भारतीय 'पहचान' का नया गणित : पासपोर्ट का मतलब 'नागरिकता' नहीं...!

बधाई हो! आपके पास भारतीय पासपोर्ट है। उसके पहले पन्ने पर बड़े गर्व से लिखा है: "Nationality: Indian." लेकिन, ज़्यादा खुश मत होइए। अब पता चला है कि यह किताब आपको दुनिया घुमा सकती है, पर यह साबित नहीं कर सकती कि आप भारतीय नागरिक हैं। वाह रे कागज़ी लोकतंत्र!

यानी, आप हवाई जहाज़ में चढ़ते समय भारतीय हैं। विदेश में फंस जाएं तो भारतीय दूतावास आपको अपना नागरिक मान लेगा। लेकिन, अगर किसी बाबू का मूड खराब हो गया तो वही पासपोर्ट अचानक ‘सिर्फ़ यात्रा दस्तावेज़’ बन जाएगा। नागरिकता? वह तो किसी दूसरी फाइल में बंद होगी।

गजब की सोच! आप एक साथ नागरिक भी हैं और नहीं भी। जब तक बाबू फाइल नहीं खोलता, आपकी नागरिकता हवा में झूलती रहती है। बेचारा आम आदमी सोच रहा है कि आखिर साबित क्या करे?

आधार है। नहीं चलेगा। पैन कार्ड है। नहीं चलेगा। वोटर आईडी है। नहीं चलेगा। राशन कार्ड है। नहीं चलेगा। पासपोर्ट है। अरे भाई, वह भी नहीं चलेगा! तो फिर चलेगा क्या?

शायद दादी की दाई का हलफ़नामा। या उस पीपल के पेड़ का प्रमाणपत्र जिसके नीचे आपके दादा जी  पहली बार दादी जी से मिले थे। हो सकता है अगले आदेश में कहा जाए कि अपने गांव की मिट्टी का नमूना, तीन पड़ोसियों के बयान और बचपन की स्कूल की स्लेट या जांघिया भी साथ लाना अनिवार्य है।

हमारा नौकरशाही तंत्र भी कमाल का है। पहले पुलिस सत्यापन। फिर दस्तावेज़ों की जांच। फिर फीस। फिर महीनों का इंतज़ार। अंत में आपको एक चमचमाता पासपोर्ट सौंपा जाता है और मुस्कुराकर कहा जाता है, "शुभ यात्रा! हां, एक छोटी-सी बात... इससे नागरिकता सिद्ध नहीं होती।"

यह वैसा ही है जैसे डॉक्टर आपको फिटनेस सर्टिफिकेट दे और नीचे लिख दे: "मरीज स्वस्थ है, लेकिन इसे स्वस्थ मानना कानूनी रूप से आवश्यक नहीं है।"

अब तो लगता है भारतीयों को अपने जन्म प्रमाणपत्र बैंक लॉकर में रखने पड़ेंगे। कुछ लोग उसे प्लास्टिक में लपेटकर ज़मीन में गाड़ देंगे। आने वाली पीढ़ियां सोना नहीं, जन्म प्रमाणपत्र खोदेंगी।

दुनिया के कई देशों में पासपोर्ट पहचान का अंतिम प्रमाण माना जाता है। भारत में यह शायद सबसे सुंदर भ्रम है। एक महंगी किताब, जिसमें आपकी फोटो है, आपका नाम है, आपकी राष्ट्रीयता लिखी है, लेकिन नागरिकता का सवाल अभी भी लंबित है।

कहते हैं, भारत चांद पर पहुंच गया है। डिजिटल क्रांति कर चुका है। यह दुनिया की सबसे तेज़ अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। लेकिन, भारतीय होने का प्रमाण ढूंढने की यात्रा अभी भी जारी है।

सावधान रहिए। अगली बार कोई पूछे, "क्या आप भारतीय नागरिक हैं?" तो पासपोर्ट मत दिखाइए। पहले पूछ लीजिए: "सर, आज कौन-सा प्रमाणपत्र मान्य चल रहा है?"

और हां, भविष्य के लिए तैयार रहिए। हो सकता है अगला सरकारी परिपत्र आए: "पासपोर्ट, आधार, पैन, वोटर आईडी और जन्म प्रमाणपत्र के साथ कृपया अपनी पहली किलकारी की ऑडियो रिकॉर्डिंग, नाल काटने वाली दाई का शपथपत्र, बचपन में लगवाए गए चेचक के टीके का निशान और पड़ोस के शर्मा जी का चरित्र प्रमाणपत्र भी संलग्न करें।"

कल्पना कीजिए, हवाई अड्डे पर इमिग्रेशन अधिकारी पूछ रहा है, "पासपोर्ट तो ठीक है, लेकिन क्या आपके पास यह प्रमाण है कि आपके परदादा 1912 में गलती से नेपाल घूमने नहीं गए थे?" पीछे खड़ी कतार में लोग फाइलों के बोरे लेकर खड़े हैं। एक ट्रॉली पर सूटकेस नहीं, दस्तावेज़ों के बंडल हैं। ट्रैवल एजेंसियां अब ‘स्विट्ज़रलैंड टूर’ के साथ ‘नागरिकता प्रमाण परामर्श’ का पैकेज भी बेच रही हैं। और, बेचारा भारतीय सोच रहा है कि काश नागरिकता भी रेलवे की वेटिंग लिस्ट की तरह होती। कम से कम चार्ट लगने पर पता तो चल जाता कि कन्फर्म हूं या अभी भी आरएसी में लटका हुआ हूं!

सरकार को एक 'नागरिकता वेरिफिकेशन ऐप' बना देना चाहिए, जहां हर पांच साल में साबित करना पड़े कि आप अब भी वही इंसान हैं जो पैदा हुआ था। शायद भविष्य में डीएनए टेस्ट और जन्मस्थान की मिट्टी की लैब रिपोर्ट भी ज़रूरी हो जाए: सिर्फ़ यह साबित करने के लिए कि आप अपने ही जीवन के नागरिक हैं!



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