फारस की खाड़ी का आसमान अब नीला नहीं रहा है। धुएं से सना, बैंगनी और बोझिल दिखता है। चालीस दिन तक चली जंग ने ज़मीन ही नहीं, फिज़ा को भी ज़ख़्मी कर दिया है।
धुआंधार बमबारी फिलहाल थामी है, मगर ख़तरा ज़िंदा है। अब बारूद नहीं, हवा चल रही है। जानकारों के मुताबिक ज़हरीला धुआं, सल्फर और बारीक गर्द का एक बड़ा गुबार अरब सागर के ऊपर से भारत की तरफ बढ़ने को बेकरार है। यह सिर्फ जंग का धुंधलका नहीं है बल्कि यह एक “मौसमी बम” है, जो धीरे-धीरे पाकिस्तान के सिर पर फटने को तैयार है, जिसका खामियाजा भुगतेगा समूचा क्षेत्र।
Read in English: Will West Asia’s 40-day inferno hijack India’s Monsoon?
खाड़ी देशों में हुए हमलों ने तेल रिफाइनरियों, गैस प्लांट और इंडस्ट्रियल हब को निशाना बनाया है। आग भड़की, और आसमान में ज़हर भर गया। तेहरान में “काली बारिश” देखी गई, जहां कार्बन और धुआं पानी के साथ गिरा। यह मंजर खौफनाक है। और, अब यही हवा भारत की ओर रुख कर सकती है।
भारत का मानसून कोई मामूली घटना नहीं है। यह एक नाज़ुक समूह गान है। ज़मीन की गर्मी और समंदर की नमी की जुगलबंदी बारिश को जन्म देते हैं। लेकिन, जंग ने इस तालमेल में खलल डाल दिया है। अब ये सुर बिखर सकते हैं।
वैज्ञानिक तीन बड़े खतरे गिना रहे हैं, और हर एक खतरा अपने आप में आफ़त है। पहला है ब्लैक कार्बन। तेल और ईंधन के जलने से निकला ये महीन धुआं सूरज की गर्मी को सोख लेता है। इससे हवा असामान्य रूप से गर्म हो जाती है। नतीजा? अचानक तेज़ और बेकाबू बारिश। कुछ घंटों में महीनों का पानी गिर सकता है। शहर डूब सकते हैं, गांव बह सकते हैं। और जो पानी गिरेगा, वह साफ नहीं, बल्कि तेजाबी हो सकता है, जो मिट्टी की उर्वरता छीन लेगा।
दूसरा खतरा है सल्फेट एरोसोल। ये कण सूरज की रोशनी को वापस अंतरिक्ष में भेज देते हैं। इससे ज़मीन ठंडी पड़ जाती है। इसके परिणामस्वरूप मानसून की ताकत घट सकती है। बारिश में देरी, बीच-बीच में रुकावट, और कई इलाकों में बिल्कुल गायब भी हो सकती है। किसान आसमान निहारता रहेगा, खेत प्यासे रह जाएंगे।
तीसरा खतरा सबसे खौफनाक है। अगर यह धुआं ऊपरी वायुमंडल तक पहुंच गया, तो यह ज्वालामुखी जैसा असर डाल सकता है। सूरज की रोशनी कम हो जाएगी, तापमान गिरेगा, और मानसून कई सालों तक कमजोर पड़ सकता है। यानी एक लंबा सूखा दौर, जो खेती और खाने की सुरक्षा दोनों को हिला देगा।
इतिहास गवाह है। 1991 में कुवैत के तेल कुओं में लगी आग ने दुनिया को झकझोर दिया था। उस धुएं का असर हिमालय तक महसूस हुआ। मगर आज हालात और भी संगीन हैं। इस बार आग ज्यादा बड़ी है, और समय भी बेहद नाज़ुक। मानसून आने ही वाला है।
इस पर अल नीनो का साया भी है। प्रशांत महासागर का यह चक्र अक्सर भारत में कमजोर मानसून लाता है। अब एक अजीब जंग छिड़ गई है। एक तरफ जंग से बना धुआं बारिश को तेज़ कर सकता है, दूसरी तरफ अल नीनो उसे दबाएगा। नतीजा होगा कहीं बाढ़, कहीं सूखा। पंजाब में पानी ही पानी, गुजरात में प्यास ही प्यास।
समंदर भी अब बीमार है। खाड़ी में फैले तेल ने पानी की सतह को ढंक लिया है। इससे भाप कम उठेगी, बादल कम बनेंगे, और बारिश की ताकत घटेगी। यह एक खतरनाक सिलसिला है। गंदा समंदर, कमजोर बादल, सूखी धरती।
भारत की खेती मानसून पर टिकी है। हर फसल का एक तय वक्त होता है। जब बारिश वक्त पर नहीं आती, तो बीज या तो सूख जाते हैं या बह जाते हैं। किसान की मेहनत मिट्टी में मिल जाती है। राजस्थान, हरियाणा, पंजाब जैसे इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं।
सच कड़वा है, मगर साफ है। आज की दुनिया में कोई जंग सीमित नहीं रहती। खाड़ी में लगी आग, केरल की बारिश को भी बदल सकती है। हवा की कोई सरहद नहीं होती।
इस साल जब मानसून के पहले बादल उठेंगे, लोग सिर्फ बारिश नहीं, उसकी फितरत भी देखेंगे। क्या यह राहत लाएगा या आफ़त? यह सवाल हर किसान, हर शहरवासी के दिल में होगा।
कुदरत अपना हिसाब चुकाती है, और अक्सर बिल किसी और के नाम भेजती है। युद्ध की इस आग का बिल भगवान न करे, भारत के किसान को चुकाना पड़े।






Related Items
क्या भारत में चुनाव जीतने का असली पासपोर्ट आज भी जाति का प्रमाणपत्र है?
भारत में भाप वाले इंजन से हाई स्पीड ट्रेन तक रेलवे की यात्रा
प्यासा भारत, सूखती नदियां; ‘डे ज़ीरो’ अब कहानी नहीं, दस्तक है…