीच का वरुण जब ‘दिलवाले’ में आता है तो तस्वीर फिर बदलती है। वहां वह शाहरुख खान की मौजूदगी वाले बड़े रोमांटिक एक्शन संसार का हिस्सा बनते हैं। ‘ढिशूम’ में उनका अंदाज दोस्ताना एक्शन-कॉमेडी का था। ‘बेबी जॉन’ में उनकी एक्शन-स्टार वाली छवि बनाने की कोशिश एक बार फिर दिखाई देती है। ‘बद्रीनाथ की दुल्हनियां’ में उन्होंने फिर अपनी सहज कॉमिक ऊर्जा का इस्तेमाल किया। इन फिल्मों में वह किसी एक अभिनेता की नकल नहीं कर रहे थे, बल्कि अपनी स्टार इमेज बना रहे थे।

फिर आई ‘जुड़वां 2’। यहीं से उनकी गोविंदा वाली तुलना सबसे ज्यादा तीखी हो जाती है, हालांकि तकनीकी रूप से यह फिल्म सलमान खान की ‘जुड़वां’ की रीमेक थी। लेकिन, वरुण की कॉमिक प्रस्तुति में 90 के दशक के गोविंदा की याद बार-बार आती रही। ‘राजा’ और ‘प्रेम’ के दोहरे किरदारों में उन्हें अलग-अलग व्यक्तित्व बनाने थे, मगर कई जगह उनका अभिनय किरदारों के सामने मात खा गया। मूल ‘जुड़वां’ में सलमान खान का अपना ‘स्टार’ व्यक्तित्व था; वरुण के संस्करण में कई बार ऐसा लगा कि वह 90 के दशक की कॉमेडी की भाषा को आज के पर्दे पर फिर से पेश करने की ‘कोशिश’ कर रहे हैं।

विडंबना यह है कि ‘जुड़वां 2’ की व्यावसायिक सफलता ने शायद वरुण को गलत संदेश दे दिया। उन्हें लगा होगा कि उनकी वह शैली दर्शकों को पसंद आ रही है। एक अभिनेता को बॉक्स ऑफिस की तालियों और अपनी अभिनय-क्षमता के बीच के अंतर को समझना पड़ता है।

‘अक्टूबर’ के बाद ‘सुई धागा’ में ‘मौजी’ का किरदार फिर एक अलग वरुण धवन को सामने लाता है। छोटे शहर का संघर्षशील युवक, अपनी पत्नी के साथ मिलकर व्यवसाय खड़ा करने की कोशिश करता हुआ आदमी, यह किरदार किसी स्टार की नकल से नहीं बनता है। यहां वरुण की शारीरिक भाषा बदली हुई है, आवाज बदली हुई है और सबसे बड़ी बात यह कि वह अपनी खूबसूरती और स्टारडम को किरदार पर हावी नहीं होने दे रहे।

‘कलंक’ में उन्होंने ‘जफर’ का किरदार निभाया, लेकिन फिल्म की भव्यता और कमजोर कहानी ने उनके प्रदर्शन को उतनी जगह नहीं दी। ‘स्ट्रीट डांसर 3डी’ में वह फिर डांसिंग स्टार के रूप में लौटे। डांस वरुण की अपनी ताकत है और इसके लिए उन्हें गोविंदा की नकल करने की जरूरत नहीं है। गोविंदा एक महान डांसर थे, लेकिन वरुण धवन से उनकी शारीरिक भाषा बिल्कुल अलग है।

और, फिर आई ‘कुली नं. 1’। यहां उनकी गोविंदा से तुलना लगभग अपरिहार्य थी क्योंकि फिल्म स्वयं गोविंदा और डेविड धवन की 1995 की फिल्म की रीमेक थी। मूल फिल्म में गोविंदा की कॉमिक टाइमिंग, चेहरे की मांसपेशियों से लेकर आवाज के उतार-चढ़ाव तक, हर चीज उनके व्यक्तित्व का हिस्सा थी। वरुण के लिए समस्या यह थी कि उन्हें सिर्फ वही कहानी दोहरानी नहीं थी, बल्कि उस किरदार को अपनी भाषा में पुनर्जीवित करना था।

लेकिन, फिल्म में कई जगह ऐसा लगा कि वह गोविंदा की ऊर्जा को पुनः पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि गोविंदा की सबसे बड़ी ताकत यही थी कि वह किसी की ऊर्जा को पुनः पैदा नहीं करते थे, बल्कि वह अपनी स्वयं की ऊर्जा पैदा करते थे। यही वजह है कि ‘कुली नं. 1’ की असफलता को केवल ‘खराब रीमेक’ कहकर खत्म कर देना आसान है, लेकिन वरुण के करियर के संदर्भ में यह इससे भी एक बड़ी समस्या की तरफ इशारा करती है।

‘जुग जुग जीओ’ में वरुण फिर अपनी जगह लौटते हैं। ‘कुकू’ का किरदार न तो गोविंदा बनने की मांग करता है और न किसी पुराने सुपरस्टार की नकल की। वैवाहिक रिश्ते की उलझनों में फंसा युवा आदमी उनके लिए ज्यादा स्वाभाविक क्षेत्र है। ‘भेड़िया’ में तो उन्होंने एक और अलग दिशा पकड़ी, हॉरर-कॉमेडी में शरीर, कॉमेडी और भावनात्मकता का संतुलन। ‘बवाल’ में उन्होंने एक बार फिर अलग तरह का किरदार निभाने की कोशिश की।

‘सन्नी संस्कारी की तुलसी कुमारी’ में फिर वही पुरानी समस्या सामने आती है। फिल्म का चरित्र एक ऐसे रोमांटिक-कॉमिक नायक की मांग करता है जिसमें चंचलता, अतिनाटकीयता और पुराने हिंदी सिनेमा की छाप है। वरुण इसमें स्वाभाविक ऊर्जा लेकर आते हैं।

यहां एक बार फिर गोविंदा से उनकी तुलना करना जरूरी हो जाता है। गोविंदा को सिर्फ उनकी फिल्मों के संवाद, नृत्य या चेहरे के भावों से समझना उनके साथ अन्याय होगा। गोविंदा की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह हास्य को अपने व्यक्तित्व में घोल देते थे। वह अभिनय करते हुए भी ऐसा नहीं लगते थे कि “अब मैं कॉमेडी कर रहा हूं।” उनका शरीर, आवाज, आंखें, विराम, संवाद की गति, सब एक साथ काम करते थे। वरुण में ऊर्जा बहुत है, लेकिन कई बार वह ऊर्जा नियंत्रित न होकर जाया होने लगती है। फर्क छोटा है, मगर एक अभिनेता के लिए यही फर्क बहुत बड़ा होता है।

गोविंदा की दूसरी बड़ी खूबी है उनकी ‘टाइमिंग’। वह एक सेकंड पहले या एक सेकंड बाद संवाद बोलकर दृश्य का अर्थ बदल सकते हैं। वरुण का कॉमिक अभिनय कई बार पंचलाइन को पहले से घोषित कर देता है। दर्शक को पता चल जाता है कि अब मजाक आने वाला है। गोविंदा में अक्सर मजाक उनके भीतर से अचानक निकलता हुआ लगता था। यही कारण है कि गोविंदा की नकल करना किसी भी अभिनेता के लिए लगभग असंभव काम है। आप उनकी चाल पकड़ सकते हैं, उनकी आवाज की नकल कर सकते हैं, उनका डांस दोहरा सकते हैं, लेकिन उनकी टाइमिंग नहीं चुरा सकते हैं।

दिलचस्प बात यह भी है कि गोविंदा खुद किसी एक फार्मूले में बंद अभिनेता नहीं थे। ‘आंखें’, ‘राजाबाबू’, ‘कुली नं. 1’, ‘साजन चले ससुराल’, ‘हीरो नं. 1’, ‘बड़े मियां छोटे मियां’ और ‘दूल्हे राजा’ जैसी फिल्मों में उनका हास्य एक ही ढंग का नहीं था। डेविड धवन के साथ उनकी साझेदारी ने 90 के दशक की हिंदी कॉमेडी की एक अलग भाषा बनाई थी, जिसमें गलत पहचान, तेज रफ्तार संवाद, स्लैपस्टिक और रोमांस का मिश्रण था।

वरुण के सामने समस्या यह है कि वह उस भाषा के ‘उत्तराधिकारी’ बनने की कोशिश करते हैं, जबकि उन्हें अपनी खुद की भाषा बनानी चाहिए। यहां ‘बॉर्डर 2’ और ‘अक्टूबर’ जैसे उदाहरण बहुत महत्वपूर्ण हैं। इन फिल्मों में जब वरुण किसी दूसरे अभिनेता की छाया से बाहर आते हैं तो उनका चेहरा अलग दिखाई देता है। वह ज्यादा गंभीर, ज्यादा विश्वसनीय और बड़े अभिनेता नजर आते हैं।

वरुण धवन की पूरी फिल्मोग्राफी को एक साथ देखें तो तस्वीर साफ है। ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ में उन्होंने अपना चेहरा बनाया। ‘मैं तेरा हीरो’ में अपनी कॉमिक ऊर्जा खोजी। ‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनियां’ में अपनी रोमांटिक पहचान मजबूत की। ‘बदलापुर’ और ‘अक्टूबर’ में अभिनेता होने की संभावना दिखाई। ‘एबीसीडी 2’, ‘ढिशूम’, ‘बद्रीनाथ की दुल्हनियां’ और ‘स्ट्रीट डांसर 3डी’ में अपनी व्यावसायिक ताकत का इस्तेमाल किया। ‘सुई धागा’, ‘जुग जुग जीयो’, ‘भेड़िया’ और ‘बवाल’ में अलग-अलग रंग आजमाए।

लेकिन, ‘जुड़वां 2’ और ‘कुली नं. 1’ जैसी फिल्मों में जब वह पुराने सितारों की स्थापित छवियों को पुनर्जीवित करने की कोशिश करते हैं, तो उनका अपना व्यक्तित्व कमजोर पड़ जाता है। उनकी फिल्मोग्राफी में यह पैटर्न साफ दिखाई देता है।

गोविंदा और वरुण की तुलना इसलिए भी रोचक है कि दोनों में कई समानताएं हैं। दोनों अच्छे डांसर हैं। दोनों कॉमेडी कर सकते हैं। दोनों में शारीरिक ऊर्जा है। दोनों ही रोमांस और हास्य को साथ लेकर चल सकते हैं। दोनों की स्क्रीन प्रेजेंस मजबूत है। लेकिन, दोनों का सबसे बड़ा अंतर यही है कि गोविंदा ने अपनी खुद की शैली बनाई, जबकि वरुण कभी-कभी एक बनी-बनाई शैली पहन लेते हैं। और, शायद यही वह बात है जो वरुण को समझनी होगी।

वरुण धवन को ‘गोविंदा’ बनने की जरूरत नहीं है। वह ‘गोविंदा’ नहीं बन सकते हैं और न उन्हें बनना चाहिए। गोविंदा अपने समय के ‘गोविंदा’ थे। वरुण अपने समय के ‘वरुण धवन’ हैं। उनके पास अपना एक अलग शरीर है, अलग फिंगर प्रिंट हैं, अलग आंखों की पुतली है। अपनी आवाज है, अपनी मासूमियत है, अपना हास्य है और गंभीर किरदारों को निभाने की अपनी अलग क्षमता भी है। जब वह इन चीजों का इस्तेमाल करते हैं तो बेहद आकर्षक लगते हैं। जब वह गोविंदा की चाल, संवाद और हावभाव को पकड़ने की कोशिश करने लगते हैं तो दर्शक को उनका अभिनय दिखाई देने के बजाय उसकी ‘कोशिश’ दिखाई देने लगती है।

‘सन्नी संस्कारी की तुलसी कुमारी’ का अनुभव इसलिए महत्वपूर्ण है कि फिल्म में वरुण की अपनी ऊर्जा बार-बार फिल्म को संभालती नजर आती है। समस्या ऊर्जा में नहीं है; समस्या यह है कि उस ऊर्जा को किस दिशा में इस्तेमाल किया जा रहा है।

वरुण के लिए सबसे अच्छी बात यह है कि उन्हें अपनी क्षमता साबित करने के लिए किसी और का नाम उधार लेने की जरूरत नहीं है। ‘बदलापुर’, ‘अक्टूबर’, ‘सुई धागा’, ‘जुग जुग जीयो’, ‘भेड़िया’, और ‘बॉर्डर 2’ में वह अपने किरदार के साथ नजर आए। इन फिल्मों को जोड़कर देखें तो एक बेहतरीन अभिनेता दिखाई देता है, जिसके भीतर कॉमेडियन से कहीं ज्यादा संभावनाएं हैं।

इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि “वरुण धवन गोविंदा जैसा अभिनय क्यों करते हैं?” असली सवाल यह है कि “जब वरुण धवन खुद इतना अच्छा कर सकते हैं तो उन्हें गोविंदा बनने की जरूरत ही क्यों पड़ती है?”

गोविंदा का चोला पहनकर वरुण शायद गोविंदा की याद दिला सकते हैं, लेकिन वरुण धवन बनकर वह वरुण धवन की याद छोड़ सकते हैं। और एक अभिनेता के लिए इससे बड़ी सफलता और क्या होगी कि दर्शक फिल्म खत्म होने के बाद यह न कहें कि “यह तो गोविंदा जैसा था”, बल्कि यह कहें—“यह सिर्फ वरुण धवन कर सकता था।” उन्हें बस इतना समझना है कि विरासत का सम्मान नकल करके नहीं, अपनी पहचान बनाकर किया जाता है।



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