भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 25 जून 1975 की तारीख एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज है, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल घोषित कर दिया था। 21 मार्च 1977 तक चले इस दौर में नागरिक स्वतंत्रताओं पर कठोर प्रतिबंध लगे, विपक्षी नेताओं को जेलों में डाल दिया गया और समाचारपत्रों पर सरकारी सेंसरशिप लागू कर दी गई। आज नरेंद्र मोदी के शासनकाल में भी विपक्ष, पत्रकारों और नागरिक अधिकारों के समर्थकों का एक वर्ग देश में ‘अघोषित आपातकाल’ होने का आरोप लगाता है। दोनों दौरों की तुलना करते समय सवाल उठता है कि क्या वास्तव में स्थितियां समान हैं, या राजनीतिक असहमति पर दबाव डालने के तरीके बदल गए हैं?
सबसे पहले दोनों के बीच एक बुनियादी अंतर को समझना जरूरी है। इंदिरा गांधी के समय आपातकाल संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत औपचारिक रूप से लगाया गया था। इसके बाद सरकार ने संवैधानिक प्रावधानों का इस्तेमाल करके नागरिक स्वतंत्रताओं को सीमित किया, प्रेस पर पूर्व-सेंसरशिप लगाई और राजनीतिक विरोधियों की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां की गईं। उस समय सरकार के पास असहमति को दबाने के लिए असाधारण कानूनी शक्तियां थीं। आपातकाल की घोषणा के बाद नागरिकों के मौलिक अधिकारों के न्यायिक प्रवर्तन पर भी गंभीर प्रतिबंध लगाए गए। विपक्ष के प्रमुख नेताओं से लेकर अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं तक को हिरासत में लिया गया। शाह आयोग और उस दौर के दस्तावेज इन कार्रवाइयों की गंभीरता को रेखांकित करते हैं।
इसके विपरीत, नरेंद्र मोदी के शासनकाल में राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा कोई औपचारिक आपातकाल घोषित नहीं किया गया है। संविधान के तहत चुनाव होते रहे हैं, विपक्षी दल चुनाव लड़ते हैं और संसद तथा विधानसभाओं में सरकार की जमकर आलोचना भी होती है। इसलिए, दोनों स्थितियों को संवैधानिक और कानूनी दृष्टि से समान बताना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। लेकिन, इससे यह निष्कर्ष भी नहीं निकलता कि मौजूदा दौर में लोकतांत्रिक संस्थाओं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या असहमति के अधिकार से जुड़ी चिंताएं निराधार हैं। किसी देश में औपचारिक आपातकाल के बिना भी संस्थागत दबाव, कानूनी कार्रवाइयों, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सामाजिक भय के कारण अभिव्यक्ति का दायरा सीमित हो सकता है। असली बहस इसी अंतर को समझने की है।
मीडिया के मामले में दोनों दौरों की तुलना और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। इंदिरा गांधी के आपातकाल में समाचारपत्रों को खबरें और संपादकीय प्रकाशित करने से पहले सरकारी सेंसरशिप का सामना करना पड़ता था। आलोचनात्मक सामग्री रोकी जा सकती थी और पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया। कई समाचारपत्रों ने दबाव के सामने समझौता किया, जबकि कुछ ने विरोध के प्रतीकात्मक तरीके अपनाए। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ द्वारा संपादकीय के स्थान पर खाली पृष्ठ रखा जाना उस दौर में प्रेस की स्वतंत्रता पर लगी रोक का चर्चित उदाहरण बना। समाचार एजेंसियों के विलय और प्रेस परिषद के उन्मूलन ने भी स्वतंत्र पत्रकारिता को कमजोर किया।
आज मीडिया का परिदृश्य इससे काफी अलग है। समाचारपत्रों, निजी टेलीविजन चैनल, डिजिटल पोर्टल, और स्वतंत्र पत्रकार कई सोशल मीडिया मंचों पर सरकार की लगातार आलोचना करते रहे हैं। इंटरनेट के विस्तार ने सूचना के प्रसार और वैकल्पिक आवाजों को कहीं अधिक व्यापक बनाया है। फिर भी मीडिया की स्वतंत्रता को केवल इस आधार पर नहीं मापा जा सकता कि आलोचनात्मक खबरें प्रकाशित हो रही हैं या नहीं।
यह भी देखना होगा कि पत्रकार बिना भय के सत्ता से सवाल पूछ पा रहे हैं या नहीं, मीडिया संस्थानों का स्वामित्व कितना विविध है, आलोचनात्मक रिपोर्टिंग के बाद क्या होता है और क्या सरकारी विज्ञापन, कानूनी कार्रवाई, मानहानि के मुकदमे अथवा ऑनलाइन धमकियां संपादकीय निर्णयों को प्रभावित करती हैं। लेकिन, ऐसा कम ही दिखता है। कई टीवी चैनलों और वेबसाइटों की पहचान 'मोदी विरोध' और 'मोदी समर्थन' की बन चुकी है। यहां तक कि दलगत आधार पर भी पत्रकारों के 'प्रकार' बन गए हैं।
मोदी सरकार के आलोचकों ने पत्रकारों और मीडिया संस्थानों पर दबाव, जांच एजेंसियों के कथित दुरुपयोग तथा सत्ता समर्थक माहौल में आत्म-सेंसरशिप को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। कई विदेशी संस्थाओं ने भी भारत में नागरिक स्वतंत्रता और मीडिया की स्थिति पर चिंता व्यक्त की है। हालांकि, इन संस्थाओं के आकलनों और उनकी पद्धतियों पर बहस है, लेकिन उनके निष्कर्षों को बिना विचार किए खारिज करना भी उचित नहीं होगा।
इस अंतर को समझना जरूरी है कि 1975 में समाचार प्रकाशित करने से पहले सरकारी अनुमति की व्यवस्था लागू थी, जबकि आज दबाव के अनेक आरोप ऐसी परिस्थितियों से जुड़े हैं जिनमें औपचारिक सेंसरशिप नहीं है, लेकिन उसके परिणामस्वरूप पत्रकार या संस्थान स्वयं ही स्वनिर्धारित कुछ मुद्दों पर चुप रहने का निर्णय ले सकते हैं। पहली स्थिति में नियंत्रण प्रत्यक्ष और संस्थागत था; दूसरी में नियंत्रण के आरोप अधिक बिखरे हुए, परिस्थितिजन्य और विवादित हैं। दोनों का लोकतंत्र पर असर पड़ सकता है, लेकिन दोनों को एक ही व्यवस्था का नाम देना उचित नहीं होगा।
अब उस सवाल पर आएं जो आम नागरिक के अनुभव से जुड़ा है। क्या आज दिल्ली के कनॉट प्लेस में खड़े होकर कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सार्वजनिक रूप से गाली दे सकता है? क्या इंदिरा गांधी के आपातकाल में ऐसा संभव था?
आज किसी प्रधानमंत्री के प्रति तीखी नाराजगी व्यक्त करना, नारे लगाना या सार्वजनिक रूप से उनकी आलोचना करना अपने आप में ऐसा कृत्य नहीं है जिसके कारण व्यक्ति को अनिवार्य रूप से गिरफ्तार किया जाए। कई मौकों पर प्रधानमंत्री मोदी ने खुद सामने आकर तीखे गालीबाजों को माफ किया है। इदिरा गांधी के जमाने में यह कतई संभव नहीं था।
इंदिरा गांधी के आपातकाल में ऐसी खुली राजनीतिक असहमति का जोखिम आज की तुलना में कहीं अधिक था। प्रमुख विपक्षी नेता पहले ही जेलों में बंद थे, प्रेस पर नियंत्रण था और सरकार के विरुद्ध संगठित विरोध करने की गुंजाइश बहुत सीमित कर दी गई थी। ऐसे माहौल में प्रधानमंत्री के खिलाफ सार्वजनिक रूप से अपमानजनक टिप्पणी करने वाला व्यक्ति गिरफ्तारी या अन्य दंडात्मक कार्रवाई के जोखिम से मुक्त नहीं माना जा सकता था।
समाज पर दोनों दौरों का प्रभाव भी अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है। इंदिरा गांधी के आपातकाल में भय का वातावरण मुख्यतः राज्य की प्रत्यक्ष दमनकारी शक्तियों से पैदा हुआ था। राजनीतिक विरोधियों की गिरफ्तारी, नागरिक अधिकारों पर प्रतिबंध और सेंसरशिप ने लोगों के सार्वजनिक व्यवहार को प्रभावित किया। कई लोग खुलकर बोलने से बचने लगे। सरकारी कार्यक्रमों और प्रशासनिक लक्ष्यों को लागू करने में भी सत्ता के केंद्रीकरण का प्रभाव दिखाई दिया। संजय गांधी से जुड़े परिवार नियोजन अभियानों और झुग्गी-बस्तियों को हटाने की कार्रवाइयों ने विशेष रूप से गरीब और कमजोर वर्गों को प्रभावित किया। आपातकाल के दौरान प्रशासनिक अनुशासन के नाम पर की गई ज्यादतियों ने अंततः सरकार की राजनीतिक विश्वसनीयता को भी नुकसान पहुंचाया।
आज के समाज में सोशल मीडिया के विस्तार ने नागरिकों को अपनी बात रखने का अभूतपूर्व अवसर दिया है, लेकिन इसी माध्यम पर अपमानजनक अभियानों, संगठित ट्रोलिंग, धार्मिक और राजनीतिक वैमनस्य तथा भ्रामक सूचनाओं का प्रसार भी बढ़ा है। सत्ता की आलोचना करने वाले पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिक कभी-कभी सरकारी कार्रवाई से अधिक राजनीतिक समर्थकों की ऑनलाइन प्रतिक्रिया से प्रभावित होते हैं। इस स्थिति को 1975 की राज्य-नियंत्रित सेंसरशिप के बराबर नहीं रखा जा सकता है, लेकिन सामाजिक वातावरण पर इसके प्रभाव की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती है।
दोनों दौरों की एक महत्वपूर्ण समानता सत्ता के केंद्रीकरण से जुड़ी बहस में दिखाई देती है। इंदिरा गांधी के समय प्रधानमंत्री कार्यालय और केंद्र सरकार में निर्णय लेने की शक्ति का अत्यधिक संकेंद्रण हुआ। विपक्ष को कमजोर करने और न्यायपालिका सहित अन्य संस्थाओं पर नियंत्रण बढ़ाने के प्रयासों ने लोकतांत्रिक संतुलन को प्रभावित किया। मोदी सरकार के आलोचक भी आरोप लगाते हैं कि निर्णय लेने की शक्ति प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के आसपास अधिक केंद्रित हुई है तथा संसद, जांच एजेंसियों और अन्य संस्थाओं की स्वतंत्रता पर प्रश्न उठे हैं। हालांकि, दोनों दौरों में संस्थागत दबाव की प्रकृति और सीमा समान नहीं रही है। किसी भी निष्कर्ष के लिए राजनीतिक आरोपों के बजाय संस्थाओं के वास्तविक कामकाज, न्यायिक फैसलों और उपलब्ध प्रमाणों को आधार बनाना चाहिए।
विपक्ष की स्थिति में भी उल्लेखनीय अंतर है। इंदिरा गांधी के आपातकाल में विपक्ष के बड़े नेताओं को जेल में डाल दिए जाने से उनके लिए राजनीतिक गतिविधियां चलाना कठिन हो गया था। प्रेस पर प्रतिबंधों ने उनकी आवाज जनता तक पहुंचने के रास्ते भी सीमित कर दिए। अंततः 1977 में चुनाव घोषित हुए, विपक्ष को राजनीतिक गतिविधियों का अवसर मिला और कांग्रेस को पराजय का सामना करना पड़ा। यह भारतीय लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का महत्वपूर्ण उदाहरण बना।
मोदी के शासनकाल में विपक्ष को चुनाव लड़ने, राज्य सरकारें चलाने, संसद में सवाल उठाने और सार्वजनिक सभाएं करने के अवसर मिल रहे हैं। दूसरी ओर, कुछ विपक्षी नेताओं के विरुद्ध केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई और संसदीय कार्यवाही को लेकर विवादों ने निष्पक्ष राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पर बहस को जन्म दिया है। इन सवालों का मूल्यांकन हर मामले के तथ्यों और न्यायिक निष्कर्षों के आधार पर होना चाहिए। विपक्ष की मौजूदगी अपने आप में लोकतंत्र की पूर्ण स्वस्थता का प्रमाण नहीं है, लेकिन उसे 1975 में लगभग बंद कर दिए गए राजनीतिक अवसरों के बराबर भी नहीं माना जा सकता है।
विदेश नीति और कूटनीतिक संबंधों के मामले में दोनों प्रधानमंत्रियों के सामने परिस्थितियां काफी अलग थीं। इंदिरा गांधी की विदेश नीति में सोवियत संघ के साथ निकटता और पश्चिमी देशों के साथ व्यावहारिक संबंधों के बीच संतुलन साधने की चुनौती बनी रही। 1975 में आपातकाल लागू होने के बाद अमेरिका, ब्रिटेन और कुछ अन्य पश्चिमी देशों में भारत की लोकतांत्रिक स्थिति को लेकर आलोचना हुई। अमेरिकी राजनयिक दस्तावेज बताते हैं कि आपातकाल के कारण भारत के कुछ पश्चिमी देशों के साथ संबंधों में तनाव पैदा हुआ और प्रेस पर नियंत्रण ने अंतर्राष्ट्रीय धारणा को प्रभावित किया।
आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी की विदेश नीति केवल घरेलू राजनीतिक संकट की प्रतिक्रिया नहीं थी। भारत ने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को संभालने और चीन के साथ संवाद की संभावनाएं तलाशने का प्रयास भी किया। फिर भी आंतरिक लोकतांत्रिक प्रतिबंधों ने भारत की अंतर्राष्ट्रीय छवि को बहुत नुकसान पहुंचाया। एक लोकतांत्रिक देश के रूप में भारत की प्रतिष्ठा उसकी विदेश नीति की महत्वपूर्ण पूंजी थी, जिसे आपातकाल के दौरान लगे प्रतिबंधों ने बेहद कमजोर किया।
नरेंद्र मोदी की विदेश नीति का संदर्भ अलग है। आज भारत एक अधिक वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था है और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में उसकी भूमिका व्यापार, तकनीक, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र की रणनीति से जुड़ी है। मोदी सरकार ने अमेरिका के साथ रणनीतिक और रक्षा संबंधों को मजबूत करने, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ सहयोग बढ़ाने तथा जी20, जी7, क्वाड, ब्रिक्स व एससीओ जैसे मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाने पर जोर दिया है। रूस के साथ पुराने रक्षा और ऊर्जा संबंधों को बनाए रखते हुए पश्चिमी देशों के साथ साझेदारी बढ़ाना भी उसकी कूटनीति का अहम हिस्सा रहा है। इस दृष्टि से भारत ने किसी एक शक्ति-गुट पर पूरी तरह निर्भर होने के बजाय विभिन्न देशों के साथ अपने हितों के अनुरूप संबंध बनाए रखने की कोशिश की है। इस तरह, नरेंद्र मोदी को इंदिरा गांधी की तुलना में थोड़ा ऊंचा स्थान मिलता है।
पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में भी अवसर और चुनौतियां दोनों हैं। बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, मालदीव और भूटान के साथ भारत के संबंधों में सहयोग के साथ-साथ राजनीतिक उतार-चढ़ाव भी आए हैं। पाकिस्तान के साथ संबंध आतंकवाद और सुरक्षा संबंधी चिंताओं से प्रभावित रहे हैं। चीन के साथ आर्थिक संबंधों के बावजूद सीमा विवाद और सैन्य तनाव ने गंभीर चुनौती पैदा की है।
दोनों प्रधानमंत्रियों की विदेश नीति की तुलना करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इंदिरा गांधी के दौर में भारत की प्राथमिकताएं क्षेत्रीय सुरक्षा, गुटनिरपेक्षता और शीतयुद्ध की शक्ति-राजनीति से अधिक प्रभावित थीं। मोदी के दौर में भारत वैश्विक आर्थिक नेटवर्क, तकनीकी साझेदारियों, निवेश और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
अंततः इंदिरा गांधी के घोषित आपातकाल और नरेंद्र मोदी के शासनकाल में लगाए जाने वाले ‘अघोषित आपातकाल’ के आरोपों के बीच सबसे बड़ा फर्क यह है कि पहले दौर में संविधान के तहत आपातकाल लागू करके नागरिक स्वतंत्रताओं और राजनीतिक गतिविधियों पर प्रत्यक्ष, व्यापक और औपचारिक प्रतिबंध लगाए गए थे। आज की चिंताएं मुख्यतः संस्थागत स्वतंत्रता, मीडिया पर दबाव, जांच एजेंसियों की निष्पक्षता, राजनीतिक ध्रुवीकरण और असहमति के लिए उपलब्ध वास्तविक अवसरों से जुड़ी हैं। इन चिंताओं को गंभीरता से जांचना चाहिए, लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी करके दोनों स्थितियों को एक जैसा घोषित नहीं करना चाहिए।
लोकतंत्र केवल इस बात से मजबूत नहीं होता है कि चुनाव होते हैं या प्रधानमंत्री की आलोचना संभव है या नहीं। उसकी असली ताकत इस बात में है कि नागरिक बिना अनुचित भय के अपनी राय रख सकें, पत्रकार सत्ता से सवाल पूछ सकें, विपक्ष स्वतंत्र रूप से काम कर सके, न्यायपालिका निष्पक्ष रहे और सरकार अपने आलोचकों के अधिकारों का भी सम्मान करे। इंदिरा गांधी के आपातकाल ने दिखाया कि संवैधानिक शक्तियों का दुरुपयोग लोकतंत्र को कितनी तेजी से कमजोर कर सकता है। आज की राजनीतिक व्यवस्था के लिए भी यही सबक प्रासंगिक है कि किसी सरकार की लोकप्रियता या चुनावी सफलता उसे आलोचना से ऊपर नहीं रख देती है। भारत की लोकतांत्रिक परंपरा की वास्तविक परीक्षा इसी में है कि सत्ता कितनी मजबूत है, इससे अधिक यह कि नागरिकों के अधिकार कितने सुरक्षित हैं।

Related Items
यमुना की बर्बादी पर सरकारी तंत्र बना मूक दर्शक
पुलिस कहे, जाइए; नेता कहे, आइए; कैमरा कहे, थोड़ा मुस्कुराइए!
कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे हैं राहुल गांधी या पार्टी को ले जा रहे हैं गर्त की ओर...