तेजी से बढ़ रहा है ऑनलाइन डिलीवरी सेवाओं का चलन


ऑनलाइन डिलीवरी सेवाओं का तेज़ी से बढ़ता चलन आज के डिजिटल युग की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। दर्जनों प्लेटफॉर्म और ऐप-आधारित सेवाओं ने बाज़ार को लोकतांत्रिक बना दिया है, जिससे उत्पादक सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंच पा रहे हैं। यह बदलाव निश्चित रूप से पारंपरिक बाज़ारों की रौनक को कम कर सकता है, लेकिन इसके कई सकारात्मक पहलू भी हैं।

वरिष्ठ नागरिक पद्मिनी अय्यर कहती हैं, "साग सब्जी, फल, दूध बगैरा लेने भीड़भरे बेलनगंज मार्केट में जाती थी, कई बार रिक्शा नहीं मिलता था, पैदल सामान लाते समय बंदर हमला कर देते थे, लेकिन अब इतना आराम हो गया कि समान रेट, पूरा वजन व अच्छी क्वालिटी सिर्फ दस-पंद्रह मिनिट में घर बैठे मिल रहा है। कई बार ब्लिंकिट की सर्विस इतनी फास्ट होती है, कि लगता है बंदा बाहर गेट पर ही बैठा है!"

Read in English: Rapidly growing trend of online delivery services

गृहणियां अब घर के सदस्यों पर निर्भर नहीं हैं। चुटकियों में ताजे, ब्रांडेड उत्पाद होम सप्लाई हो रहे हैं। बिग बास्केट के युवा डिलीवरी पार्टनर रोहित ने बताया कि वह हर महीने 25-30 हजार रुपये कमा लेता है। देखा जाता है कि मोहल्लों में ‘एक गया, दूसरा आया’ का क्रम लगा ही रहता है। कभी फ्लिपकार्ट, कभी अमेजन, या फिर ब्लिंकिट या जोमैटो वाला रात बारह बजे तक यही क्रम चलता रहता है।

सबसे महत्वपूर्ण लाभों में से एक है ट्रैफिक जाम, प्रदूषण और समय की बर्बादी में कमी। लोग अब घर बैठे ही अपनी ज़रूरत की चीज़ें मंगवा सकते हैं, जिससे सड़कों पर वाहनों का दबाव कम होता है। इसके अतिरिक्त, यह क्षेत्र कम पढ़े-लिखे युवाओं और लड़कियों के लिए अतिरिक्त आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गया है, जो डिलीवरी पार्टनर के रूप में पार्ट-टाइम काम करके अपनी जीविका चला रहे हैं।

नवीनतम रुझानों की बात करें, तो अब डिलीवरी सेवाएं केवल भोजन और किराने के सामान तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि दवाइयां, कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य आवश्यक वस्तुएं भी ऑनलाइन उपलब्ध हैं। ड्रोन डिलीवरी और इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग जैसी तकनीकें इस क्षेत्र को और अधिक कुशल और पर्यावरण के अनुकूल बना रही हैं। आने वाले समय में, हम इस क्षेत्र में और भी नवाचार और विकास देखने की उम्मीद कर सकते हैं।

भारत में होम डिलीवरी सर्विस और ऑनलाइन मार्केट ने पिछले एक दशक में उपभोक्ता व्यवहार और अर्थव्यवस्था को नया आकार दिया है। अमेजन, फ्लिपकार्ट, ब्लिंकिट, और इंस्टामार्ट जैसे प्लेटफॉर्म ने सब्जी, फल, दूध से लेकर सेक्स टॉयज और कंडोम तक, लगभग हर चीज को घर तक पहुंचा दिया है। शराब को छोड़कर, शायद ही कोई उत्पाद बचा हो जो ऑनलाइन उपलब्ध न हो। यह नई व्यवस्था सुविधा और गति का प्रतीक बन चुकी है, लेकिन इसके साथ ही पारंपरिक किराना दुकानों, नुक्कड़ वाली दुकानों और मंडी तंत्र पर गहरा प्रभाव पड़ा है।

होम डिलीवरी सर्विस का सबसे बड़ा लाभ है सुविधा। उपभोक्ता 24/7, कहीं से भी खरीदारी कर सकते हैं, जो व्यस्त जीवनशैली वालों के लिए वरदान है। विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों को घर बैठे आवश्यक वस्तुओं की डिलीवरी से बहुत राहत मिली है। ई-कॉमर्स की बदौलत उत्पादों की व्यापक रेंज उपलब्ध है, जो पारंपरिक दुकानों में संभव नहीं है। 

आर्थिक दृष्टिकोण से, इन सेवाओं ने ‘गिग इकॉनमी’ को बढ़ावा दिया है। भारत में लगभग 10-12 करोड़ गिग वर्कर हैं, जो फूड डिलीवरी, ई-कॉमर्स, और लॉजिस्टिक्स से जुड़े हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक गिग वर्कर्स कुल श्रम बल का 4.1 फीसदी, लगभग 23.5 करोड़, होंगे। ये प्लेटफॉर्म डेटा एनालिटिक्स का उपयोग कर उपभोक्ता व्यवहार को समझते हैं, जिससे बेहतर मार्केटिंग और मूल्य निर्धारण संभव होता है। जीएसटी संग्रह भी ऑल-टाइम हाई पर है, क्योंकि ऑनलाइन लेनदेन पारदर्शी हैं, जो सरकार के लिए फायदेमंद है।

हालांकि, यह व्यवस्था पारंपरिक किराना दुकानों और मंडी तंत्र को ध्वस्त कर रही है। एक सर्वे के अनुसार, 46 फीसदी शहरी उपभोक्ताओं ने किराना दुकानों से खरीदारी कम कर दी है, जिससे छोटे व्यापारियों को नुकसान और कर्मचारियों की छंटनी हुई है। मंडियों में भी किसानों को कम कीमत मिल रही है, क्योंकि बड़े प्लेटफॉर्म सीधे उत्पादकों से सौदा करते हैं। गिग वर्कर को भी कम वेतन, सामाजिक सुरक्षा की कमी, और अनिश्चित कार्य घंटों जैसी चुनौतियां हैं। 

सामाजिक स्तर पर, नौजवानों में आलस्य की शिकायत बढ़ रही है। त्वरित डिलीवरी की आदत ने लोगों को बाहर जाने और सामुदायिक संपर्क से दूर किया है। इसके अलावा, लुभावनी योजनाओं जैसे भारी छूट और कैशबैक उपभोक्ताओं को अनावश्यक खरीदारी के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे वित्तीय अनुशासन प्रभावित होता है।

ई-कॉमर्स सेक्टर ने भारत में 2024 में लगभग 15 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित किए। गिग वर्कर के अलावा, लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउसिंग, और टेक्नोलॉजी सेक्टर में भी नौकरियां बढ़ी हैं। उदाहरण के लिए, अमेजन और फ्लिपकार्ट ने लाखों लघु और मझोले उद्यमों को अपने प्लेटफॉर्म से जोड़ा है, जिससे छोटे व्यवसायों को वैश्विक पहुंच मिली। हालांकि, पारंपरिक खुदरा व्यापार में रोजगार हानि इसकी एक कड़वी सच्चाई है।

लंबे समय में, यह व्यवस्था उपभोक्ता-केंद्रित अर्थव्यवस्था को और मजबूत करेगी, लेकिन छोटे व्यापारियों के लिए चुनौतियां बढ़ेंगी। सरकार का रुख सकारात्मक है, क्योंकि जीएसटी और डिजिटल लेनदेन से राजस्व बढ़ रहा है। हालांकि, गिग वर्कर के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएं लागू करना जरूरी है, जैसा कि राजस्थान ने 2023 में शुरू किया। 

साल 2025 में पारंपरिक बाजार दिक्कत में हैं, लेकिन ये पूरी तरह खत्म नहीं होंगे। स्थानीय किराना दुकानें ताजा उत्पादों और व्यक्तिगत सेवा के दम पर टिक सकती हैं। भविष्य में, ऑनलाइन-ऑफलाइन एकीकरण यानी हाइब्रिड मॉडल और स्मार्ट लॉजिस्टिक्स इस सेक्टर की सूरत बदल सकते हैं।



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