फिल्म ‘सुर संगम’ का ‘हे शिव शंकर...’ सिर्फ एक फिल्मी गीत नहीं है, बल्कि एक ऐसी संगीत यात्रा का अभूतपूर्व हिस्सा है जिसमें बनारस की शास्त्रीय परंपरा, मुंबई के फिल्म संगीत की दुनिया और एक असाधारण गायक की स्वाभाविक आवाज एक जगह आकर मिलती है। इस गीत को सुनते हुए सबसे पहले जो बात मन को पकड़ती है, वह है पंडित राजन मिश्र की आवाज। उसमें भक्ति की विनम्रता है, शास्त्रीय गायकी की गंभीरता भी और सुरों पर ऐसी पकड़ भी, जो गीत को एक सामान्य फिल्मी भजन की सीमा से बहुत आगे ले जाती है।
साल 1985 में प्रदर्शित ‘सुर संगम’ के निर्देशक के विश्वनाथ थे। यह फिल्म मूल तेलुगु फिल्म ‘शंकराभरणम’ का हिंदी रूपांतरण थी और इसकी कथा एक शास्त्रीय संगीत गुरु तथा उसके संगीत के प्रति समर्पित शिष्या के इर्द-गिर्द घूमती है। फिल्म के हिंदी रूपांतरण में भी शास्त्रीय संगीत को केवल पृष्ठभूमि का हिस्सा नहीं बनाया गया था, बल्कि कहानी की आत्मा के रूप में रखा गया। इसलिए, संगीत के लिए ऐसे कलाकारों की जरूरत थी जिनकी आवाज में शास्त्रीयता अभिनय की तरह निभाई हुई नहीं, बल्कि जीवन में साधी हुई हो। संगीतकार की जिम्मेदारी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को मिली।
उस समय पंडित राजन मिश्र और उनके छोटे भाई पंडित साजन मिश्र शास्त्रीय संगीत की दुनिया में अपनी पहचान बना चुके थे। दोनों भाइयों का मुंबई आना-जाना भी होता था और उनकी गायकी के चर्चे बढ़ रहे थे। उसी दौरान, एक दिन राजन मिश्र के घर के लैंडलाइन फोन पर घंटी बजी। दूसरी तरफ से संगीतकार लक्ष्मीकांत थे। उन्होंने अपना परिचय देने के बाद राजन मिश्र से कहा कि एक फिल्म बन रही है और उसमें जिस चरित्र को गायक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, उसके लिए उनकी आवाज बहुत उपयुक्त लगती है।
बातचीत में, राजन मिश्र ने अपने छोटे भाई साजन मिश्र का जिक्र करते हुए कहा कि वे दोनों तो एक साथ 'जोड़ी' के रूप में गाते हैं। लेकिन, फिल्म में चरित्र तो एक ही था, इसलिए दोनों को किस तरह शामिल किया जाएगा? इस पर लक्ष्मीकांत ने कहा कि इसके बारे में 'बाद में' सोचा जाएगा। बहरहाल, राजन मिश्र को मुंबई बुलाया गया। उनकी स्वर परीक्षा हुई, गायकी को भाव के रूप में समझने के लिए फिल्म के मुख्य अभिनेता गिरीश कर्नाड से उनकी मुलाकात कराई गई। इसके बाद रिकॉर्डिंग की प्रक्रिया शुरू हुई।
स्टूडियो में राजन मिश्र के सामने एक अलग तरह की चुनौती आई। शास्त्रीय संगीत की उनकी गायकी का अपना वातावरण था। आम फिल्मी रिकॉर्डिंग में गायक को हेडफोन लगाकर संगीत सुनते हुए माइक्रोफोन के सामने खड़े होकर गाना पड़ता था, जबकि राजन मिश्र उस तरीके के अभ्यस्त नहीं थे। उनकी गायकी का संस्कार सामने बैठकर, पूरे संगीत को स्वाभाविक रूप से सुनते हुए और अपनी सहज शैली में गाने का था।
लक्ष्मीकांत ने इस अंतर को समझा। उन्होंने गायक को तकनीक के सामने झुकाने के बजाय रिकॉर्डिंग की व्यवस्था को गायक के अनुकूल बनाया। माइक नीचे कराया गया और बैठकर गाने के लिए पूरा इंतजाम किया गया। हेडफोन के साथ सहजता न होने की बात सामने आई तो स्टूडियो का दरवाजा थोड़ा खोल दिया गया, ताकि राजन मिश्र बाहर बज रहा संगीत सुन सकें। उन्हें बताया गया कि संगीत इस तरह सुनाई देगा और उसी के आधार पर उन्हें गाना है।
फिर जो हुआ, वह अपने आप में कमाल था। राजन मिश्र बैठे और पहला टेक दिया। करीब साढ़े पांच मिनट का पूरा गाना पहले ही टेक में ओके हो गया। जिस आवाज को लक्ष्मीकांत ने फोन पर ही फिल्म के चरित्र के लिए उपयुक्त माना था, उसने स्टूडियो में किसी बनावटी फिल्मी अंदाज का सहारा लिए बिना अपनी स्वाभाविक शास्त्रीय शक्ति के साथ गीत को पूरा आकार दे दिया।
‘हे शिव शंकर...’ के शब्द वसंत देव ने लिखे थे। गीत में शिव को केवल आराध्य देवता के रूप में नहीं, बल्कि संगीत और नाद की मूल सत्ता के रूप में देखा गया है। ‘रुद्र वीणा’ और ‘नटेश्वर’ जैसे प्रतीकों के माध्यम से शब्द शिव को संगीत, नृत्य और सृजन से जोड़ते हैं। इसलिए, राजन मिश्र की आवाज में जब यह रचना सामने आती है तो भक्ति और शास्त्रीय संगीत अलग-अलग अनुभव नहीं रह जाते हैं।
गीत की धुन राग सोहनी पर आधारित है। सोहनी की स्वर-प्रकृति में एक विशेष तीखापन और ऊर्ध्वगामी प्रभाव होता है, जो इस रचना को साधारण भक्ति गीत से अलग रंग देता है। हालांकि, फिल्मी संगीत में किसी राग का इस्तेमाल शास्त्रीय मंच की प्रस्तुति के समान नहीं होता है। राग की मूल प्रकृति को बनाए रखते हुए उसे शब्दों, दृश्य और कहानी की जरूरत के अनुसार ढाला जाता है। ‘हे शिव शंकर...’ में भी यही दिखाई देता है। गीत शास्त्रीय आधार पर टिका है, लेकिन उसका भाव सीधे फिल्म के दर्शक तक पहुंचता है। भजन जब शुरू होता है, तो गायक सीधे ऊंचे स्वरों से इसकी शुरुआत करते हैं, जो सुनने वाले के मन में एक अलौकिक तरंग पैदा कर देता है।
राजन मिश्र की गायकी इस रचना की सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरती है। उनकी आवाज में न तो भक्ति का अनावश्यक प्रदर्शन है और न ही शास्त्रीयता दिखाने की कोशिश। स्वर जैसे भीतर से निकलकर शब्दों को एक विशिष्ट अर्थ देते हैं। यही कारण है कि गीत सुनते समय ऐसा लगता है जैसे कोई कलाकार भगवान शिव की स्तुति भर नहीं कर रहा है, बल्कि अपने संगीत को ही आराधना के रूप में अर्पित कर रहा है।
अब, चूंकि राजन मिश्र और साजन मिश्र जोड़ी में ही गाते थे तो बात 'क्रेडिट' को लेकर अटक गई। जैसे कि पहले बताया गया है कि जोड़ी के रूप में गाने को लेकर लक्ष्मीकांत ने 'बाद में' निर्णय लेने के लिए कहा था। तो 'बाद में' इसका समाधान निकाला गया। फिल्म के संगीत क्रेडिट में दोनों भाइयों के नाम साथ-साथ रखे गए। इसका संबंध उनकी साझा संगीत पहचान से था। राजन और साजन मिश्र लंबे समय से साथ गाते थे और शास्त्रीय संगीत की दुनिया में दोनों की जोड़ी अपनी अलग पहचान बना चुकी थी। इसलिए, दोनों का नाम साथ आना केवल किसी एक रिकॉर्डिंग के क्षण का विवरण नहीं था, बल्कि उस साझा संगीत व्यक्तित्व की पहचान भी था।
‘सुर संगम’ के संगीत की दुनिया भी केवल ‘हे शिव शंकर...’ तक सीमित नहीं थी। फिल्म के लिए इन्हीं आवाजों ने कई और रचनाओं को भी अपनी आवाज दी। शास्त्रीय संगीत को कहानी के भीतर विश्वसनीय रूप से स्थापित करने में उनकी मौजूदगी महत्वपूर्ण थी। फिल्म के लिए बाद में एक कबीर निर्गुण भी रिकॉर्ड किया गया था। लेकिन, कहानी के हिसाब से अंतिम समय में वह दृश्य हटा दिया गया, तो वह गीत भी हट गया। लेकिन, फिल्म के एल्बम में उसे रखा गया।
कई बार रिकॉर्ड किए गए गीत कहानी की अंतिम संरचना में जगह नहीं बना पाते हैं। इसके बावजूद, वे उस रचनात्मक प्रक्रिया का हिस्सा बने रहते हैं। ‘सुर संगम’ के मामले में भी ऐसा हुआ, लेकिन ‘हे शिव शंकर...’ फिल्म की कथा और उसके संगीत संसार के साथ बेहद स्वाभाविकता से जुड़ गया।
फिल्म में यह गीत इसलिए भी प्रभावशाली बना क्योंकि शास्त्रीय संगीत उसकी कहानी से अलग कोई बाहरी तत्व नहीं था। जिस पात्र की दुनिया को दर्शाया जा रहा था, उसके लिए संगीत जीवन का आधार था। ऐसे में जब राजन मिश्र की वास्तविक शास्त्रीय आवाज पर्दे पर सुनाई देती है तो अभिनय और गायकी के बीच एक विश्वसनीय रिश्ता बन जाता है। दर्शक को यह महसूस नहीं होता है कि किसी अभिनेता के लिए पीछे से केवल एक गायक आवाज दे रहा है; आवाज स्वयं उस चरित्र के संगीत-संसार का हिस्सा बन जाती है।
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की उपलब्धि भी इसी जगह दिखाई देती है। लोकप्रिय हिंदी फिल्म संगीत के लिए प्रसिद्ध इस जोड़ी ने ‘सुर संगम’ में शास्त्रीय संगीत की गंभीरता को जगह दी और उसके लिए वास्तविक शास्त्रीय गायकों की आवाज का इस्तेमाल किया।
‘हे शिव शंकर...’ की लोकप्रियता को किसी एक आंकड़े में बांधना आसान नहीं है। यह उस तरह का गीत नहीं था जिसकी लोकप्रियता केवल तत्कालीन फिल्मी चार्ट या बाजार की बिक्री से मापी जा सके। इसकी स्थायी पहचान इस बात में दिखाई देती है कि फिल्म के दशकों बाद भी इसे शास्त्रीय और फिल्म संगीत के श्रोताओं द्वारा खोजा और सुना जाता है। गीत-संग्रहों और संगीत मंचों पर इसकी मौजूदगी आज भी बनी हुई है और ‘सुर संगम’ का उल्लेख आते ही यह रचना स्वाभाविक रूप से याद आ जाती है।
इस गीत की खासियत यह भी है कि यह शास्त्रीय संगीत को कठिन या दूर की चीज बनाकर पेश नहीं करता है। राग की संरचना अपनी जगह है, लेकिन शब्दों में शिव का नाम है, आवाज में भक्ति है और प्रस्तुति में वह भाव है जिसे कोई भी श्रोता महसूस कर सकता है। यही वह पुल है जिसने शास्त्रीय संगीत को फिल्म के माध्यम से बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचाया गया।

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