कुछ फिल्में अपनी कहानी, प्रस्तुति और तकनीकी खूबियों के कारण दर्शक को बांध लेती हैं, लेकिन साथ ही यह सवाल भी छोड़ जाती हैं कि अगर इसके कुछ किरदारों के लिए कलाकारों का चुनाव अलग होता तो क्या यह फिल्म कहीं ज्यादा प्रभावशाली हो सकती थी? ‘मैं वापस आऊंगा’ ऐसी ही फिल्म है। इसमें एक मजबूत कहानी, शानदार संपादन और कई प्रभावशाली अभिनय क्षण मौजूद हैं, लेकिन इसकी कास्टिंग कई जगह फिल्म की संभावनाओं को सीमित करती दिखाई देती है।
फिल्म की कास्टिंग पर सवाल इसलिए उठता है क्योंकि बड़े विषय को कई बार बड़े पर्दे की बड़ी उपस्थिति की जरूरत होती है। नसीरुद्दीन शाह इसमें अपनी सुपरिचित संजीदगी और अभिनय क्षमता के साथ मौजूद हैं। वह ऐसे कलाकार हैं जिनके सामने कोई भी दृश्य अपने आप वजन हासिल कर लेता है। लेकिन, यही बात इस फिल्म की कास्टिंग पर एक दिलचस्प सवाल भी खड़ा करती है। अगर नसीरुद्दीन शाह की जगह अमिताभ बच्चन को रखा जाता, तो क्या फिल्म का प्रभाव और व्यापक नहीं हो जाता? अमिताभ बच्चन की आवाज, आवाज का दर्द, उनका व्यक्तित्व और पर्दे पर उनकी मौजूदगी कहानी के भावनात्मक और ऐतिहासिक विस्तार को एक अलग ऊंचाई दे सकती थी।
इसी तरह, दिलजीत दोसांझ की जगह रणबीर कपूर की कल्पना करें तो फिल्म के युवा किरदार का भावनात्मक संसार शायद और अधिक गहराई हासिल कर जाता। वजहें रही होंगी इस कास्टिंग की लेकिन निश्चित रूप से बजट तो नहीं ही रहा होगा।
संभव है कि अच्छी कास्टिंग से फिल्म का व्यावसायिक आकर्षण और बढ़ता, किरदारों की स्टार वैल्यू बढ़ती और कहानी का प्रभाव भी व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचता। हालांकि, यह भी उतना ही संभव है कि बड़े सितारों की मौजूदगी फिल्म की संवेदनशीलता पर हावी हो जाती। इसलिए यह केवल ‘कौन बेहतर अभिनेता है’ का सवाल नहीं, बल्कि ‘कौन इस खास कहानी के लिए बेहतर है’ का सवाल है।
यह तुलना किसी कलाकार की क्षमता को कमतर आंकने के लिए नहीं, बल्कि फिल्म की जरूरत और कलाकार की स्क्रीन-इमेज के बीच तालमेल को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। अच्छी कास्टिंग केवल अच्छा अभिनेता चुनना नहीं होती; वह सही अभिनेता को सही किरदार में रखने की कला भी है। मुकेश छाबड़ा की विचार प्रक्रिया क्या रही होगी, पता नहीं।
फिर भी, वेदांग रैना में वह सहजता और संभावना दिखाई देती है, जो किसी युवा अभिनेता को लंबे सफर के लिए तैयार करती है। वह कई दृश्यों में पूरी तरह परिपक्व नजर न आएं हों, लेकिन उनके भीतर संभावनाएं साफ दिखाई देती हैं। सरवरी भी कई दृश्यों में अपने किरदार के अनुरूप प्रभाव छोड़ती हैं।
फिल्म की वास्तविक ताकत उसकी कहानी में है। फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, विभाजन की त्रासदी महज इतिहास की घटना नहीं रह जाती है, बल्कि व्यक्तिगत पीड़ा और मानवीय विस्थापन की कहानी बनकर सामने आती है। विभाजन पर पहले भी अनेक फिल्में बन चुकी हैं, लेकिन इस फिल्म की खासियत यह है कि वह उस त्रासदी को केवल बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के रूप में नहीं देखती। वह उसके भीतर छिपे भय, बिछड़ने, लौटने और स्मृति के भाव को पकड़ने की कोशिश करती है।
फिल्म में ‘आज’ से ‘कल’ और फिर ‘कल’ से ‘आज’ की यात्रा को जिस तरह कहानी में पिरोया गया है, वह दर्शक को लगातार दो काल खंडों के बीच जोड़कर रखती है। फिल्म का संपादन सिर्फ दृश्यों को जोड़ने की तकनीकी प्रक्रिया नहीं रह जाता है, बल्कि कहानी कहने का महत्वपूर्ण माध्यम बन जाता है। यही वजह है कि आरती बजाज का संपादन विशेष प्रशंसा का हकदार है। अतीत और वर्तमान के बीच आवाजाही अगर थोड़ी भी असंतुलित होती तो कहानी उलझ सकती थी, लेकिन फिल्म इस मामले में काफी हद तक सफल रहती है। संपादन दर्शक को यह महसूस नहीं होने देता कि वह दो अलग-अलग कालखंडों की कहानी देख रहा है; बल्कि दोनों समय धीरे-धीरे एक ही भावनात्मक अनुभव का हिस्सा बन जाते हैं।
विभाजन की विभीषिका को पर्दे पर उतारना अपने आप में आसान काम नहीं है। इसमें भावुकता और संवेदनशीलता के बीच एक महीन अंतर होता है। फिल्म जब इस संतुलन को साधती है, तब वह भीतर तक असर करती है। कुछ दृश्यों में इतिहास किताब का विषय नहीं, बल्कि मनुष्य की निजी स्मृति और पीड़ा बन जाता है। यही फिल्म के सबसे मजबूत हिस्सों में से एक है।
कहानी में एक-दो सुरीले गानों की पूरी गुंजाइश थी, लेकिन एआर रहमान ने एक भी यादगार गाना नहीं बनाया है। हालांकि, वह अक्सर शिकायत करते रहते हैं कि बॉलीवुड वाले उनको काम नहीं देते हैं।
कुल मिलाकर ‘मैं वापस आऊंगा’ एक ऐसी फिल्म है जिसकी कहानी और तकनीकी प्रस्तुति कहीं ज्यादा मजबूत दिखाई देती है। सबसे बढ़कर, विभाजन की त्रासदी को वर्तमान और अतीत के बीच आवाजाही के जरिए महसूस कराने की कोशिश फिल्म को भावनात्मक आधार देती है।

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