‘पग घुंघरू बांध…’ में किशोर की आवाज़ और सरगम की कहानी

कुछ गीत केवल सुने नहीं जाते हैं बल्कि वे अपने समय की एक स्मृति बन जाते हैं। ‘पग घुंघरू बांध…’ ऐसा ही एक गीत है। साल 1982 में आई प्रकाश मेहरा की फिल्म ‘नमक हलाल’ का यह लगभग बारह मिनट लंबा गीत जब सामने आया था, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि इसमें शामिल शास्त्रीय सरगम, डिस्को की थाप, क़व्वाली का रंग, संवादों की नाटकीयता और किशोर कुमार की खिलंदड़ी आवाज़ मिलकर आने वाले दशकों के लिए एक ऐसा गीत रच देंगे, जिसे आज भी लोग केवल एक पुराने फिल्मी गीत के रूप में नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक स्मृति के रूप में याद करते हैं।

इस गीत की शुरुआत भी अपने आप में एक कहानी है। प्रकाश मेहरा जब ‘नमक हलाल’ के संगीत के लिए बप्पी लाहिरी के पास पहुंचे, तो उनके पास मीरा से जुड़ी प्रसिद्ध पंक्ति ‘पग घुंघरू बांध मीरा नाची थी’ थी। प्रकाश मेहरा चाहते थे कि इस पंक्ति को किसी शास्त्रीय बंदिश के रंग में ढालकर आगे एक बिल्कुल अलग तरह का फिल्मी गीत बनाया जाए। उस समय वहां उनकी मां बांसुरी लाहिरी भी मौजूद थीं। वह स्वयं एक शास्त्रीय गायिका थीं। उन्होंने इस पंक्ति को एक शास्त्रीय अंदाज़ में गाकर दिखाया और बप्पी ने उसी क्षण उसके साथ अपना चिर-परिचित संगीत जोड़ना शुरू कर दिया। मेहरा को यह मेल बहुत पसंद आया और गीत का मूल बीज वहीं बो दिया गया।

लेकिन, इस बीज से जो गीत तैयार हुआ, वह साधारण गीत नहीं था। बप्पी लाहिरी ने इसमें एक साथ कई संगीत संस्कृतियों को जगह दी। इसमें सरगम भी थी, क़व्वाली भी और डिस्को भी। करीब बारह मिनट के गीत की धुन को सुनकर किशोर कुमार ने मज़ाक में शिकायत भी की थी कि उन्हें तो जैसे चार गाने एक साथ गाने के लिए दे दिए गए हैं। इसके चलते रिकॉर्डिंग में कई दिन लगे।

गाने के मुख्य अंतरे मस्तीभरे और फिल्मी अंदाज में हैं, लेकिन गाने के बीच का जो प्रसिद्ध सरगम वाला हिस्सा है, उसमें राग दरबारी और राग पीलू के शास्त्रीय पुट का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया है। इतना ही नहीं, बप्पी लाहिरी ने 1961 की मशहूर हॉलीवुड फिल्म 'कम सैप्टेंबर' का प्रसिद्ध थीम म्यूजिक भी इसमें इस्तेमाल किया। 

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किशोर कुमार के लिए यह गीत गाना शुरू से ही आसान नहीं था। जब बप्पी लाहिरी ने उन्हें पहली बार गीत सुनाया तो उनकी प्रतिक्रिया थी कि यह गीत है या कहानी। एक बार तो उन्होंने इतना लंबा गाना गाने से मना ही कर दिया। बप्पी लाहिरी के बहुत समझाने पर वह तैयार तो हो गए लेकिन, असली चुनौती अभी बाकी थी, और  वह थी इसमें प्रयुक्त सरगम।

किशोर कुमार शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित नहीं थे और उन्होंने संगीत या गायन की कोई भी औपचारिक शिक्षा भी नहीं ली थी। कहा जा सकता है कि वह पूरी तरह से एक स्वशिक्षित गायक थे। इसके चलते, गीत के बीच में आने वाला यह शास्त्रीय अंश उनकी गायकी की सीमा से बाहर था। किशोर कुमार ने इसे गाने की कोशिश जरूर की, लेकिन अंततः उन्होंने स्वीकार किया कि वह कठिन सरगम उनके लिए संभव नहीं है।

अब इस बात पर सोचा जाना शुरू हुआ कि आखिर गीत के इस हिस्से को अब किससे गवाया जाए। काफी सोच विचार के बाद यह तय किया गया कि इस सरगम को पंडित सत्यनारायण मिश्रा से गवाया जाना चाहिए। पंडित सत्यनारायण मिश्रा को बुलाया गया।

पंडित सत्यनारायण मिश्रा कोई स्टूडियो में गाने वाले गायक नहीं थे। वह भारतीय संगीत जगत के एक कुशल हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक रहे हैं। वह बनारस और काशी की समृद्ध संगीत परंपराओं से गहराई से जुड़े रहे हैं। 'श्री काशी संगीत समाज' जैसे प्रतिष्ठित शास्त्रीय मंचों पर उनकी गायकी के लाइव रिकॉर्ड आज भी भारतीय संगीत अभिलेखागार में सुरक्षित हैं।

बाद में, शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ, पंडित जी ने बड़े पैमाने पर भजनों की रिकॉर्डिंग भी की है। उन्होंने अलका याग्निक, सपना मुखर्जी और मोहम्मद अज़ीज़ जैसे दिग्गज गायकों के साथ मिलकर कई एल्बमों में अपनी आवाज़ दी है। वर्तमान में वह बघेली लोक भाषा और पारंपरिक रामायण भजनों के माध्यम से भी संस्कृति के संरक्षण में सक्रिय योगदान दे रहे हैं।

हालांकि, वह बॉलीवुड में बहुत बड़े स्टार गायक के रूप में कभी सामने नहीं आए, लेकिन संगीत जगत और शास्त्रीय हलकों में उन्हें गहरा सम्मान प्राप्त है। नब्बे के दशक में, वह मोहरा (1994), गुप्त : द हिडन ट्रुथ (1997), साजन चले ससुराल (1996), प्यार इश्क और मोहब्बत (2001) व विनाशक (1998) जैसी फिल्मों से भी जुड़े। किशोर कुमार के बेटे अमित कुमार ने लगभग आठ वर्ष तक उनसे शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली थी।

इस पृष्ठभूमि में यह समझना आसान होता है कि कठिन शास्त्रीय अंश के लिए उनका चयन क्यों स्वाभाविक रहा होगा। अंतत: पंडित सत्यनारायण मिश्रा ने गीत के शास्त्रीय हिस्से में आवाज़ दी और किशोर कुमार के साथ उनकी आवाज़ रिकॉर्ड हुई।

इस सबके बावजूद, इतना महत्वपूर्ण हिस्सा गाने वाले पंडित सत्यनारायण मिश्रा का नाम मूल आधिकारिक क्रेडिट में नहीं रखा गया। इसके कई कारण माने जाते रहे हैं। एक कारण यह बताया जाता है कि किशोर कुमार ने किसी अन्य के साथ क्रेडिट साझा करने की स्थिति में गीत गाने से इनकार कर दिया था। कहा जाता है कि किशोर कुमार अपने स्वाभिमान और क्रेडिट साझा करने को लेकर बेहद संजीदा थे। बाद में एक बार, उन्होंने अमिताभ बच्चन के लिए फिल्म 'शराबी' (1984) के गाने "जहां चार यार मिल जाएं" गाने के एल्बम क्रेडिट में उनसे पहले अमिताभ बच्चन का नाम लिख दिए जाने से ही नाराज होकर उनके लिए गाने से कुछ समय के लिए मना कर दिया था।

इस व्यवसाय से जुड़े उस समय के कुछ लोगों के अनुसार उन दिनों स्टूडियो रिकॉर्डिंग में सहायक या अतिथि शास्त्रीय गायक को अलग से श्रेय देने की परंपरा ही नहीं थी। दिलचस्प बात यह है कि बाद के संगीत-संदर्भों में पंडित सत्यनारायण मिश्रा को इस गीत के सह-गायक के रूप में दर्ज किया जाता रहा। पंडित सत्यनारायण मिश्रा के योगदान को संगीत जगत और बप्पी लाहिरी ने हमेशा खुले दिल से सराहा और स्वीकार किया।

गीत को ध्यान से सुनें तो उसकी संरचना अपने समय के लिहाज से असाधारण दिखाई देती है। किशोर कुमार पहले बातचीत जैसे अंदाज़ में कहानी शुरू करते हैं, ‘बुजुर्गों ने फ़रमाया...’, फिर वह गायन में बदलती है, फिर मीरा की पंक्ति आती है, फिर नाटकीय संवाद, फिर प्रेम का रंग, फिर क़व्वाली जैसी प्रस्तुति और अंततः वह प्रसिद्ध शास्त्रीय सरगम। बप्पी लाहिरी ने लोकप्रिय संगीत की ऊर्जा को शास्त्रीय संगीत की जटिलता से जोड़ने का अद्भुत प्रयोग किया।

इस गीत को लेकर एक और बात ध्यान देने योग्य है। ‘पग घुंघरू बांध...’ कोई पूरी तरह नई कल्पना नहीं थी। मीरा की यह पंक्ति सदियों पुरानी भक्ति परंपरा में मौजूद रही है और बाद में गीतकार अनजान ने उसे फिल्मी संदर्भ में बदल दिया। फिल्म में ‘और हम नाचे बिन घुंघरू के...’ जोड़कर उन्होंने मीरा की आध्यात्मिक छवि को अमिताभ बच्चन के चंचल, आत्मविश्वासी और हास्यपूर्ण चरित्र के साथ जोड़ दिया। इस तरह भक्ति की पंक्ति एक आधुनिक लोकप्रिय गीत में बदल गई।

गीत में मुहावरों का इस्तेमाल भी जमकर किया गया। ‘राम-राम जपना, पराया माल अपना’ जैसी पंक्ति हिंदी समाज के पुराने मुहावरों से आती है और इससे पहले भी फिल्मों में इस्तेमाल हो चुकी थी। ‘नमक हलाल’ ने उसे अपने व्यंग्यात्मक अंदाज़ में गीत के भीतर जगह दी। इस तरह यह गीत लोकभाषा, मुहावरे, भक्ति-स्मृति और आधुनिक फिल्मी हास्य को एक साथ रखता है।

फिर आता है किशोर कुमार का जादू। उनकी आवाज़ इस गीत को शास्त्रीय अनुशासन में बंद नहीं रहने देती है। जहां सरगम को पंडित सत्यनारायण मिश्रा की शास्त्रीय तैयारी मिलती है, वहीं किशोर कुमार उसी गीत को संवाद, अभिनय, हास्य, ठहराव, उछाल और नाटकीयता देते हैं। यही विरोधाभास गीत की सबसे बड़ी ताकत बन जाता है। एक ओर ‘सा सा सा गा गा रे रे सा नी नी नी सा सा सा...’ जैसी सरगम है तो दूसरी ओर किशोर की वह आवाज़ है जो अगले ही क्षण श्रोता को हंसा सकती है।

गीत की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण उसका दृश्य रूप भी था। अमिताभ बच्चन ने इसे जिस तरह प्रस्तुत किया, उसमें नृत्य, अभिनय और हास्य तीनों एक साथ दिखाई देते हैं। गीत किसी गंभीर शास्त्रीय प्रस्तुति की तरह दर्शक से एकाग्रता की मांग नहीं करता है; वह उसे लगातार नए रंग देता रहता है। लंबा होने के बावजूद उसमें एकरसता नहीं आती है। यही बात उस दौर के सामान्य तीन-चार मिनट के फिल्मी गीतों से इसे अलग करती थी।

‘पग घुंघरू बांध...’ को आज ‘कल्ट’ बनाने में एक और घटना निर्णायक रही। समय के साथ उसका अर्थ बदलता गया। 1980 के दशक में यह अमिताभ बच्चन की स्टार छवि और बप्पी लाहिरी के नए संगीत संसार का हिस्सा था। बाद की पीढ़ियों के लिए यह किशोर कुमार की गायकी की बहुमुखी प्रतिभा का उदाहरण बन गया। संगीत सीखने वालों के लिए इसमें सरगम और राग का आकर्षण है, पुराने फिल्म-संगीत के प्रेमियों के लिए किशोर कुमार और बप्पी लाहिरी का संगम है, और लोकप्रिय संस्कृति के लिए अमिताभ बच्चन का विशिष्ट अभिनय। यही बहुस्तरीयता किसी गीत को केवल ‘हिट’ से ‘कल्ट’ बनाती है।

इसके ऊपर एक विडंबना भी है। जिस सरगम को सुनकर किशोर कुमार ने अपनी सीमा स्वीकार की थी, वही सरगम आज गीत की पहचान का अभिन्न हिस्सा है। जिस शास्त्रीय गायक का नाम मूल क्रेडिट में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं हुआ, उसकी आवाज़ गीत के उस हिस्से में आज भी सुनी जा सकती है। और जिस गीत की लंबाई को लेकर किशोर कुमार ने मज़ाक किया था, वही लंबाई उसके असाधारण चरित्र का हिस्सा बन गई।

गीत को लोकप्रिय सफलता भी मिली और किशोर कुमार को इसके लिए 1983 के फिल्मफेयर पुरस्कारों में ‘सर्वश्रेष्ठ पुरुष पार्श्वगायक’ का पुरस्कार मिला।

शायद ‘पग घुंघरू बांध…’ की असली कहानी यही है कि इसे किसी एक संगीत-परंपरा में कैद नहीं किया जा सकता है। इसकी जड़ें मीरा की भक्ति में हैं, उसकी शास्त्रीय छाया राग दरबारी तक जाती है, उसकी देह पर डिस्को की चमक है, उसकी प्रस्तुति में क़व्वाली और फिल्मी हास्य है और उसकी आत्मा में किशोर कुमार की वह अद्भुत स्वाभाविकता है जो कठिन से कठिन रचना को भी सहज बना देती है। पंडित सत्यनारायण मिश्रा की सरगम ने इसमें शास्त्रीय ऊंचाई जोड़ी और किशोर कुमार ने उसे लोकप्रिय स्मृति में उतार दिया।

इसीलिए, चार दशक से अधिक समय बाद भी जब ‘के पग घुंघरू बांध…’ बजता है, तो केवल एक पुराना गीत नहीं बजता बल्कि उसके साथ 1982 का हिंदी सिनेमा, अमिताभ बच्चन का दौर, बप्पी लाहिरी का प्रयोग, किशोर कुमार की आवाज़, मीरा की सदियों पुरानी छवि और एक ऐसे शास्त्रीय गायक की अनसुनी कहानी भी लौट आती है, जिसका नाम शायद क्रेडिट में छोटा रह गया, लेकिन जिसकी आवाज़ उस गीत के सबसे कठिन और यादगार हिस्से में हमेशा के लिए दर्ज हो गई।