ताज से परे, एक चौराहे पर खड़ा शहर बन गया है आगरा...


तीन विश्व धरोहर स्मारक और लगभग आधा दर्जन अलग आकर्षणों को अपनी गोद में रखे आगरा शहर एक अजीब उलझन में फंसा दिखता है। यह शहर न तो हेरिटेज सिटी बन पाया और न ही स्मार्ट सिटी, आज आगरा की पहचान ‘जाम नगरी’ की बन चुकी है।

हर साल करोड़ों लोग ताज महल के संगमरमर की चमक देखने आते हैं, मगर उसकी रौनक से थोड़ा हटकर शहर की हालत देखेंगे तो दिल बैठ जाएगा। लापरवाही, बदइंतजामी और सीमित सोच ने इसे सिर्फ एक मृत शहर बना दिया है, जहां बाकी सब कुछ धुंधला पड़ गया है।

आंकड़े तो साफ-साफ चीख रहे हैं। साल 2024 में ताज महल ने करीब 6.1 मिलियन देसी सैलानियों का स्वागत किया, जो 2023 के 5.05 मिलियन से 20.7 फीसदी ज्यादा है, यानी कोरोना से पहले वाली भीड़ वापस लौट आई। कुल मिलाकर आगरा में 7-8 मिलियन मेहमान पहुंचे।

लेकिन, विदेशी पर्यटकों की कहानी दिल तोड़ने वाली है। सिर्फ सात लाख से थोड़े ज्यादा विदेशी यहां आए, जबकि 2019 में यह आंकड़ा आठ लाख से ऊपर था। पूरे भारत में 2024 में रिकॉर्ड दो करोड़ विदेशी सैलानी आए, 2019 से 20 लाख ज्यादा, मगर आगरा की रिकवरी रुक सी गई। 2022-23 में तो ताज पर विदेशी सिर्फ चार लाख ही रह गए।

क्यों हो रहा है यह? क्योंकि, आगरा लोगों की दिलचस्पी और सपनों को सच्ची मोहब्बत में नहीं बदल पा रहा है। ज्यादातर विदेशी दिल्ली से सुबह ट्रेन या कार से आते हैं, ताज के साथ फटाफट सेल्फी लेते हैं और शाम तक लौट जाते हैं। ये बस 'टच-एंड-गो' वाली जगह बनकर रह गया है।

यहां 500 से ज्यादा होटल हैं, लेकिन ऑक्यूपेंसी रेट 60 फीसदी से ऊपर मुश्किल से जाती है। वहीं जयपुर—छोटा सा शहर, कम मशहूर—अपने चहकते बाजारों, सांस्कृतिक जलसों और बेहतर सफाई से मेहमानों को रोक लेता है। यहां तक कि मैसूर में देसी सैलानी आगरा से ज्यादा आते हैं!

एक लोकल होटेलियर का दर्द सुनो। "ताज से बाहर कदम रखते ही आगरा की कमियां आंखों में चुभने लगती हैं। आवारा कुत्ते और बंदर सैलानियों पर झपट्टा मारते हैं, गार्ड गुलेल से उन्हें भगाते फिरते हैं। ट्रैफिक हर वक्त जाम, मेट्रो का काम और टूटी सड़कें हाल बदतर बनाती हैं। सफाई की कमी, ठगों की चालाकी और मरती यमुना की बदबू हर गली में मुंह चिढ़ाती है। खुद ताज की संगमरमर पर प्रदूषण की कालिख चढ़ गई है, और उसका अक्स सूखे, गंदे दरिया में बिगड़कर रह गया है।"

पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं कि आगरा की मुसीबत सिर्फ ढांचे की नहीं बल्कि सोच की भी है। साल 1993 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण फैलाने वाली फैक्टरियों और कांच इकाइयों को बंद करवाया, तो कई लोग ताज को रोजगार का दुश्मन मान बैठे।

लोक स्वर के अध्यक्ष राजीव गुप्ता कहते हैं, "लाखों लोग बेघर हो गए, कारखाने उजड़ गए, मगर नए रोजगार के रास्ते कभी पूरे नहीं खुले। यह गुस्सा आज भी सुलग रहा है। पर्यटन को सबका साझा मिशन बनाने की बजाय बोझ समझा जाता है। कभी इंडस्ट्री का हब रहा शहर अब लटका हुआ है, न आधुनिक इकोनॉमी और न विरासत की राजधानी।"

शाम ढलने के बाद सैलानी का हाल देखो तो और अफसोस होता है। दुनिया के दूसरे हेरिटेज शहरों में शामें गुलजार रहती हैं, सांस्कृतिक प्रोग्राम, रिवरफ्रंट की सैर, लजीज खाने की महफिलों से..., लेकिन आगरा में शाम होते ही सब शटर डाउन। कोई नाइटलाइफ नहीं, कोई कहानियां नहीं, कोई इतिहास का थिएटर नहीं। सैलानी होटल में बंद हो जाते हैं या अगली ट्रेन पकड़ लेते हैं। तभी तो इत्माद-उद-दौला और राम बाग जैसी जगहें सूनी पड़ी रहती हैं, जबकि ये मुगल सर्किट की जान बन सकती हैं। टूरिस्ट गाइड वेद बताते हैं, "प्रॉब्लम है यमुना पार करना, हर वक्त ट्रैफिक जाम लगा रहता है।"

फिर भी, आगरा में संभावनाएं बहुत हैं, उम्मीद की किरण अभी बाकी है। ताज के अलावा आध्यात्मिक, सांस्कृतिक विरासत यहां छिपी हुई है। आगरा फोर्ट, फतेहपुर सीकरी, मुगल गार्डन, और हस्तकला इसे सांस्कृतिक पर्यटन का केंद्र बना सकते हैं। कनेक्टिविटी आने वाले वक्त में सुधरेगी। नया खेरिया एयरपोर्ट टर्मिनल बिल्डिंग के निर्माण के बाद अन्य शहरों से जुड़ाव होगा। आगरा-अलीगढ़ एक्सप्रेसवे से सफर अब सिर्फ एक घंटे का, मेट्रो पूरी होने पर शहर घूमना आसान होगा। स्मार्ट सिटी प्लान से सफाई-सुविधा बेहतर हो सकती है।

यमुना का इको-रिस्टोरेशन, भीड़ प्रबंधन और जानवरों पर नियंत्रण से सब कुछ बदल सकता है। यमुना रिवर फ्रंट, बैराज, क्रूज, की सुविधाएं जब मिलने लगेंगी और इंटरनेशनल म्यूजियम खुल जाएगा, तो टूरिस्ट स्टे बढ़ेगा। तब तक शहरवासी टूरिस्ट फ्रेंडली होने के गुर सीखें...।

पर्यटन पहले ही आगरा की इकोनॉमी में 10-15 फीसदी हिस्सा देता है। अगर सुधार और विजन आए तो यह दोगुना हो सकता है।

ताज हमेशा चमकेगा, लेकिन अगर आगरा खुद न जागा तो यह रौनक अधूरी और एकतरफा रह जाएगी।



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