हिन्दी के मूर्धन्य कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला को साहित्य जगत का सिरमौर बनाने में अकेले कलकत्ता के सेठ महादेव प्रसाद मतवाला का जो योग है, उसे भुलाया नहीं जा सकता है।
सेठ जी निराला को बहुत मानते थे। उन्होंने एक बार जाड़े के दिनों में निराला के लिए बड़ी सुंदर और शानदार शॉल मंगवाई और उसे निराला को सप्रेम भेंट किया।
निराला ने उसे पहना और आनंदित हुए और सेठ जी की प्रशंसा की। एक दिन वह अखबार मतवाला के दफ्तर आ रहे थे तो रास्ते में एक भिखारी सामने पड़ गया जिसके तन पर कोई वस्त्र न था। महाप्राण निराला तो साक्षात करुणा की प्रतिमूर्ति थे। उनसे यह सहा नहीं गया। उन्होंने झट से अपनी शॉल उतारी और ठंड से कांपते भिखारी के शरीर पर डाल दी।
यह सारा नजारा उनका एक कर्मचारी देख रहा था। वह भागा-भागा सेठ जी को बुलाने गया। सेठजी ने सुना तो वह सड़क तक भिखारी के पीछे भागे, लेकिन वह तो देखते ही देखते गायब हो गया। निराला ने सेठ को आवाज दी कि क्यों आप परेशान हो रहे हैं। जाने दीजिए, बेचारे का जाड़ा ठीक से कटेगा। विवश होकर सेठ जी लौट आए।
निराला के हठ के आगे किसी की नहीं चलती थी। सेठ जी के मुंह से सिर्फ इतना ही निकला- धन्य हैं, महाराज आप!






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