क्या हम ताज महल को बचा रहे हैं, या धीरे-धीरे उसे धूल, धुंध और धुएं में दफ़न कर रहे हैं? आगरा की हवा साल के अधिकांश दिनों में ज़हरीली रहती है।
हर दिन उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम गुजरने वाले हज़ारों ट्रक, डंपर, बसें और भारी वाहन शहर की सांसों पर नया बोझ डालते हैं। यमुना और सहायक नदियां सूख रही हैं, तालाब और झीलें गायब हो चुकी हैं, पेड़ों की हरियाली घट रही है और सड़कों पर बेकाबू ट्रैफिक दम घोंट रहा है। ऐसे हालात में ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन में नए उद्योगों की अनुमति देने से पहले हर फ़ायदे और संभावित नुक़सान का गहरा, वैज्ञानिक आकलन ज़रूरी है। आज का छोटा फ़ैसला आने वाली पीढ़ियों के लिए बड़ी पर्यावरणीय त्रासदी बन सकता है।
ताज ट्रिपेजियम जोन, लगभग 10,400 वर्ग किमी, में 1990 के दशक से वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ी है। 1990 के आसपास आगरा क्षेत्र में लगभग 1.9–2.1 लाख वाहन थे; 2026 के मध्य तक निजी वाहन संख्या लगभग 8.5 लाख तक पहुंच गई। आरटीओ का कुल आंकड़ा करीब 16.9 लाख था। यह 35 वर्षों में 4–8 गुना वृद्धि है।
स्थानीय वाहनों की यह वृद्धि पारगमन यातायात से और बढ़ जाती है। आगरा यमुना एक्सप्रेसवे पर रोज़ाना 50,000 से अधिक वाहन गुजरते हैं। आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर भारी यातायात है। राष्ट्रीय राजमार्गों से भी हज़ारों ट्रक और बसें गुज़रती हैं। स्थानीय और पारगमन यातायात से वाहन-किलोमीटर लगातार बढ़ रहे हैं, जिससे प्रदूषण नियंत्रण के हालिया प्रयास कमजोर पड़े हैं। अध्ययन और आधिकारिक आकलन बार-बार वाहनों को टीटीजेड की हवा की गुणवत्ता की समस्या का प्रमुख कारण बताते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने 2024 के पूर्ण प्रतिबंध में कुछ राहत देते हुए टीटीजेड में लगभग 400 लंबित गैर-प्रदूषणकारी एमएसएमई आवेदनों पर विचार करने की अनुमति दी। इसे उद्योगों के लिए खुला निमंत्रण नहीं समझना चाहिए। अदालत ने रोज़गार और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने का निर्देश दिया है; हर आवेदन को नीरी और सीईसी के विशेषज्ञों की सहमति से मंज़ूरी लेनी होगी और विवाद में अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट करेगा। भविष्य में किसी भी ढील को बेहद एहतियात के साथ ही देना चाहिए। क्षेत्र की हवा अभी भी चिंताजनक है और खतरे टले नहीं हैं।
साल 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने कोयला से चलने वाले सैकड़ों उद्योगों को प्राकृतिक गैस अपनाने या बंद करने का आदेश दिया था। तब सल्फर डाइऑक्साइड का स्तर 17–22 µg/m³ और एसपीएम 400–750 µg/m³ तक थे। आदेश से सल्फर डाईऑक्साइड घटकर 4–10 µg/m³ रह गया और नाइट्रोजन ऑक्साइड भी कम हुआ, जिससे ताज महल को पहुंचने वाले नुकसान में राहत मिली।
फिर भी पूरा चित्र तसल्लीबख़्श नहीं है। बारीक धूल-कण अभी भी बहुत अधिक हैं। पीएम10 कई स्थानों पर 120–180 µg/m³ या अधिक दर्ज होता है; संवेदनशील क्षेत्रों की सीमा 60 है। पीएम2.5 का वार्षिक औसत अक्सर 80–100 µg/m³ रहता है। सर्दियों में स्थिति और ख़राब होती है। मानसून में वायु गुणवत्ता कभी-कभी सामान्य रहेती है, पर सर्दियों में अक्सर ‘खराब’ या ‘गंभीर’ श्रेणी में पहुंच जाती है। यही धूल ताज महल पर जमती है और लोगों की सेहत पर बुरा असर डालती है। पिछले तीन दशकों में सुधार हुआ है, पर मंज़िल अभी दूर है।
प्रदूषण का कारण सिर्फ़ उद्योग नहीं है। यमुना लगभग सूख चुकी और प्रदूषित है; नदी अब वह नमी और ठंडक नहीं देती जो कभी आसपास का प्राकृतिक वातावरण बनाए रखती थी। मिट्टी कटाव बढ़ रहा है, हरियाली घट रही है; कुछ हिस्सों में हरित क्षेत्र लगभग सात प्रतिशत रह गया है। पेड़ों की कमी से धूल नियंत्रित नहीं हो पाती। सड़कों की धूल, निर्माण, छोटे उद्योग, वाहनों का धुआं और पराली/बायोमास जलाने का धुआं भी संकट बढ़ा रहे हैं।
इन हालात में टीटीजेड को और खोलना, चाहे उद्योग ‘गैर-प्रदूषणकारी’ ही क्यों न हों, सुरक्षित नहीं है। क्षेत्र की पर्यावरणीय वहन क्षमता का पूर्ण अध्ययन नहीं हुआ है और विज़न डॉक्यूमेंट लंबित है। एक बार उद्योग लग जाने के बाद नियमों का सख़्ती से पालन कराना मुश्किल रहा है। नए उद्योगों से यातायात, निर्माण और ऊर्जा की मांग बढ़ेगी, जिससे अब तक मिले लाभ कमजोर पड़ सकते हैं।
इसलिए, आगे बढ़ने का रास्ता सोच-समझकर तय किया जाना चाहिए। केवल उन्हीं व्हाइट और ग्रीन श्रेणी के एमएसएमई को अनुमति मिलनी चाहिए जो बिजली या प्राकृतिक गैस का उपयोग करें और जिनकी हर आवेदन पर विशेषज्ञों द्वारा गहराई से जांच हो। प्रक्रिया पारदर्शी रखी जाए।
साथ ही, यमुना में स्वच्छ जल बहाल करना, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण, मिट्टी संरक्षण, सड़कों व वाहनों पर कड़ा नियंत्रण और वायु गुणवत्ता की निगरानी व रिपोर्टिंग भी ज़रूरी हैं। जब तक धूल-कणों का स्तर स्पष्ट रूप से घटकर क्षेत्र की पर्यावरणीय क्षमता मज़बूत न हो जाए, उद्योगों को और छूट नहीं दी जानी चाहिए।
ताज महल केवल एक इमारत नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के पर्यावरण की सेहत का आईना है, साल 1996 के सख्त नियमों ने प्रदूषण घटाने में यह सिद्ध किया था।

बृज खंडेलवाल





Related Items
ताज से परे, एक चौराहे पर खड़ा शहर बन गया है आगरा...
पश्चिम एशिया के धुएं में खोती इंसानियत...! गुम हैं, अमन के सिपाही
ताज तो आकर्षित करता ही है, और आगरा के नर्सिंग होम भी…