पीएन ओक ने अपनी पुस्तक 'ताज महल : द ट्रू स्टोरी' में दावा किया था कि यह स्मारक दरअसल एक प्राचीन शिव मंदिर 'तेजो महालय' है। इतिहासकारों ने अब तक इसे खारिज ही किया है। अदालतों ने भी इसे प्रमाणित इतिहास के विपरीत बताया। लेकिन, इसी विवाद को संभवतः पहली बार सिनेमाई पर्दे पर रचा गया है।
फिल्म 'द ताज स्टोरी' एक कोर्टरूम ड्रामा के रूप में यह दिखाती है कि कैसे ताज महल की उत्पत्ति पर बहस अदालत तक पहुंचती है। विष्णु दास के रूप में परेश रावल इसमें तर्क प्रस्तुत करते हैं, और दर्शक देखते हैं कि इतिहास और आस्था किस तरह टकराते हैं।
Read in English: 'The Taj Story' misses the opportunity to turn an 'issue' into a meaningful 'debate'
ओक की पुस्तक और फिल्म का रिश्ता सीधा है। पुस्तक ने विवादित बीज बोया और फिल्म ने उसे नाटकीय रूप दिया है। फर्क इतना है कि किताब एक शोध का दावा करती है, जबकि फिल्म ‘सस्ता’ मनोरंजन और ‘सस्ती’ बहस का मंच बन जाती है। यह सिर्फ एक फिल्म नहीं है, बल्कि ओक की पुस्तक से उत्पन्न विवाद में ही एक नया अध्याय है।
जगह-जगह पर फिल्म में कलाकारों से बृज भाषा में संवाद बुलवाए गए हैं। श्रीकांत वर्मा और सिद्धार्थ भारद्वाज ही कुछ हद तक इसमें सफल दिखते हैं। बृजेंद्र काला मथुरा के ही हैं, लेकिन उन्होंने उम्मीद के विपरीत बेहद खराब बृज भाषा क्यों बोली है, यह समझ में नहीं आता है। शेष सभी कलाकारों पर बृज भाषा थोपी गई सी लगती है।
इतिहासकारों के रूप में पंकज बेरी और फ्लोरा जैकब जैसे किरदारों के 'मंतव्य' पर और ज्यादा काम किया जाना चाहिए था। देखा जाए तो फिल्म के स्क्रीनप्ले पर ढंग से काम किया ही नहीं गया है। इसी के चलते यह एक 'प्रॉपेगंडा' फिल्म बनकर रह जाती है। फिल्म में इसके विषय के साथ ईमानदारी नजर नहीं आती है।
फिल्म आगरा शहर से एक महत्वपूर्ण रिश्ता रखती है, लेकिन शहर 'आगरा' पर्दे पर कहीं नहीं दिखता है। ताज महल के वही कोने बार-बार दिखाए गए हैं, जिनकी तस्वीरें पहले ही अनगिनत बार खींची जा चुकी हैं। नए एंगल और दृष्टिकोण की दरकार थी।
कुल मिलाकर, फिल्म को 'प्रॉपेगंडा' फिल्मों की श्रेणी में जाने देने से रोकने के लिए कोई प्रयास नहीं दिखता है। एक मुद्दे को बेहतरीन बहस बनाने का अवसर पूरी तरह गंवाया हुआ नजर आता है।






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