जब कांटों के जंगल ने छीन लिया था नमक का स्वाद...!


ज़रा सोचिए। अगर कल सुबह कोई सरकार कह दे कि अब नमक खरीदना भी अमीरों का शौक़ होगा, तो क्या होगा? दाल बेस्वाद हो जाएगी। रोटी गले से नहीं उतरेगी। गरीब की थाली और भी सूनी हो जाएगी।

यही भारत ने कभी झेला था। नमक सिर्फ़ रसोई की चीज़ नहीं है। यह ज़िंदगी का स्वाद है। पसीना बहाने वाले मज़दूर की ज़रूरत है। भरोसे का प्रतीक है। इसी से "नमक-हलाल" और "नमक-हराम" जैसे मुहावरे बने।

लेकिन, अंग्रेज़ों ने इसी नमक को सोने से भी महंगा बना दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने नमक की रखवाली के लिए पूरे भारत के सीने पर कांटों की एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी, जिसकी कहानी आज भी रोंगटे खड़े कर देती है।

यह कोई अफ़साना नहीं था। यह था ग्रेट हेज ऑफ इंडिया। दुनिया की सबसे लंबी जीवित कांटेदार बाड़। उन्नीसवीं सदी में अंग्रेज़ सरकार की नज़र नमक पर टिक गई। समुद्र किनारे नमक सस्ता बनता था, लेकिन अंग्रेज़ उसे भारी टैक्स लगाकर बेचते थे। गरीब किसान और छोटे व्यापारी चोरी-छिपे नमक ले आते। सरकार का ख़ज़ाना खाली होने लगा। अंग्रेज़ों ने सोचा, रास्ता ही बंद कर दो।

फिर शुरू हुआ कांटों का साम्राज्य। बबूल, करोंदा, बेर और दूसरी कांटेदार झाड़ियों को लगाकर एक ऐसी दीवार तैयार की गई जो आठ से बारह फुट ऊंची थी। कहीं इतनी घनी कि आदमी तो क्या, ऊंट भी पार न कर सके। यह दीवार हिमालय की तराई से लेकर ओडिशा तक लगभग चार हजार किलोमीटर तक फैली थी। इसे ‘इनलैंड कस्टम्स लाइन’ कहा गया।

हर थोड़ी दूरी पर चौकियां थीं। हजारों सिपाही दिन-रात पहरा देते थे। अनुमान है कि बारह हजार से अधिक गार्ड इस दीवार की निगरानी करते थे। उनका काम सिर्फ़ एक था। नमक की एक मुट्ठी भी टैक्स दिए बिना आगे न जाने पाए।

इस पूरी व्यवस्था को मज़बूत बनाने वालों में एक नाम बड़ा दिलचस्प है। एलन ऑक्टेवियन ह्यूम। वही ह्यूम, जिन्होंने बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में अहम भूमिका निभाई। विडंबना देखिए। एक समय वही अधिकारी कांटों की दीवार को और मजबूत बना रहे थे।

इतिहास की किताबें बहुत कुछ भूल जाती हैं, लेकिन गांवों की याददाश्त बड़ी गहरी होती है। उत्तर प्रदेश के एटा, इटावा और आसपास के इलाकों में आज भी बुजुर्ग "पारमत लाइन" का ज़िक्र करते हैं। वे बताते हैं कि वहां ऐसी कांटेदार बाड़ थी, जिसे पार करना मौत को दावत देना था। कहीं-कहीं आज भी मिट्टी के ऊंचे टीले और जंगली झाड़ियां उस बीते दौर की गवाही देते हैं।

ब्रिटिश लेखक रॉय मोक्सहम ने वर्षों तक इस भूली हुई दीवार की तलाश की। पुराने नक्शे खंगाले। गांवों की खाक छानी। उन्हें इटावा के पास चालीस फुट चौड़े टीले पर कांटेदार झाड़ियों के अवशेष मिले। नई पीढ़ी के शोधकर्ता भी आज इस खोई हुई दीवार के निशान खोज रहे हैं। इस दीवार ने सबसे ज्यादा चोट गरीबों पर की।

भारत गर्म देश है। खेत में काम करने वाला किसान, सड़क बनाने वाला मज़दूर और रिक्शा खींचने वाला इंसान पसीने के साथ नमक खोता है। शरीर को उसकी ज़रूरत होती है। लेकिन, अंग्रेज़ों के टैक्स ने नमक को गरीब की पहुंच से बाहर कर दिया। एक मुट्ठी नमक भी कई घरों में सोच-समझकर खर्च किया जाता था।

अन्याय की भी एक सीमा होती है। आख़िरकार यही नमक आज़ादी की लड़ाई का प्रतीक बन गया। 1930 में महात्मा गांधी समुद्र किनारे दांडी पहुंचे। उन्होंने अपने हाथों से नमक उठाया। देखने वालों को यह छोटी-सी बात लगी, लेकिन उसी पल ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिल गई। एक चुटकी नमक ने साम्राज्य की ताक़त को चुनौती दे दी।

उधर, अंग्रेज़ों को भी समझ आ गया कि कांटों की इतनी लंबी दीवार संभालना आसान नहीं है। रखरखाव महंगा था। 1870 के दशक के आखिर में पूरे देश में नमक पर एक समान टैक्स लागू हुआ। दीवार की ज़रूरत खत्म हो गई। झाड़ियां सूख गईं। किसानों ने खेत बना लिए। रास्ते निकल आए। धीरे-धीरे दुनिया की सबसे लंबी कांटेदार दीवार इतिहास की धूल में गुम हो गई। लेकिन, उसकी सीख आज भी ज़िंदा है।

प्रेमचंद की अमर कहानी ‘नमक का दरोगा’ में वंशीधर ईमानदारी का प्रतीक बनकर उभरते हैं। कहानी नमक की तस्करी से शुरू होती है, लेकिन असली सवाल उस व्यवस्था पर खड़ा करती है, जिसने नमक जैसी साधारण चीज़ को भी सत्ता का हथियार बना दिया था। जब कानून इंसाफ़ छोड़ देता है, तब ईमानदारी भी संघर्ष बन जाती है।

आज हमारी थाली में आयोडीनयुक्त नमक है। काला नमक है। सेंधा नमक है। बाज़ार में स्वाद की कोई कमी नहीं है। लेकिन, इतिहास की यह कहानी याद दिलाती है कि कभी इसी नमक के लिए लोगों ने अपमान सहा, तकलीफ़ झेली और विद्रोह किया।

अगली बार जब आप दाल में चुटकीभर नमक डालें, तो एक पल ठहरिए। याद कीजिए उस कांटों की दीवार को, जिसने कभी भारत के स्वाद पर पहरा बिठा दिया था।

सच तो यह है कि आज़ादी सिर्फ़ ज़मीन की नहीं होती। कभी-कभी वह एक चुटकी नमक की भी होती है।



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