हिंदू धर्म में ऐसी कई धार्मिक यात्राओं का उल्लेख मिलता है, जिनके बारे में माना जाता है कि जीवन में एक बार इन्हें पूरा करने पर किसी भी व्यक्ति को मोक्ष या मृत्यु के बाद भगवान का धाम मिलता है। साथ ही, उस यात्रा का फल आगे आने वाली कई पीढ़ियों को भी मिलता रहता है। ऐसी ही एक यात्रा है किन्नौर कैलाश की...।
हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में तिब्बत सीमा के निकट स्थित किन्नौर कैलाश पर्वत समुद्र तल से 6050 मीटर की ऊंचाई पर है। अत्यधिक ऊंचाई पर होने के कारण शिवलिंग चारों ओर से बादलों से घिरा रहता है। किन्नर कैलाश का यह प्राकृतिक सौंदर्य मंत्र मुग्ध कर देने वाला होता है।
इसे ‘किन्नर कैलाश’ के नाम से भी जाना जाता है। ‘किन्नर’ शब्द के साथ कई पौराणिक अर्थ जुड़े हुए हैं। इसका उल्लेख शिव पुराण, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण, रामायण और राजतरिंजिनी सहित कई ग्रंथों में किया गया है। प्रसिद्ध कवि कालीदास ने किन्नौर के किन्नर लोगों के बारे में बहुत कुछ लिखा है। उन्होंने अपनी उत्कृष्ट कृति मेघदूतम् में किन्नरों को मधुर आवाज वाले आकर्षक लोगों के रूप में दर्शाया है जो भगवान कुबेर के राज दरबार में गाते और नाचते थे।
किन्नौर कैलाश पर्वत पर स्थापित हिमखंड एक प्राकृतिक शिवलिंग है। यह प्राकृतिक 79 फुट ऊंचा शिवलिंग दिनभर के दौरान रंग बदलता रहता है। सूर्योदय से ठीक पहले यह सफेद, सूर्योदय के समय पीला, सूर्यास्त के ठीक बाद लाल और रात होने से ठीक पहले यह काला हो जाता है। यह एक कंक्रीट के खंभे जैसी रचना है जिसे त्रिशूल जैसी दिखने वाली चट्टान पर सावधानी से संतुलित किया गया है। यह चट्टान माउंट कैलाश और माउंट जोर्कंडेन की 20 हजार फीट ऊंची किन्नौर कैलाश पर्वतमाला के बीच में है।
किन्नौर कैलाश पवित्र पांच पर्वतों में से एक है। इस यात्रा को मानसरोवर और अमरनाथ की यात्रा से भी कठिन माना जाता है। किन्नौर कैलाश पर्वत भगवान शिव के सबसे पुराने निवास स्थान में से एक है। किन्नौर कैलाश की यात्रा हर साल सावन के महीने में शुरू होती है। यह यात्रा 2-3 दिन में पूरी हो जाती है। यात्रा पूरी करने के बाद भक्त यहां मौजूद शिवलिंग की पूजा करते हैं। किन्नौर कैलाश को बौद्ध अनुयायी भी पवित्र मानते हैं।
एक पौराणिक कथा के अनुसार, इस पर्वत पर ही भगवान शिव और माता पार्वती ने एक-दूसरे को पहली बार देखा था। माना जाता है कि जब शिव-पार्वती का मिलन हुआ, तब ब्रह्म कमल का पुष्प इस स्थान पर खिल उठा, जिसका तेज पूरे संसार में फैल गया। कहा जाता है कि आज भी किन्नौर कैलाश की यात्रा के दौरान अक्सर ब्रह्म कमल के फूल दिखते हैं। माना जाता है कि यह फूल सिर्फ उन्हें ही नजर आता है, जिनका मन पवित्र होता है।
यह भी मान्यता है कि शोणितपुर राज्य के राजा बाणासुर ने किन्नर कैलाश पर ही भगवान शिव की आराधना की थी। रावण भी जब मानसरोवर की यात्रा पर गया था तो उसने किन्नर कैलाश में ही तपस्या की थी। महाभारत के अनुसार, दिव्यास्त्रों के लिए अर्जुन ने भी यहीं पर तपस्या की थी। उन दिनों इसका नाम ‘इन्द्रकील पर्वत’ हुआ करता था। किन्नर कैलाश पर ही भगवान श्री कृष्ण के पोते का विवाह हुआ था।
यह यात्रा अगस्त के महीने में शुरू होती है और एक दिन में केवल 200 तीर्थयात्रियों को जाने की अनुमति मिलती है। किन्नौर कैलाश जाने का रास्ता बहुत कठिन है। यह मार्ग दो बेहद ही मुश्किल दर्रों से होकर गुजरता है। पहला लालांति दर्रा और दूसरा चारंग दर्रा है। यात्री ऑनलाइन या ऑफलाइन किसी भी माध्यम से इस यात्रा के लिए पंजीकरण करा सकते हैं। बिना पंजीकरण यात्रा संभव नहीं है।
सबसे पहले, सभी यात्रियों को इंडो-तिब्बत बार्डर पुलिस पोस्ट पर यात्रा के लिए अपना पंजीकरण कराना होता है। यह पोस्ट 8,727 फीट की ऊंचाई पर है। यह किन्नौर जिला मुख्यालय रेकांग प्यो से 41 किमी की दूरी पर है। उसके बाद लांबार के लिए प्रस्थान करना होता है जो 10 किलोमीटर की दूरी और 9,678 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां जाने के लिए खच्चरों का सहारा लिया जा सकता है।
इसके उपरांत 11,319 फीट की ऊंचाई पर स्थित चारांग के लिए चढ़ाई करनी होती है। इसमें कुल आठ घंटे लगते हैं। लांबार के बाद ज्यादा ऊंचाई के कारण पेड़ों की संख्या कम होती जाती है। चारांग गांव के शुरू होते ही सिंचाई और स्वास्थ्य विभाग का गेस्ट हाउस मिलता है। इसके आसपास टेंटों में यात्री विश्राम करते हैं। इसके बाद छह घंटे की चढ़ाई वाले 14,108 फुट की ऊंचाई पर स्थित ललांति के लिए चढ़ाई शुरू हो जाती है। समुद्र तल से 14,900 फुट ऊपर ‘पार्वती कुंड’ किन्नौर कैलाश पर्वत के पास स्थित है। एक मान्यता के अनुसार, देवी पार्वती ने स्वयं इस कुंड का निर्माण किया था। इसके निकट ‘गणेश बाग’ है।
चारांग से दो किलोमीटर की ऊंचाई पर रंग्रिक तुंगमा का मंदिर स्थित है। इसके बारे में कहा जाता है कि बिना इस मंदिर के दर्शन किए हुए परिक्रमा अधूरी रहती है। इसके बाद 14 घंटे लंबी चढ़ाई की शुरूआत हो जाती है। एक ओर जहां ललांति दर्रे से चारांग दर्रे के लिए लंबी चढ़ाई करनी होती है, वहीं दूसरी ओर चितकुल देवी की दर्शनों के लिए लंबी दूरी तक उतरना होता है।
यहां पर घूमने का सबसे अच्छा समय मई से अक्टूबर माह के बीच होता है, क्योंकि इस समय इसकी खूबसूरती अलग ही होती है। सर्दियों के महीने में यहां बर्फ बहुत रहती है। इस वजह से यहां ट्रेकिंग करना मुश्किल हो जाता है। यहां पर बारिश भी बहुत ज्यादा होती है जिस वजह से मानसून में यहां आने के लिए मना किया जाता है। यहां पर चढ़ाई करना बेहद मुश्किल है क्योंकि 14 किलोमीटर लंबे इस ट्रेक के आस-पास बर्फीली चोटियां हैं।
यहां के सेब के बागान, सांग्ला और हंगरंग घाटी के नजारे बेहद विहंगम होते हैं। इस ट्रेक का सबसे पहला पड़ाव सतलुज नदी के किनारे बसा तांगलिंग गांव है। यहां से आठ किलोमीटर दूर मलिंग खटा तक ट्रेक करके जाना पड़ता है। इसके बाद पांच किलोमीटर दूर पार्वती कुंड तक जाते हैं। यहां से तकरीबन एक किलोमीटर की दूरी पर किन्नर कैलाश स्थित है।
किन्नर कैलाश को ‘हिमाचल का बद्रीनाथ’ भी कहा जाता है और इसे ‘रॉक कैसल’ के नाम से भी जाना जाता है। इस शिवलिंग की परिक्रमा करना बड़े साहस और जोखिम का कार्य है। कई शिव भक्त जोखिम उठाते हुए स्वयं को रस्सियों से बांधकर यह परिक्रमा पूरी करते हैं। पूरे पर्वत का चक्कर लगाने में एक सप्ताह से दस दिन का समय लग सकता है।

पवन गौतम





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