वादे पूरे न करना केजरीवाल के लिए बन सकता है बड़ा संकट


अरविन्द केजरीवाल के लिए दिल्ली चुनाव में विजयश्री प्राप्त करना, उनके राजनीतिक अस्तित्व के लिए एक बड़ी चुनौती है। यदि वह पराजित हुए तो इससे न केवल उनकी राजनीतिक छवि धूमिल होगी, बल्कि पंजाब में भी उनके लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती है।

माना जा रहा है कि दिल्ली में चुनाव ने कांग्रेस, भाजपा और आम आदमी पाटी के मध्य एक त्रिकोणीय आकार लिया है। हालांकि, दिल्ली में कांग्रेस का वोट प्रतिशत मात्र 6-7 प्रतिशत ही है, लेकिन यदि कांग्रेस ने इसमें 12 फीसदी तक की वृद्धि कर ली, तो अरविन्द केजरीवाल के लिए दिल्ली की जीत दुर्लभ हो जाएगी।

कांग्रेस का यह मानना है कि अरविन्द केजरीवाल ने उनको गुजरात व हरियाणा के विधानसभा चुनावों में अत्यधिक क्षति पहुंचाई थी। इन प्रदेशों में कांग्रेस के अनुसार उनकी पराजय का प्रमुख कारण अरविन्द केजरीवाल की अपरिपक्वता रही। कहा जा रहा है कि कांग्रेस अब अपना प्रतिशोध लेने के लिए तत्पर है।

यदि अरविन्द केजरीवाल के पिछले 11 वर्ष के शासनकाल पर दृष्टिपात किया जाए तो उन्होंने दिल्ली वालों के समक्ष किए कई वादों को नहीं निभाया है। वर्ष 2013 में अरविन्द केजरीवाल, लोकपाल की नियुक्ति के लिए संघर्षरत थे, परन्तु सम्पूर्ण शासनकाल में वह लोकपाल की नियुक्ति नही कर पाए।

दिल्ली की जनता को पानी की निर्विघ्न आपूर्ति का आश्वासन दिया गया था और टैंकर माफिया को समाप्त करने का वचन दिया गया था, परन्तु, वह इन दोनों ही वचन की पूर्ति करने में असफल रहे। इसके इतर 1000 पानी के अतिरिक्त टैकरों को लाइसेंस देकर वह स्वयं को संदेह के घेरे में ले आए।

यमुना नदी को भी अपने वचन के अनुरूप स्वच्छ, पावन तथा निर्मल नहीं कर पाए। इसी के साथ-साथ कूड़े के ढेरों को हटाने का भी वचन पूर्ण नहीं कर पाए। अपितु कूड़े के ढेर पहाड़ सदृश हो गए। केजरीवाल ने दिल्ली में दो लाख सार्वजनिक शौचालयों के निर्माण का वचन दिया था, परन्तु यह वचन भी अपूर्ण रहा।

अरविन्द केजरीवाल शिक्षा के क्षेत्र में अपने किए गए कामों का भी अत्यधिक प्रचार करते रहे हैं। इसके अन्तर्गत उन्होंने 500 स्कूलों के निर्माण का वचन दिया था, परन्तु अपने प्रथम कार्यकाल में वह 29 और द्वितीय कार्यकाल में मात्र 14 ही विद्यालय बना पाए। वह अपने 11 वर्ष के कार्यकाल में एक भी उच्च शिक्षा का विश्वविद्यालय या महाविद्यालय नहीं खोल पाए। प्रतिवर्ष 20 लाख बेरोजगारों को रोजगार देने का वचन तो वह पूर्णतया भूल गए।

राजनीति में प्रवेश करते समय उन्होंने यह प्रतिज्ञा ली थी कि वह ‘सादा जीवन-उच्च विचार’ के आदर्शों पर चलेंगे, परन्तु उन्होंने दोनों ही प्रतिज्ञाओं को विस्मृत करते हुए 34 करोड़ की धनराशि की आलीशान कोठी का निर्माण किया, जिसमें समस्त आधुनिक सुख सुविधाएं विद्यमान हैं।

इसके अतिरिक्त, अन्य अनेक आश्वासन उनके द्वारा जनता से किए गए, वे सब भी उनकी राजनैतिक महत्वाकांक्षा के कारण पूर्ण नहीं हो पाए और चुनाव के दौरान वह जनता के समक्ष अपने नए-नए वचनों का पिटारा खोलते रहे। यदि हम उनके कार्यकाल में हुए घोटालों की चर्चा करें तो उसकी भी एक लम्बी सूची बन सकती है, लेकिन उसकी चर्चा चुनाव बाद अलग से करेंगे।

अन्तत:, राज्य में तीनों मुख्य दलों के राजनीतिक भाग्य का निर्णय तो दिल्ली की जनता कर ही चुकी है। अब देखना यह है कि कौन अपनी विजयश्री पताका फहराता है।

(लेखक आईआईएमटी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं और यहां व्यक्त विचार उनके स्वयं के हैं)



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