यमुना, चंबल से कावेरी तक…, रेत माफिया से हार गई है सरकार...


कर्नाटक हाईकोर्ट का ताज़ा फैसला कोई साधारण कानूनी टिप्पणी नहीं है। यह शासन व्यवस्था की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट है। अदालत ने दो टूक शब्दों में स्वीकार किया है कि अवैध रेत खनन पर राज्य का कोई नियंत्रण नहीं बचा है। कानून थक चुका है। प्रशासन ने हथियार डाल दिए हैं। राजनीति ने आंखें मूंद ली हैं।

जब एक संवैधानिक अदालत को लिखना पड़ता है कि यदि राज्य के गृह मंत्री खुद अवैध रेत खनन माफिया पर कार्रवाई करने में असहाय महसूस करते हैं, तो राज्य तंत्र से किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं की जा सकती, तो समझ लेना चाहिए कि अब राज्य नहीं, समझौते चल रहे हैं।

Read in English: Governments lose to Sand Mafia, from Yamuna and Chambal to Kaveri…

गृह मंत्री जी परमेश्वर का विधानसभा में दिया गया बयान और भी डरावना है। वह मानते हैं कि अवैध रेत खनन एक बड़ा रैकेट है। इतना बड़ा कि वह न नाम ले सकते हैं और न स्पष्टीकरण दे सकते हैं। क्योंकि, इसमें कई प्रभावशाली लोग शामिल हैं। यानी अपराध इतना ताकतवर है कि शर्म भी सत्ता के पाले में है।

रेत को कानून की भाषा में ‘माइनर मिनरल’ कहा जाता है। लेकिन, यह शब्द खुद एक धोखा है। रेत की लूट कोई मामूली अपराध नहीं है। यह पर्यावरणीय नरसंहार है, आर्थिक अपराध है और कई जगहों पर सीधे मौत का धंधा है। भारत में हर साल 700 मिलियन टन से ज्यादा रेत की खपत होती है। इसका बड़ा हिस्सा नदियों से निकाला जाता है।

दक्षिण में कृष्णा, कावेरी और तुंगभद्रा हों या उत्तर में यमुना और चंबल, कहानी हर जगह एक सी है। रात के अंधेरे में मशीनें उतरती हैं। दिन के उजाले में ट्रक दौड़ते हैं। और, बीच में रहता है डरा हुआ समाज। नदियों को जीवित तंत्र नहीं, खुली खदान मान लिया गया है। रेत नदी की क्षमता के हिसाब से नहीं, बिल्डरों की भूख के हिसाब से निकाली जा रही है। नतीजा सामने है। नदी की कोख खाली हो रही है। किनारे ढह रहे हैं। भूजल नीचे खिसक रहा है।

आगरा में हर साल औसतन डेढ़ मीटर पानी नीचे जा रहा है। कुएं सूख रहे हैं। खेत प्यासे हैं। फसलें बर्बाद हो रही हैं। पुल और सड़कें अंदर से खोखली हो चुकी हैं, जो अचानक गिरती हैं और फिर उन्हें ‘दुर्घटना’ कहा जाता है। जबकि यह दुर्घटना नहीं, पहले से रचा गया अपराध है।

यमुना में अवैध खनन से नदी की गहराई बढ़ी है, जिससे बाढ़ का खतरा कई गुना बढ़ गया है। पानी की गुणवत्ता गिर चुकी है। गाद और गंदगी बढ़ी है। भूजल रिचार्ज बुरी तरह प्रभावित हुआ है। आगरा में यमुना ताज महल के नीचे से जैसे शर्मिंदगी से सिर झुकाकर गुजरती है। रेत खनन ने नदी की धड़कन रोक दी है। पानी कम है। प्रवाह टूटा हुआ है। प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। ताज महल के संगमरमर पर हरे धब्बे उभर रहे हैं। गोल्डीचिरोनोमस नामक कीड़े पनप रहे हैं, जो हरा स्लाइम छोड़ते हैं। नींव की लकड़ियां सड़ रही हैं।

पर्यावरणविद् साफ कहते हैं कि यमुना अब नदी नहीं रही। वह साल के अधिकांश समय सूखी सीवेज नहर बन चुकी है, जिसमें जो थोड़ा बहुत बहता है, वह दिल्ली और ऊपर के शहरों का कचरा है। यह सिर्फ पर्यावरण संकट नहीं है बल्कि यह हमारी विरासत पर सीधा हमला है। फिर भी ट्रक नहीं रुकते, क्योंकि उनके पीछे सत्ता की छाया खड़ी है।

पर्यावरणविद डॉ देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं, "चंबल की हालत और भी शर्मनाक है। कागजों में वह राष्ट्रीय अभयारण्य है। हकीकत में माफिया की जागीर। मुरैना और धौलपुर से रोज सैकड़ों ट्रक रेत खुलेआम निकाले जा रहे हैं। चंबल घड़ियाल, दुर्लभ कछुओं और इंडियन स्किमर जैसे संकटग्रस्त पक्षियों का घर है। रेत हटने से उनके अंडे नष्ट हो जाते हैं। घोंसले उजड़ जाते हैं। प्रजनन क्षेत्र खत्म हो रहे हैं। एक पूरी प्रजाति इतिहास बनने की कगार पर है।"

टिप्पणीकार प्रो पारस नाथ चौधरी के मुताबिक, "कोई पूछने वाला नहीं है, क्योंकि पूछने वालों को डर है। यह डर यूं ही नहीं पैदा हुआ। इस धंधे में लाठी है, गोली है और बेहिसाब काला पैसा है। पुलिसकर्मी ट्रकों से कुचले गए। पत्रकार पीटे गए। कार्यकर्ता धमकाए गए। जब विधायक खुलेआम कहते हैं कि वे कुछ नहीं कर सकते, तो आम आदमी की औकात क्या है।"

रेत माफिया सिर्फ खनन नहीं करता। वह चुनाव फंड करता है। अफसर खरीदता है। हर पार्टी में अपने लोग बिठाता है। इसलिए यह किसी एक दल का नहीं, ‘क्रॉस’ पार्टी धंधा है। सरकारें बदलती हैं, माफिया नहीं। 

कानूनों की कमी नहीं है। एनजीटी के आदेश हैं। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियां हैं। सस्टेनेबल सैंड माइनिंग के दिशानिर्देश हैं। कमी सिर्फ एक चीज की है, राजनीतिक इच्छाशक्ति की। सरकारें अक्सर डिसिल्टिंग और ड्रेजिंग का बहाना देती हैं। जबकि, फर्क साफ है। डिसिल्टिंग रखरखाव है, सीमित और नियंत्रित प्रक्रिया। अवैध खनन अंधी लूट है। जहां नदी को बचाया नहीं जाता, बल्कि निचोड़ा जाता है। अगर यही चलता रहा, तो सच और भी साफ हो जाएगा। रेत माफिया राज्य से ज्यादा ताकतवर है। यह कोई अलंकार नहीं, कड़वी हकीकत है।

नदियां सिर्फ पानी नहीं देतीं। वे सभ्यता देती हैं। खेती देती हैं। जीवन देती हैं। जो समाज अपनी नदियां नहीं बचा सकता, वह अपने भविष्य की कब्र खुद खोदता है। इतिहास ऐसे दौर को माफ नहीं करता। जब नदियां सूख जाएंगी, तब चोरी की रेत भी इस शर्म को ढक नहीं पाएगी।



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