अंग्रेजी उपन्यासकारों में हेनरी जेम्स को बेहद ऊंचा स्थान प्राप्त है। बात उस समय की है जब उनकी प्रसिद्धि अपने चरम पर थी।
जेम्स की बढ़ती लोकप्रियता के कारण बहुत से लोग उनसे ईर्ष्या रखने लगे थे। और तो और, उनका पड़ोसी तक उनसे जलने लगा था। वह हर वक्त उनसे खार खाए रहता था। बात-बात पर उलझने की कोशिश करता रहता और उन्हें खरी-खोटी सुनाता रहता था। लेकिन, जेम्स चुपचाप सब कुछ बर्दाश्त करते रहते थे।
एक दिन अचानक उसी पड़ोसी की पत्नी की तबीयत बहुत खराब हो गई। मारे दर्द के उसका बुरा हाल हो चला था। रो-चिल्लाकर उसने आसमान सिर पर उठा रखा था। यह सब देखकर उसका पति इतना घबरा गया कि वह सोच ही नहीं पा रहा था कि क्या करे? वह किंकर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा था। तभी, उसने अपने घर में जेम्स को प्रवेश करते हुए देखा। जेम्स को सामने देखकर वह आश्चर्यचकित हो उठा और उसके मुंह से निकला, अरे जेम्स, तुम यहां?
जेम्स ने प्रेमपूर्वक प्रतिवाद करते हुए कहा कि क्या उन्हें वहां नहीं आना चाहिए था। पड़ोसी झेंपते हुए बोला, नहीं-नहीं, ऐसी बात नहीं है।
जेम्स ने उसको बताया किया उन्होंने डॉक्टर को खबर कर दी है और वह आता ही होगा। पड़ोसी हैरान था। जब उससे रहा नहीं गया तो उसने अपने मन का कलुष व्यक्त कर ही दिया और बोला उसे कतई आशा नहीं थी कि जेम्स इस मुसीबत के समय उसके साथ होंगे, क्योंकि वह तो उन्हें अपना दुश्मन मानता था।
इस पर बीच में ही बात काटकर, जेम्स बोले, दुश्मन तो आप मानते थे, मैं नहीं, मेरे दोस्त…।






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