बीते 9 अप्रैल को भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने ‘आरोग्य वन’ पहल शुरू की। राजमार्गों के किनारे अब औषधीय पेड़ों के जंगल उगेंगे। सफ़र होगा, और साथ में सेहत का पैग़ाम भी मिलेगा। सड़कें दौड़ती थीं। अब पेड़ भी साथ दौड़ेंगे। हवा में सिर्फ़ धूल नहीं, शिफ़ा की ख़ुशबू भी होगी। अब ज़रा पीछे चलते हैं।
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्रधिकरण, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के तहत एक अहम संस्था है। 1995 में बनी। आज देश के लगभग 1,32,500 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्गों में से 92,000 किलोमीटर से ज़्यादा इसकी निगरानी में हैं। पिछले साल 2025-26 में 5,313 किलोमीटर नई सड़कें बनीं। लक्ष्य से 15 फ़ीसदी ज़्यादा। काग़ज़ पर यह तरक़्क़ी है। ज़मीनी हक़ीक़त में? कुछ सवाल भी हैं।
सड़क बनी, तो जंगल कटा। वहां बढ़े, तो धुआं बढ़ा। रफ़्तार आई, तो ख़ामोशी भागी। यही कसक ‘आरोग्य वन’ की वजह बनी। विकास की दौड़ में प्रकृति हांफने लगी थी। अब उसे थोड़ा सहारा दिया जा रहा है।
योजना क्या है? सरल लफ़्ज़ों में, जहां हाईवे के किनारे खाली ज़मीन है, वहां औषधीय पेड़ लगाए जाएंगे। इसे थीमैटिक मेडिसिनल ट्री प्लांटेशन कहा गया है। नाम थोड़ा भारी है, मंशा सीधी, धरती को फिर से ज़िंदा करना।
पहले चरण में 17 जगहों पर काम शुरू होगा। कुल 62.8 हेक्टेयर ज़मीन पर 67,462 पेड़ लगाए जाएंगे। 11 राज्यों में यह हरियाली फैलेगी; मध्य प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली-एनसीआर, गुजरात, कर्नाटक, ओडिशा, तमिलनाडु, राजस्थान, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश।
योजना छोटी नहीं है। 188 हेक्टेयर ज़मीन चिह्नित हो चुकी है। मानसून 2026 में असली इम्तिहान होगा। बारिश आई, तो पौधे भी मुस्कुराएंगे। कौन से पेड़ लगेंगे? यह कोई साधारण हरियाली नहीं। यह ‘इलाज वाली हरियाली’ है।
नीम होगा, कड़वा, मगर कारगर। आंवला होगा, खट्टा, मगर फ़ायदेमंद। जामुन होगा, मीठा, मगर शुगर का दुश्मन। इमली, नींबू, गूलर, मौलसरी, हर पेड़ अपनी दास्तान, अपनी दवा। कुल 36 तरह के पेड़ चुने गए हैं। इलाक़े के मौसम के हिसाब से लगाए जाएंगे। यानी, सिर्फ़ दिखावा नहीं—समझदारी भी। इन पेड़ों से सिर्फ़ इंसान नहीं, परिंदे भी लौटेंगे। मधुमक्खियां गुनगुनाएंगी। छोटे जीव फिर से घर बसाएंगे। इस तरह हाईवे अब ‘ग्रीन कॉरिडोर’ ही नहीं, ‘लाइफ़ कॉरिडोर’ बन सकते हैं।
कहां दिखेंगे ये आरोग्य वन? जहां नज़र सबसे ज़्यादा जाती है। टोल प्लाज़ा। इंटरचेंज। वेज़-साइड सुविधाएं। यानी, सरकार चाहती है कि लोग देखें। देखें, समझें, और शायद थोड़ा बदलें। यह पहल सिर्फ़ पेड़ लगाने की नहीं। यह एक पैग़ाम है; “तरक़्क़ी और तबीयत, दोनों साथ चल सकते हैं।”
मक़सद क्या है? पहले पेड़ लगते थे—बस हरियाली के लिए। अब पेड़ लगेंगे: सोच के साथ। यह पहल आयुर्वेद को भी सलाम करती है। हमारी पुरानी दवा, हमारी पुरानी दास्तान। आरोग्य वन एक तरह का खुला मदरसा होंगे; जहां पेड़ किताब हैं, और छांव उनका सबक। फ़ायदे भी गिन लीजिए हवा साफ़ होगी। मिट्टी बचेगी।कार्बन घटेगा। लोग सीखेंगे। रोज़गार मिलेगा। गांव जुड़ेगा। और सबसे अहम, हम अपनी जड़ों से फिर जुड़ेंगे।
हरित राजमार्ग नीति 2015 पहले से ही हरित गलियारों की बात करती है। ‘आरोग्य वन’ उसी क़दम को आगे बढ़ाता है। थोड़ा और दिल से, थोड़ा और दिमाग़ से। लेकिन, एक सवाल अभी भी हवा में तैर रहा है।
क्या यह पहल ज़मीन पर भी उतनी ही हरी होगी, जितनी काग़ज़ पर है? पेड़ लगाना आसान है। उन्हें बचाना, असल इम्तिहान है।
अंत में, हाईवे अब सिर्फ़ मंज़िल तक नहीं ले जाएंगे। शायद, बेहतर ज़िंदगी तक भी ले जाएं। अगर ‘आरोग्य वन’ सच में फलते-फूलते हैं, तो यह पहल मिसाल बन सकती है। वरना, फाइलों की धूल में एक और सपना दफ़न हो जाएगा। सड़कें बनाना हुनर है। प्रकृति बचाना ज़िम्मेदारी।






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