सेवा से उद्योग बना चिकित्सा व्यवसाय, अब आगे क्या है उपाय…!


एक बुजुर्ग सज्जन ने सुबह की सैर के दौरान अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि जिस तरह पीड़ित अपने साथ अपराध हो जाने के बावजूद पुलिस के पास जाने से डरते हैं, ठीक उसी तरह मरीज़ भी आजकल चिकित्सा सेवा लेने अस्पताल जाने से कतराते हैं। डॉक्टरों पर जो भरोसा कभी था, जिन्हें कभी ईश्वरीय स्वरूप माना जाता था, वह अब काफी हद तक खत्म हो चुका है।

यह गंभीर कथन बाइबिल की एक कहावत ‘चिकित्सक, पहले खुद को ठीक करो।‘ का स्पष्ट अनुस्मारक है कि दूसरों को ठीक करने का काम जिन लोगों को सौंपा गया है, उन्हें पहले अपना समाधान करना चाहिए। सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर कहती हैं कि मरीजों की शिकायतों और उपभोक्ता फोरम के मामलों की बढ़ती संख्या भारत के चिकित्सा उद्योग में गहरे संकट को रेखांकित कर रही है। इस संकट के मूल में प्रणालीगत मुद्दों का एक जटिल अंतर्संबंध है, जिसमें दवा उद्योग और भ्रष्ट राजनीतिक संस्थाओं के बीच कपटी गठजोड़ शामिल है। यह अपवित्र गठबंधन अक्सर मरीज़ों के कल्याण पर लाभ को प्राथमिकता देता है। इससे ऐसा माहौल बनता है जहां कई अनैतिक प्रथाएं पनपती हैं।

सामाजिक टिप्पणीकार प्रो. पारस नाथ चौधरी कहते हैं कि हाल के दिनों में दवा कंपनियों की आक्रामक विपणन रणनीति के चलते अत्यधिक महंगी दवाओं पर निर्भरता बढ़ी है। इससे चिकित्सा का मूल सिद्धांत ‘पीड़ा को ठीक करना’ लगातार कमजोर हो रहा है। भारत की चिकित्सा शिक्षा और प्रशासन पर भी तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। हर साल बड़ी संख्या में मेडिकल स्नातक तैयार करने के बावजूद, उनके प्रशिक्षण की गुणवत्ता को लेकर चिंता बनी हुई हैं। 

कट्स और कमीशन की संस्कृति समस्या को और गहरा बना देती है। दवाओं की दुकान के मालिक एसी नाथ बताते हैं कि वित्तीय प्रोत्साहन अक्सर नैतिक विचारों को पीछे छोड़ देते हैं। इससे रिश्वतखोरी और दलाली को बढ़ावा मिलता है। कमीशनबाजी की मानसिकता संकट को और बढ़ा देती है। ऐसे परिदृश्य में जहां वित्तीय प्रोत्साहन अक्सर नैतिक सीमाओं का निर्धारण करते हैं, वहीं चिकित्सा पेशेवर खुद को रिश्वतखोरी और दलाली के जाल में फंसा हुआ पा सकते हैं। इससे न केवल व्यक्तिगत चिकित्सकों की निष्ठा पर असर पड़ता है, बल्कि स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में जनता का विश्वास भी खत्म होता है। दवाइयों के थोक विक्रेता गोपाल कहते हैं, "मरीज डॉक्टरों को दयालु देखभाल करने वाले के बजाय दवा कंपनियों के सेल्सपर्सन के रूप में देखना शुरू कर देते हैं। इससे डॉक्टर व रोगी के संबंधों पर बुरा असर पड़ने लगता है।"

एक तरफ भारत हर साल बड़ी संख्या में मेडिकल स्नातक तैयार करता है तो दूसरी तरफ उनकी शिक्षा की गुणवत्ता पर अक्सर सवाल उठाए जाते रहे हैं। जून 2022 तक, भारत में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और राज्य चिकित्सा परिषदों के साथ 13,08,009 एलोपैथिक डॉक्टर पंजीकृत थे। इसके अलावा, 5.65 लाख आयुष डॉक्टर थे। इससे भारत में डॉक्टर-से-जनसंख्या अनुपात 1:834 हो जाता है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के 1:1000 के मानक से बेहतर है। सरकार ने भारत में डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं। इनमें मेडिकल कॉलेजों और एमबीबीएस सीटों की संख्या बढ़ाना, शिक्षण संकाय पदों के लिए डीएनबी योग्यता को मान्यता देना और मेडिकल कॉलेजों में शिक्षकों, डीन, प्रिंसिपल और निदेशकों की नियुक्ति तथा विस्तार या पुनर्नियुक्ति के लिए आयु सीमा बढ़ाना शामिल है।

साल 2024 तक, भारत में 731 मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें 423 सरकारी और 343 निजी कॉलेज हैं। भारत में मेडिकल कॉलेजों की संख्या में हाल के वर्षों में काफी वृद्धि हुई है। साल 2014 से पहले 387 संस्थानों से अब तक 82 फीसदी  की वृद्धि हो चुकी है। एमबीबीएस सीटों की संख्या भी बढ़ी है। जो 2023-24 के शैक्षणिक वर्ष में 1,08,940 से 6.3 फीसदी बढ़कर 2024-25 में 1,15,812 हो गई है। स्नातकोत्तर चिकित्सा सीटों में भी विस्तार हुआ है, जो 5.92 फीसदी बढ़कर 73,111 हो गई हैं।

दिलचस्प बात यह है कि मेडिकल कॉलेजों और प्रशिक्षित डॉक्टरों की संख्या में वृद्धि के बावजूद, गुणवत्ता और पहुंच से संबंधित मुद्दे अभी भी बने हुए हैं। भारत के चिकित्सा उद्योग के भीतर आत्मनिरीक्षण और सुधार के लिए यह सही वक्त है। सरकारों व स्वास्थ्य क्षेत्र के सभी हिस्सेदारों को जल्द से जल्द इस क्षेत्र में व्याप्त समस्याओं का हल  ढूंढ के चिकित्सकों व मरीजों के बीच दरक रहे विश्वास की खाई को पाटना होगा।



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