यूरोप जीतने निकले थे। कुछ ही दिनों के बाद पता चला कि यूरोप जीतना तो दूर, अपने घुटनों को मनाना ही बड़ी जीत है।
सत्तर पार के हम दो भारतीयों ने सोचा था कि पासपोर्ट में कुछ नए ठप्पे लगेंगे, आंखों को कुछ नए नजारे मिलेंगे और कैमरे की मेमोरी भर जाएगी। सब हुआ। लेकिन, एक बात उम्मीद के बिल्कुल उलट हुई। यूरोप जितना देखा, भारत उतना ही याद आता गया।
बेंगलुरु से यात्रा शुरू हुई। अबू धाबी होते हुए लंदन पहुंचे। फिर पेरिस, ब्रसेल्स, एम्स्टर्डम, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, लिकटेंस्टाइन, ऑस्ट्रिया और आखिर में इटली। वेटिकन सिटी ने इस महायात्रा पर जैसे अंतिम मुहर लगा दी।
दस देश। सत्रह ठिकाने। अनगिनत स्मारक। सैकड़ों तस्वीरें। हजारों किलोमीटर। और, पैरों में हजारों किलोमीटर की शिकायत! सीमाएं हमने ऐसे पार कीं जैसे भारत में सड़कें पार करते हैं। कभी अकड़कर, कभी डरकर और कभी उस प्रार्थना के सहारे जिसे किसी भाषा या धर्म की जरूरत नहीं होती है।
लेकिन हमारी असली यात्रा शहरों की नहीं थी। हम नदी से नदी तक चलते रहे। लंदन में टेम्स मिली। पेरिस में सीन। जर्मनी में नेकर और राइन। इंसब्रुक में इन नदी साथ रही। वेनिस में नदियां नहीं, पूरी जिंदगी ही पानी पर तैरती मिली। फ्लोरेंस में आर्नो इतिहास को अपने साथ बहाती रही। और, इन सबके बीच एक नदी बार-बार सिर उठाती रही। यमुना।
क्यों? क्योंकि यूरोप की नदियां सिर्फ पानी नहीं थीं। वे शहरों की पहचान थीं। टेम्स लंदन की कहानी कहती है। सीन पेरिस की तस्वीर बनाती है। नेकर हाइडेलबर्ग के इतिहास को सहलाती हुई गुजरती है। राइन फॉल्स में पानी गरजता है तो लगता है प्रकृति ने खुद माइक पकड़ लिया है। वेनिस में पानी रास्ता भी है, बाजार भी है और जीवन की धड़कन भी।
तभी एक सवाल पीछा करने लगा। हम अपनी नदियों के साथ ऐसा क्यों नहीं कर सकते हैं? यह कहना गलत होगा कि यूरोप की नदियां पूरी तरह साफ-सुथरी और समस्यामुक्त हैं। लेकिन, एक फर्क साफ दिखाई देता है। वहां नदी को शहर के जीवन का हिस्सा माना जाता है। उसे छिपाने या उससे मुंह मोड़ने के बजाय उसके साथ जीने की कोशिश दिखाई देती है।
हम अक्सर नदी को नाले में बदल देते हैं और फिर उसके किनारे सौंदर्यीकरण का बोर्ड लगा देते हैं। यानी पहले बीमारी पैदा करो, फिर उद्घाटन करके इलाज का दावा करो।
पद्मिनी अय्यर ने राइन फॉल्स के सामने खड़े होकर कहा था, “पानी की ताकत यहां किसी नाटक जैसी लगती है। हाइडेलबर्ग में नेकर सदियों का इतिहास लेकर चुपचाप बहती है। वेनिस में पानी सिर्फ दृश्य नहीं है, शहर की धड़कन है।” बात छोटी थी, लेकिन दिल में उतर गई। क्योंकि, नदी को देखने का नजरिया ही शायद सभ्यता का आईना है।
स्विट्जरलैंड ने एक और सबक दिया। ट्रेनें समय पर आती रहीं। सड़कें व्यवस्थित थीं। पैदल यात्रियों को जगह मिली। सार्वजनिक परिवहन ने भरोसा कायम रखा। पुरानी इमारतें नई दुनिया के बीच भी सम्मान से खड़ी रहीं।
हमारे दल ने भी अपनी तरफ से यूरोप को कुछ दिया। भारतीय शोर, संगीत और अपनापन। हमारी बस धीरे-धीरे एक चलती-फिरती बारात बन गई। भजन शुरू हुए। फिर अंताक्षरी। फिर किस्से। फिर हंसी। कुछ दिनों में जो लोग अजनबी थे, वे रिश्तेदार जैसे लगने लगे।
जैमिन और संकेत के पास खाने का इंतजाम हमेशा रहता था। अनीताजी की जेब में फ्लेवर वाली सुपारी और दिमाग में अनुभव की पूरी दुकान थी। और लेडी मार्था! उनके पास यूरोप का ऐसा ज्ञान था जो किसी गाइडबुक में नहीं मिलता।
अगला टॉयलेट कहां है। सत्तर के बाद यह जानकारी कोलोसियम और एफिल टावर से कम महत्वपूर्ण नहीं होती है। मार्था कभी गाइड बनीं, कभी दार्शनिक, कभी ट्रैफिक पुलिस और कभी पूरे दल की अभिभावक।
पेरिस में खोया हुआ पर्स सस्पेंस बन गया। राइन फॉल्स की गलतफहमी रोमांचक अभियान बन गई। और लगातार पैदल चलने ने पैरों को लोकतांत्रिक अधिकारों की याद दिला दी। उन्होंने साफ संदेश दिया, “अब बस!” तभी हमें पता चला कि यूरोप देखने के लिए आंखें काफी नहीं हैं। पैर भी चाहिए। और पैर भी ऐसे जो सरकार की तरह हर दिन नई योजना स्वीकार कर लें!
फिर रोम आया। इतिहास हमारे सामने था। कोलोसियम था। रोमन साम्राज्य की यादें थीं। लेकिन तभी पद्मिनी के पैर में चोट लग गई। अचानक सारे सम्राट, सारे खंडहर और सारे फव्वारे पीछे छूट गए। उस एक पल ने पूरी यात्रा का सबसे बड़ा सबक दे दिया। दुनिया घूमिए, लेकिन अपने शरीर को पीछे मत छोड़िए। उम्र के इस पड़ाव पर पासपोर्ट अभी भी कहता है, “चलो दुनिया देखते हैं।” घुटने धीरे से जवाब देते हैं, “पहले होटल तक तो पहुंचो।”
पिसा ने हमारी ओर देखकर मुस्काया। रोम ने सोचने पर मजबूर किया। वेनिस ने सपने दिखाए। स्विट्जरलैंड ने व्यवस्था दिखाई। वेटिकन ने विश्वास और इतिहास की ताकत याद दिलाई। लेकिन नदियों ने सबसे गहरी बात कही।
सभ्यता आखिरकार पानी के साथ इंसान का रिश्ता है। हजारों किलोमीटर दूर यूरोप गए थे, लेकिन यूरोप ने बार-बार हमें भारत की ओर लौटा दिया। टेम्स में यमुना दिखाई दी। राइन में यमुना सुनाई दी। वेनिस की नहरों में यमुना की परछाईं महसूस हुई। और तब लगा कि शायद यात्रा का असली मतलब विदेशी धरती से प्रेम करना नहीं, बल्कि अपनी धरती को नई आंखों से देखना है। घर से दूर जाकर ही कभी-कभी घर की कीमत समझ आती है।
हम लौट रहे हैं तो साथ में तस्वीरें हैं, स्मृतियां हैं, किस्से हैं, चॉकलेट हैं और व्हाट्सऐप पर भेजने के लिए सैकड़ों तस्वीरें हैं। लेकिन सबसे बड़ी चीज सूटकेस में नहीं है। वह मन में है। एक बड़ा क्षितिज। थोड़ी ज्यादा विनम्रता। बहुत सारी कृतज्ञता। और अपनी यमुना के लिए फिर कुछ करने की बेचैनी।
सूटकेस खाली हो जाएंगे। कपड़े धुल जाएंगे। तस्वीरें परिवार और दोस्तों तक पहुंच जाएंगी। कुछ दिनों बाद हमारी यात्रा भी पुरानी खबर हो जाएगी। फिर कोई पूछेगा, “तो बताइए, यूरोप में सबसे अच्छी जगह कौन सी लगी?” मैं शायद मुस्कुराऊंगा। लंदन नहीं। पेरिस नहीं। रोम नहीं। वेनिस भी नहीं। मेरे लिए सबसे यादगार वह क्षण था, जब यूरोप की तमाम नदियों ने मिलकर मुझे वापस यमुना के किनारे खड़ा कर दिया।
तब समझ आया। दुनिया देखने से घर छोटा नहीं होता। घर की परिभाषा बड़ी हो जाती है। हम यूरोप देखने निकले थे। यूरोप ने हमें इतिहास दिया, वास्तुकला दी, व्यवस्था दिखाई, नदियां दिखाईं और ढेरों यादें दीं।
लेकिन सबसे बड़ा उपहार यह था कि उसने हमें फिर से अपनी यमुना याद दिला दी। दुनिया घूमकर लौटे तो पाया, सबसे लंबी यात्रा बाहर की नहीं थी। सबसे लंबी यात्रा अपने भीतर की थी। और उस यात्रा के अंत में भी एक नदी बह रही थी।

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