सौर ऊर्जा विकास के एक नए युग में प्रवेश कर रहा है भारत


एक दशक पहले, भारत के बिजली उत्पादन में सौर ऊर्जा का हिस्सा बहुत छोटा था। आज, यह देश की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का सबसे बड़ा हिस्सा बनाती है। वर्ष 2014 में  लगभग तीन गीगावाट की स्थापित क्षमता से, इस क्षेत्र का विस्तार पचास गुना से भी अधिक हुआ है, और यह 30 जून तक 162.15 गीगावाट तक पहुंच गया।

यह परिवर्तन नीतिगत समर्थन, अवसंरचना विकास, विनिर्माण विस्तार और नागरिक भागीदारी से प्रेरित है। सौर पार्क, रूफटॉप प्रणाली और सौरीकृत कृषि पंप जैसे पहल देशभर में इसकी तैनाती को तेज कर रही हैं।

सौर तैनाती विविध भौगोलिक और जलवायु क्षेत्रों में फैली हुई है। राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र स्थापित क्षमता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रखते हैं। बड़ी सौर परियोजनाएं 118.79 गीगावाट स्थापित क्षमता का योगदान करती हैं। कुछ प्रमुख बड़ी सौर परियोजनाओं में भड़ला सोलर पार्क (राजस्थान), पावागड़ा सोलर पार्क (कर्नाटक), और रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर पार्क (मध्य प्रदेश) शामिल हैं।

बिजली ग्रिड से जुड़ी रूफटॉप सौर प्रणालियां एक और 27.88 गीगावाट का योगदान करती हैं। शेष क्षमता हाइब्रिड सौर परियोजनाओं और ऑफ-ग्रिड सौर प्रणालियों से आती है। हाइब्रिड परियोजनाएं सौर ऊर्जा को बैटरी भंडारण या अन्य ऊर्जा स्रोतों के साथ जोड़ती हैं, जबकि ऑफ-ग्रिड प्रणालियां उन क्षेत्रों में बिजली प्रदान करती हैं जो ग्रिड से जुड़े नहीं हैं।

वित्त वर्ष 2025-26 भारत के नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक वर्ष रहा, जिसमें सौर और गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता दोनों में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई। भारत ने 44.61 गीगावाट सौर क्षमता जोड़ी, जो वित्त वर्ष 2024-25 में जोड़ी गई 23.83 गीगावाट की लगभग दोगुनी है। सौर मॉड्यूल विनिर्माण क्षमता 2014 में 2.3 गीगावाट से बढ़कर 31 मार्च 2026 तक लगभग 172 गीगावाट हो गई। कुल गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता 283.46 गीगावाट तक पहुंच गई, जिसमें 274.68 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता शामिल है। गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता की अब तक की सबसे अधिक वार्षिक वृद्धि 55.29 गीगावाट दर्ज की गई। 29 जुलाई 2025 को, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों ने भारत की बिजली मांग का 51.5 फीसदी पूरा किया, जो अब तक दर्ज किया गया सबसे अधिक मासिक हिस्सा है।

एक स्थिर नीतिगत ढांचे, प्रतिस्पर्धी बोली तंत्र, और दीर्घकालिक लक्ष्यों ने बड़े पैमाने पर सौर तैनाती के लिए अनुकूल वातावरण बनाने में मदद की है। परस्पर सुदृढ़ करने वाले उपायों के एक समूह ने भारत के सौर विस्तार को समर्थन दिया है।

भारत की सौर वृद्धि के केंद्र में एक मजबूत और निरंतर मांग का होना रहा है। राष्ट्रीय सौर मिशन ने दीर्घकालिक क्षमता लक्ष्य स्थापित किए और सौर तैनाती को प्रारंभिक गति प्रदान की।

नवीकरणीय खरीद बाध्यताएं बिजली वितरण कंपनियों और अन्य बाध्य संस्थाओं को अपनी बिजली का एक निर्दिष्ट हिस्सा नवीकरणीय स्रोतों से खरीदने की बाध्यता रखती हैं। आरपीओ डेवलपर्स और निवेशकों को दीर्घकालिक बाजार निश्चितता प्रदान करते हैं, साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा को अधिक अपनाने को प्रोत्साहित करते हैं। आरपीओ पथ आगामी 2029-30 तक अधिसूचित किया गया है, जिसमें वर्ष 2026-27 का लक्ष्य 35.95 प्रतिशत निर्धारित है।

सौर क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण विकासों में से एक रहा है पिछले दशक में बिजली टैरिफ में गिरावट। यह ई-रिवर्स नीलामी तंत्र के माध्यम से बोली द्वारा प्रेरित था, जिसमें डेवलपर्स सबसे कम टैरिफ पर बिजली आपूर्ति करने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।

भारतीय सौर ऊर्जा निगम जैसी खरीद एजेंसियों ने इस पारदर्शी टैरिफ खोज तंत्र को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जैसे-जैसे अधिक डेवलपर्स ने भाग लिया,  2010 में टैरिफ लगभग ₹18 प्रति यूनिट से घटकर रिकॉर्ड निम्नतम ₹2.44 प्रति यूनिट तक आ गए। यह उल्लेखनीय उपलब्धि 2017 में भड़ला सोलर पार्क नीलामी में हासिल की गई थी। इसने सौर ऊर्जा को अधिक किफायती बनाया और पूरे भारत में इसे अपनाने में तेजी लाई।

टैरिफ में गिरावट ने सौर ऊर्जा को दिन-प्रतिदिन अधिक किफायती बना दिया है। परिणामस्वरूप, भारत विश्व के सबसे कम लागत वाले सौर ऊर्जा बाजारों में से एक बनकर उभरा है। 2025 में, यूटिलिटी-स्केल सौर पीवी की समतुल्य बिजली लागत 35 अमेरिकी डॉलर प्रति मेगावाट-घंटा रही, जो 44 अमेरिकी डॉलर प्रति मेगावाट-घंटा के वैश्विक औसत से काफी कम है।

वर्ष 2021 में ₹4,500 करोड़ के प्रारंभिक परिव्यय के साथ शुरू की गई, उच्च-दक्षता सौर पीवी मॉड्यूल के लिए पीएलआई योजना को 2022 में अतिरिक्त ₹19,500 करोड़ के साथ विस्तारित किया गया। यह योजना घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देती है, आयात निर्भरता कम करती है, और सौर मूल्य श्रृंखला में मूल्यवर्धन को प्रोत्साहित करती है। अक्टूबर 2024 तक, इस योजना ने लगभग ₹35,000 करोड़ का निवेश आकर्षित किया था। इसने लगभग 10,000 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार भी दिया था।

वर्ष 2019 में शुरू किया गया, एएलएमएम सौर पीवी मॉड्यूल सौर सेल के लिए एक गुणवत्तापूर्ण आश्वासन ढांचा है। यह सुनिश्चित करता है कि पात्र परियोजनाओं में उपयोग किए जाने वाले सौर उपकरण निर्दिष्ट गुणवत्ता और प्रदर्शन मानकों को पूरा करें। केवल अनुमोदित सूचियों में शामिल निर्माता और मॉडल ही निर्दिष्ट सरकार-समर्थित और प्रतिस्पर्धी रूप से बोली लगाई गई सौर परियोजनाओं के लिए पात्र हैं। यह ढांचा अनुमोदित उत्पादों के उपयोग को प्रोत्साहित करके घरेलू विनिर्माण को भी बढ़ावा देता है।

साथ मिलकर, पीएलआई योजना और एएलएमएम ने भारत के घरेलू सौर विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत किया है। इन्होंने सौर तैनाती के तीव्र विस्तार को सक्षम बनाते हुए अधिक आत्मनिर्भरता का समर्थन किया है। यह ढांचा अनुमोदित सौर उपकरणों के उपयोग को सुनिश्चित करके उपभोक्ताओं और परियोजना डेवलपर्स को अधिक विश्वास भी प्रदान करता है।

भारत का सौर परिवर्तन बड़े पैमाने के बिजली संयंत्रों से आगे भी फैला है। परिवारों और किसानों के लिए समर्पित योजनाओं के माध्यम से, सौर ऊर्जा पहुंच में सुधार, बिजली लागत में कमी, और नए आजीविका अवसर सृजित कर रही है।

सौर ऊर्जा में भारत का नेतृत्व अपनी सीमाओं से परे भी फैला है। देश अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, प्रौद्योगिकी आदान-प्रदान, और क्षमता निर्माण को मजबूत कर रहा है। साल 2015 में, पेरिस में, भारत और फ्रांस द्वारा सह-स्थापित, अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन वैश्विक सौर सहयोग के लिए एक प्रमुख मंच बनकर उभरा है। यह गठबंधन मालदीव, ग्रीस, जर्मनी, इटली, भूटान, लक्जमबर्ग और अर्जेंटीना सहित देशों को सौर तैनाती में तेजी लाने और ज्ञान व प्रौद्योगिकी साझा करने के लिए एक साथ लाता है।

भारत और यूनाइटेड किंगडम ने 2021 में ग्रीन ग्रिड्स इनिशिएटिव–वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड शुरू किया। इस पहल को ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, संयुक्त राज्य अमेरिका, और अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन का समर्थन प्राप्त है। यह परस्पर जुड़े बिजली ग्रिडों के माध्यम से सीमा-पार नवीकरणीय ऊर्जा व्यापार को बढ़ावा देती है, ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करती है और स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन में तेजी लाती है।

सौर बाजार में भारत की ये उपलब्धियां निरंतर नीतिगत समर्थन, बढ़ते विनिर्माण, मजबूत अवसंरचना, और बढ़ती जन भागीदारी को दर्शाती हैं। जैसे-जैसे भारत अपनी पंचामृत प्रतिबद्धताओं और 2070 तक शुद्ध-शून्य लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता है, सौर ऊर्जा एक प्रमुख स्तंभ बनी रहेगी। यह स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन को आगे बढ़ाना जारी रखेगी।



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