भारतीय लोकतंत्र में पत्रकारिता और राजनीति का रिश्ता हमेशा से बहस का विषय रहा है। पत्रकारिता का धर्म है, सत्ता से सवाल करना और जनता के हित में सच को सामने रखना, जबकि राजनीति का धर्म है सत्ता प्राप्त करना और उसे बनाए रखना। इन दोनों के बीच का टकराव और सहयोग ही लोकतंत्र की असली धड़कन है।
पत्रकारिता और राजनीति अक्सर समानांतर चलती दिखाई देती हैं। हालांकि, पत्रकारिता का दायरा राजनीति से कहीं व्यापक है। पत्रकारिता की भाषा में राजनीति महज़ एक ‘बीट’ है, लेकिन हमारे देश में राजनीति सबसे बड़ा ‘रुचि’ का विषय होने के कारण पत्रकारिता पर भी उसका दबाव बना रहता है।
पत्रकारिता और राजनीति, दो धाराएं हैं जो अलग‑अलग दिशाओं में बहती हैं, लेकिन समय‑समय पर एक ही घाट पर आकर मिलती भी प्रतीत होती हैं। पत्रकारिता का स्वर है सवालों का, राजनीति का स्वर है सत्ता का। दोनों के बीच का यह संगम कभी मधुर होता है तो कभी विषाक्त।
अंग्रेज़ी का अक्षर 'एच' (H) इस रिश्ते का अद्भुत प्रतीक है। दो खड़ी रेखाएं पत्रकारिता और राजनीति को निरूपित करती है और बीच की क्षैतिज रेखा वह पुल है जो इन दोनों रेखाओं को जोड़ता है। यह पुल कभी पत्रकारों को राजनीति की ओर ले जाता है, तो कभी राजनीतिज्ञों को पत्रकारिता का चोला पहनने का अवसर देता है। लेकिन, यह पुल एकतरफ़ा है। पत्रकारिता से राजनीति तक जाने का रास्ता तो है, लेकिन लौटने का नहीं है।
पश्चिम की बात करें तो अमेरिका में भी कई पत्रकार राजनीति में आए हैं। वहां टीवी एंकर से सीनेटर बनने के कई उदाहरण मौजूद हैं। लेकिन, अमेरिकी समाज पत्रकारिता और राजनीति के बीच स्पष्ट दीवार बनाए रखने पर ज़ोर देता है। यूरोपीय देशों में पत्रकारों का राजनीति में प्रवेश अपेक्षाकृत कम है। वहां पत्रकारिता को स्वतंत्र और निष्पक्ष बनाए रखने की परंपरा अधिक मज़बूत है। इधर, भारत में राजनीति पत्रकारिता पर अधिक हावी रहती है।
इतिहास गवाह है कि स्वतंत्रता आंदोलन के समय पत्रकारिता ने राजनीति को जनमत की शक्ति दी। अख़बारों ने जनता को जागरूक किया और नेताओं को जनता तक पहुंचाया। आपातकाल के दौरान राजनीति ने पत्रकारिता की आवाज़ दबाने की कोशिश की और सेंसरशिप ने स्वतंत्रता पर सीधा हमला किया। और आज, आधुनिक दौर में यह पुल और भी व्यस्त हो गया है, पत्रकार राजनीति में उतरते हैं और नेता कई तरह के मीडिया प्लेटफ़ॉर्म का इस्तेमाल कर खुद को पत्रकार की तरह प्रस्तुत करते हैं।
पिछले वर्षों में अनेक पत्रकार राजनीति में आए। कुछ सफल हुए, कुछ असफल। लेकिन, एक बार राजनीति में उतरने के बाद पत्रकारिता में वापसी लगभग असंभव है। पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी उसकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता है। राजनीति में उतरने के बाद वह 'निष्पक्षता' संदिग्ध हो जाती है।
जनता के मन में यह प्रश्न गूंजने लगता है कि क्या इन पूर्व नेताओं की पत्रकारिता अब स्वतंत्र आवाज़ रह पाएगी, या यह उनकी स्वयं की राजनीति का अतिरिक्त विस्तार बन जाएगी। यदि पत्रकार राजनीति और पत्रकारिता के बीच लगातार अदला‑बदली करेंगे, तो पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर गहरी चोट पहुंचेगी। राजनीति को इससे लाभ हो सकता है, लेकिन पत्रकारिता को इससे सिर्फ नुकसान ही होता है।
पत्रकारिता और राजनीति का ‘एच’ केवल एक अक्षर का खेल नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा का संघर्ष है। पत्रकारिता को अपनी गरिमा बचाए रखनी होगी, वरना यह पुल पत्रकारिता को राजनीति की भीड़ में कहीं खो देगा।

धर्मेंद्र कुमार





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