दिल्ली के ‘मालवीय नगर’ जितना देश है लिकटेंस्टाइन

आखिर कोई देश दिल्ली की एक कॉलोनी से भी छोटा होकर अपना राजकुमार, अपनी सरहदें, अपनी हुकूमत और इतना राष्ट्राभिमान कैसे रख सकता है कि उसका झंडा भी कभी-कभी शरमा जाए? हमारी भारतीय पर्यटक टोली के दिमाग में यही सवाल कुलबुला रहा था, जब हमारी बस स्विट्ज़रलैंड और ऑस्ट्रिया के बीच दबे इस डाक टिकट जैसे छोटे-से देश लिकटेंस्टाइन में दाखिल हुई।

लगभग 40,000 की आबादी वाला यह देश हमारी दिल्ली-प्रशिक्षित आंखों को मंगलवार के शांत दिन वाले मालवीय नगर जितना दिखाई दिया। हम खिड़कियों से बाहर झांकते रहे। न भीड़, न ट्रैफिक जाम, न सड़क किनारे चिल्लाते दुकानदार, ‘‘साहब, ओरिजिनल माल, बेस्ट प्राइस!’’ और सबसे बड़ा सवाल तो पद्मिनी के मन में था, ‘‘आखिर ये लोग दिनभर करते क्या हैं और इनका देश चलता कैसे है?’’

शुक्र है, हमारी खुशमिजाज दार्शनिक, इतिहासकार और चलती-फिरती जीपीएस लेडी मार्था हमारे साथ थीं। वह इतिहास केवल सुनाती नहीं थीं, बल्कि प्रोफेसर के आत्मविश्वास, दादी के सब्र और अगले टॉयलेट स्टॉप की सटीक जानकारी रखने वाले इंसान की टाइमिंग के साथ परोसती थीं।

लिकटेंस्टाइन छोटा जरूर है, लेकिन इसका इतिहास कतई छोटा नहीं है। मार्था ने हमें यूरोप की वही पुरानी उथल-पुथल सुनाई, दो विश्वयुद्ध, तानाशाह, टैंक और इतनी सियासी अफरातफरी कि इतिहासकारों की कई पीढ़ियां भी माथा पकड़ लें।

फिर भी यह छोटा-सा राजतंत्र तटस्थ रहने में कामयाब रहा। जब बड़े-बड़े देश अपनी फौजी ताकत का प्रदर्शन कर रहे थे, लिकटेंस्टाइन ने रास्ते से हटकर सुरक्षित रहने की कला में महारत हासिल कर ली। कभी-कभी बच निकलने के लिए ताकत और दौलत से ज्यादा अक्ल की जरूरत होती है।

हम कौतूहल और हल्की हैरत के साथ सुनते रहे। अपने देश में तो कॉलोनी की रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन की बैठक भी तीन गुट, दो वॉकआउट और अलग कमेटी की मांग पैदा कर देती है। यहां एक छोटा-सा देश अपनी व्यवस्था आराम से चला रहा था। तुलना लाजवाब भी थी और थोड़ी शर्मिंदा करने वाली भी। इसके बाद आई प्यारी-सी छोटी ट्रेन की सवारी। ट्रेन ने हमें लिकटेंस्टाइन की सैर कराई, साफ-सुथरे घर, करीने से संवारे ढलान और चारों तरफ पहाड़।

न हॉर्न, न बेतहाशा ओवरटेकिंग, न ऐसा लगता था कि कोई अदृश्य दुश्मन हमारी बस से आगे निकलने की कोशिश कर रहा है। तभी हमारी टोली की अनौपचारिक ‘अंतर्राष्ट्रीय विजेता’ पद्मिनी अय्यर ने आंखों में शरारत भरकर घोषणा की, ‘‘एक और देश फतह!’’ हंसी छूट गई। हमारे हथियार थे कैमरे, छड़ियां, पानी की बोतलें और अगले टॉयलेट को लेकर लगातार बनी रहने वाली हल्की-सी बेचैनी। न हमने झंडा गाड़ा, न कोई इमारत कब्जे में ली। कुछ तस्वीरें खींचीं, फ्रिज मैग्नेट खरीदे और एक और देश घूम आने का सुकून लेकर आगे बढ़ गए।

आज के दौर में शांतिपूर्ण विजय शायद इसी को कहते हैं, पासपोर्ट पर मुहर, मोबाइल में तस्वीरें और जेब में स्मृति-चिह्न! इतिहास बन चुका था, पहाड़ों की खूबसूरती आंखों में बस चुकी थी और अब अगला अभियान बिल्कुल स्पष्ट था, फौज को खाना खिलाना।

हम ऑस्ट्रिया में दाखिल हुए। नजारे अब भी शानदार थे, मगर हमारे पेट अपने अलग यात्रा-सलाह पत्र जारी करने लगे थे। मार्था, जो वरिष्ठ नागरिक पर्यटन की रणनीतिकार बन चुकी थीं, यह सुनहरा नियम जानती थीं कि यात्रियों को खुश रखो, पानी पिलाओ और समय पर खाना खिलाओ।

आखिर बस दो भाइयों द्वारा चलाए जा रहे एक भारतीय रेस्तरां के सामने रुकी। स्वागत गर्मजोशी भरा था, मेन्यू में तुर्की का हल्का-सा रंग था और खाने से उठती खुशबू ने यूरोप की ठंडी हवा में घर की याद घोल दी। यूरोपीय यात्रा, भारतीय भूख और प्लेट में तुर्की अंदाज, वैश्वीकरण ने आखिर हमारे पेट तक अपनी पहुंच बना ही ली थी! उसकी खुशबू मेज पर फैली। ताजगी भी थी और ऐसा भाव भी, जैसे वह हमसे कह रही हो, ‘‘जनाब, इत्मीनान से बैठिए। आल्प्स कहीं भागे नहीं जा रहे।’’

बाहर ऑस्ट्रिया पोस्टकार्ड जैसी खूबसूरती दिखा रहा था। करीने से खड़े घर, हरे-भरे मैदान और पहाड़ों की चोटियों को सहलाते बादल। गड्ढों, जुगाड़ू ट्रैफिक और सड़क पर अचानक प्रकट हो जाने वाली भैंसों से जूझने वाले भारतीयों के लिए यह व्यवस्था मनोरंजक भी थी और थोड़ी डरावनी भी। यहां सड़कें अपनी जिम्मेदारी जानती थीं। घर ज्यामिति का सम्मान करते थे। यहाँ तक कि घास भी अनुशासित लग रही थी। हमने सोचा, अगर भारत की घास को भी ऐसी ट्रेनिंग मिल जाए, तो शायद वह सड़क किनारे उगने के बजाय सरकारी पार्क में आवेदन दे दे!

हमारी इस यात्रा का जिक्र हो और भोजन तथा टॉयलेट का नाम न आए, यह तो सरासर नाइंसाफी होगी। इन दोनों ने हमारे कार्यक्रम में ऐसी जुगलबंदी कर रखी थी, जैसे उस्ताद जाकिर हुसैन और तबला।

पहला सवाल यह कि ‘‘खाना कहां खाएंगे?’’ थोड़ी देर बाद दूसरा सवाल यह कि ‘‘टॉयलेट कहां है?’’ कभी-कभी क्रम उलट भी जाता था। कोई वरिष्ठ यात्री धीमी आवाज में अपनी जरूरत जाहिर करता और अचानक पूरी टोली को निकटतम सुविधा केंद्र की तलाश में गहरी दिलचस्पी पैदा हो जाती। हमें समझ आ गया कि पर्यटन केवल महलों, पहाड़ों और स्मारकों का नाम नहीं है। इसमें रसद, मूत्राशय प्रबंधन और खाने के सही समय का भी बड़ा योगदान है!

मार्था इस नाजुक ऑर्केस्ट्रा को बेमिसाल शांति से संचालित करती थीं। उन्हें मालूम था कि कब खाना चाहिए, कब विश्राम जरूरी है और कब बिना किसी हंगामे के टोली को टॉयलेट की दिशा में मोड़ देना है। नतीजा? खुश टोली, भरे हुए पेट और जहां संभव हो, राहत महसूस करते यात्री!

इस तरह लिकटेंस्टाइन पीछे छूट गया, ऑस्ट्रिया सामने था और आल्प्स हमारे ऊपर प्रहरी की तरह खड़े थे। हमने सरहदें पार कीं, इतिहास का स्वाद चखा, अंतर्राष्ट्रीय व्यंजनों का आनंद लिया और ऐसी यादें बटोरीं, जो किसी भी स्मृति-चिह्न से ज्यादा लंबे समय तक हमारे साथ रहेंगी।

दुनिया का आकार केवल वर्ग किलोमीटर या आबादी से नहीं मापा जा सकता। कभी-कभी सबसे छोटे देश सबसे बड़े आश्चर्य दे जाते हैं।