बांग्लादेश और भारत के बीच बढ़ रहा है खतरनाक असंतुलन...


बांग्लादेश में हालिया राजनीतिक उथल-पुथल और मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के नेतृत्व में हो रहे बदलाव भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गए हैं। जहां बांग्लादेश के कट्टरपंथी तत्व पाकिस्तान और चीन के प्रभाव में भारत-विरोधी एजेंडे को हवा दे रहे हैं, वहीं भारत की उदारवादी नीतियां सवालों के घेरे में हैं। यह असंतुलन न सिर्फ द्विपक्षीय संबंधों के लिए खतरा है, बल्कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी एक बड़ी चुनौती पेश कर रहा है। नीति निर्माताओं को याद रखना चाहिए कि "जो दुश्मन को दया दिखाता है, वह अपने ही लोगों के साथ विश्वासघात करता है।"  चाणक्य ने कहा था।

शेख हसीना के अगस्त 2024 में ढाका से पलायन के बाद से बांग्लादेश में भारत-विरोधी भावनाएं चरम पर हैं। अंतरिम सरकार ने भारतीय शिपयार्ड के साथ 21 मिलियन डॉलर के रक्षा सौदे को रद्द कर दिया और भारत के साथ व्यापार पर प्रतिबंध लगाए। जवाब में भारत ने बांग्लादेशी कपड़ा निर्यात पर 770 मिलियन डॉलर की रोक लगाई। ये कदम न सिर्फ आर्थिक संबंधों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, बल्कि दोनों देशों के बीच की कड़वाहट को भी बढ़ावा दे रहे हैं। अप्रैल में भारत सरकार ने देश के प्रमुख बंदरगाहों से बांग्लादेशी कार्गो के ट्रांशिपमेंट पर रोक लगाने के बाद रिश्तों में खटास और बढ़ चुकी है।

बांग्लादेश के कट्टरपंथी भारत को एक ‘तानाशाह पड़ोसी’ के रूप में पेश करते रहे हैं, जबकि वे यह भूल जाते हैं कि 1971 के युद्ध में भारत ने ही उन्हें पाकिस्तान के चंगुल से आजाद कराया था। आज, उसी बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले, अल्पसंख्यक नेताओं की हत्याएं और मंदिरों को निशाना बनाने की घटनाएं बढ़ रही हैं। सरकार इन्हें रोकने में नाकाम साबित हो रही है, या फिर शायद रोकना ही नहीं चाहती।  बांग्लादेश के भाग्य विधाताओं को याद रखना चाहिए कि नफरत की आग में घी डालने वाला, खुद भी जलकर राख हो जाता है।

एक सेवानिवृत फौजी ऑफिसर बताते हैं कि बांग्लादेश ने हिंदुओं के खिलाफ नरसंहार किया है। एक तरफ तो यह हिंदू नागरिकों का सफाया कर रहा है, और दूसरी तरफ रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुसलमानों को भारत के कई हिस्सों में धकेल रहा है। इस सबने जनसांख्यिकीय संरचना को बदल दिया है। अब यह पूर्वोत्तर, झारखंड, उड़ीसा, प. बंगाल और अन्य क्षेत्रों पर कब्जा करने के लिए अपनी ताकत दिखा रहा है। उनके अनुसार, किसी भी समस्या को टालना व्यर्थ ही रहेगा। अगर किसी के नितंबों पर फोड़ा हो, तो कान या नाक की जांच करने से कोई फायदा नहीं होगा।

बांग्लादेश में बढ़ते कट्टरपंथ के पीछे पाकिस्तान और चीन का प्रभाव साफ दिखाई देता है। बीते मार्च माह में यूनुस ने बांग्लादेश को ‘भारत के नॉर्थईस्ट का समुद्री रक्षक’ बताया, जो चीन की रणनीति को उजागर करता है। पाकिस्तान, जो हमेशा से भारत का दुश्मन रहा है, बांग्लादेश के कट्टरपंथियों को भड़का रहा है। 

अंतरिम सरकार ने जेलों से कट्टरपंथियों को रिहा किया है, जिसके बाद से अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ गए हैं। यह स्थिति बांग्लादेश को पाकिस्तान की तरह एक ‘टूटे हुए देश’ में बदल रही है, जहां अर्थव्यवस्था डूब रही है और सरकार चरमपंथियों के दबाव में काम कर रही है। गाली के मवाली जो सरकार को घेरे हुए हैं भूल रहे हैं, जो सांप को दूध पिलाता है, वह यह नहीं सोचता कि वह कब डस लेगा। 

बांग्लादेश की शत्रुतापूर्ण नीतियों के बावजूद, भारत ने चावल और अन्य सहायता भेजना जारी रखा है। विदेश मंत्रालय का मानना है कि यह उदारता बांग्लादेश को ‘जीत लेगी’, लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हो रहा है? 

प्रो. पारस नाथ चौधरी जैसे विश्लेषकों का मानना है कि यह नीति अब पुरानी हो चुकी है। श्रीलंका में यह रणनीति कामयाब रही, लेकिन बांग्लादेश एक अलग मामला है, जहां कट्टर इस्लामी तत्वों का वर्चस्व बढ़ रहा है। अमेरिका, चीन और पाकिस्तान की भूमिका इसे और जटिल बना रही है। "शत्रु को कमजोर समझना, अपनी हार को आमंत्रित करना है।" 

बांग्लादेश भारत के साथ 1,596 किमी की सीमा साझा करता है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है। चीन का बांग्लादेश के ‘चिकन नेक’ कॉरिडोर में बढ़ता प्रभाव भारत के उत्तर-पूर्व को ‘चोक’ कर सकता है। इसके बावजूद, भारत अपनी आर्थिक और सैन्य शक्ति का पूरा उपयोग नहीं कर रहा है। 

प्रो. चौधरी का सुझाव है कि भारत को बांग्लादेश पर सैन्य दबाव बढ़ाकर उसे ‘फिनलैंडाइजेशन’ यानी तटस्थता की ओर धकेलना चाहिए। यह विचार कठोर लग सकता है, लेकिन वर्तमान हालात में साहसिक निर्णय लेने की आवश्यकता है। अगर शेर शाकाहारी बन जाए, तो भेड़िये उस पर हंसेंगे ही।

भारत की नरम नीति अब नादानी नहीं, बल्कि खतरनाक साबित हो रही है। बांग्लादेश में कट्टरपंथी भले ही बहुमत में न हों, लेकिन उनका दबदबा बढ़ता जा रहा है। भारत को यह समझना होगा कि दुश्मन को मनाने से कुछ हासिल नहीं होगा। अब समय आ गया है कि भारत एक स्पष्ट और दृढ़ रुख अपनाए। समय रहते चेत जाना ही बुद्धिमानी है, वरना इतिहास की गर्त में समा जाना निश्चित है। 

क्या मोदी सरकार इस चुनौती का मुकाबला करने के लिए तैयार है? या फिर भ्रम के कोहरे में भटकती रहेगी? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।



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