सोमवार को जन्माष्टमी समारोह के लिए लाखों कृष्ण भक्त मथुरा और वृंदावन में जुटे, लेकिन अनेक भक्त राधा कृष्ण की लीला भूमि में हुए विकास की चकाचौंध से निराश होकर ही वापस लौटे।
हाल के वर्षों में, मथुरा दुनियाभर से राधा-कृष्ण के लाखों भक्तों को आकर्षित कर रहा है। यह स्थिति स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद हो सकती है, लेकिन, कृष्ण भक्त और पर्यावरण कार्यकर्ता इस दिशाहीन विकास में हर जगह खतरनाक संकेत देख रहे हैं। देखते-देखते यह क्षेत्र एक श्रद्धेय तीर्थस्थल से पर्यटन स्थल में बदलचा जा रहा है।
अंधी प्रगति की पागलपनभरी दौड़ में, कई परियोजनाएं चल रही हैं। यथा- यमुना पर लक्जरी क्रूज, पवित्र गोवर्धन पहाड़ी पर हेलीकॉप्टर द्वारा परिक्रमा या बरसाना में राधा रानी मंदिर तक फैंसी रोपवे का निर्माण।
बृज संस्कृति का सार प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा है। कृषि प्रधान देहाती जीवन जिसे कृष्ण ने प्यार किया और बढ़ावा दिया। लेकिन, पुजारियों और पंडों के एक वर्ग का मानना है कि यह सब गायब होता जा रहा है और नकली विकास की बलि चढ़ रहा है।
मथुरा और वृंदावन में तेजी से हो रहे विकास ने पर्यावरणविदों और संरक्षणवादियों के बीच चिंता पैदा कर दी है। उन्हें डर है कि बृज मंडल के प्राकृतिक और धार्मिक माहौल को कहीं कोई बड़ा खतरा न पैदा हो जाए। श्री कृष्ण भूमि का अनियंत्रित और बेतरतीब विकास पर्यावरण और क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को अपूरणीय क्षति पहुंचा रहा है। बड़े पैमाने पर कंक्रीटीकरण ने प्रदूषण को बढ़ा दिया है और ब्रज की पवित्र रेत के लुप्त होने की गति को तेज कर दिया है। प्राकृतिक सुंदरता की जगह सीमेंट की टाइलें ले रही हैं।
फ्रेंड्स ऑफ वृंदावन के संयोजक जगन्नाथ पोद्दार बताते हैं कि बृज मंडल के हरे-भरे इलाके और जल निकाय नष्ट हो रहे हैं और जंगल लगातार खत्म होते जा रहे हैं। कंक्रीट की इमारतें खड़ी होती जा रही हैं। आध्यात्मिक नेता और कृष्ण भक्त भी इस क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत के विनाश को लेकर चिंतित हैं। उनका मानना है कि भगवान कृष्ण एक पर्यावरणविद् और प्रकृति के रक्षक थे और उनके अनुयायियों को भी पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए। बृज के जल निकाय, जिनमें कुंड और सरोवर भी शामिल हैं, तेजी से हो रहे शहरीकरण और रखरखाव के अभाव के कारण नष्ट हो रहे हैं। अब 80 प्रतिशत कुंड सूख चुके हैं। उनमें अत्यधिक गाद भर गई है और वे विलुप्त होने के कगार पर हैं।
गोवर्धन, गोकुल, बरसाना और वृंदावन के धूलभरे शहरों में प्रदूषण वृद्धि और क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता का विनाश देखा जाने लगा है, जो अब अपनी प्राचीन महिमा और शांति को खोता जा रहा है। बढ़ती मानव बस्तियों और बाहरी लोगों के आगमन के कारण क्षेत्र की संवेदनशील पारिस्थितिकी खतरे में है। पवित्र गोवर्धन पर्वत पर कभी घने जंगल हुआ करते थे, लेकिन अब वे खत्म हो रहे हैं और वृंदावन में हरियाली और खुले स्थान नष्ट होते जा रहे हैं।
श्रीकृष्ण भूमि की अनमोल विरासत को पुनर्स्थापित करना और क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना अतिआवश्यक है। भक्तों और आध्यात्मिक नेताओं को क्षेत्र के पर्यावरण और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के लिए आगे आना चाहिए।
विशेष रूप से, भगवान कृष्ण से जुड़े होने के कारण पूजनीय शहर वृंदावन अपनी सांस्कृतिक विरासत, पर्यावरण और आध्यात्मिक पहचान के लिए कई खतरों का सामना कर रहा है। अनियंत्रित व्यवसायीकरण, पर्यटन और इसकी प्राकृतिक और निर्मित विरासत की उपेक्षा ने शहर को बर्बाद करना शुरू कर दिया है।
कभी पवित्र रही यमुना नदी अब पूरी तरह प्रदूषित हो गई है और इसके घाटों को बिल्डरों ने घेरना शुरू कर दिया है। पवित्र वृंदावन परिक्रमा पथ गायब हो रहा है और इसकी जगह डेवलपर्स और राजनेताओं के लिए रिंग रोड बनाया जा रहा है। विरासत वाली इमारतों को गिराकर ऊंची इमारतें बनाई जा रही हैं, जिससे शहर का सांस्कृतिक परिदृश्य खत्म हो रहा है। अत्यधिक पर्यटन के कारण अव्यवस्था फैल गई है, सड़कें जाम हो गई हैं, ध्वनि प्रदूषण हो रहा है और बुनियादी ढांचे की कमी हो गई है।
अपने खोए हुए स्वर्ग को पुनः प्राप्त करने के लिए, वृंदावन को अपने विकास मॉडल पर आमूलचूल पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। इसमें डेवलपर्स और राजनेताओं के संरक्षण के बजाय स्थानीय निवासियों और तीर्थयात्रियों की जरूरतों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।






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