आधुनिक भारत के निर्माण में विश्वेश्वरैया का योगदान


आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले देश के दिग्गज इंजीनियर और भारत रत्न से सम्मानित सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया अपने समय से कहीं आगे के इंजीनियर माने जाते थे। उनके अथक प्रयासों के चलते कृष्णराज सागर बांध, भद्रावती आयरन एंड स्टील वर्क्स, मैसूर संदल ऑयल एंड सोप फैक्टरी, मैसूर विश्‍वविद्यालय और बैंक ऑफ मैसूर जैसे संस्थानों का निर्माण हो पाया। अपने समय के दौरान बहुत ही सीमित संसाधनों और सीमित तकनीक के बीच अपनी कार्यकुशलता से उन्होंने जो कुछ कर दिखाया, उसका लोहा आज पूरी दुनिया मानती है।

सर विश्वेश्वरैया ने ऐसे दर्जनों प्रोजेक्ट अपने जीवनकाल में तैयार किए, जिन्होंने न सिर्फ आम जनमानस के उत्थान में योगदान दिया, बल्कि सामाजिक समरसता के भाव को भी मजबूती दी। साल 1955 उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। सर विश्वेश्वरैया के नाम पर 15 सितंबर को देश में इंजीनियर दिवस मनाया जाता है। बेंगलुरु में भारत के पहले सेंट्रलाइज्ड एसी रेलवे टर्मिनल का नाम इन्हीं के नाम पर रखा गया है।

विश्वेश्वरैया को मांड्या जिले में बने कृष्णराज सागर बांध के निर्माण का मुख्य स्तंभ माना जाता है। उन्होंने हैदराबाद शहर को बाढ़ से बचाने का तंत्र भी विकसित किया। सरकार ने सिंचाई व्यवस्था दुरुस्त बनाने के लिए एक समिति बनाई थी जिसके तहत उन्होंने एक नया ब्लॉक सिस्टम बनाया। उन्होंने स्टील के दरवाजे बनाए जो बांध से पानी के बहाव को रोकने में मदद करते थे।

सर विश्वेश्वरैया को ‘फादर ऑफ मॉडर्न मैसूर’ और ‘कर्नाटक का भागीरथ’ भी कहा जाता है। बांध बनाने से लेकर देश में एचएएल, एनएएल, एमएसआईएल और वीएसआईएल जैसे विशाल उद्योगों की शुरुआत का श्रेय भी विश्वेश्वरैया को जाता है।

15 सितंबर 1861 को कर्नाटक में कोलार जिले के चिक्काबल्लापुर तालुका में जन्मे विश्वेश्वरैया भारत के पिता श्रीनिवास शास्त्री संस्कृत के बड़े विद्वान थे। महज 12 वर्ष की उम्र में विश्वेश्वरैया ने अपने पिता को खो दिया। शुरुआती पढ़ाई चिकबल्लापुर में करने के बाद वह बेंगलुरु चले गए, जहां से उन्होंने वर्ष 1881 में बीए की डिग्री हासिल की। इसके बाद वह पुणे गए, जहां उन्होंने कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में पढ़ाई की। फिर, उन्होंने बॉम्बे विश्वविद्यालय से सिविल इंजीनियरिंग में लाइसेंस प्राप्त किया और वहां के लोक निर्माण विभाग के साथ काम करना शुरू किया। थोड़े समय बाद वह भारतीय सिंचाई आयोग में शामिल हुए। साल 1962 में उनका देहावसान हो गया।

वर्ष 1909 में उन्हें मैसूर राज्य का मुख्य अभियंता नियुक्त किया गया था। इसके ठीक तीन वर्ष बाद साल 1912 में उन्हें मैसूर के दीवान का दर्जा दिया गया। इसके अलावा उन्हें जॉर्ज वी पुरस्कार और सार्वजनिक जीवन में उत्कृष्ट योगदान के लिए किंग जॉर्ज पंचम ने ब्रिटिश इंडियन एम्पायर के नाइट कमांडर से नवाजा गया। मुंबई में असिस्टेंट इंजीनियर के पद पर रहते हुए उन्होंने जल स्रोतों से घर-घर में पानी पहुंचाने की व्यवस्था की और गंदे पानी की निकासी के लिए नालियों की समुचित व्यवस्था की। प्रथम चरण में ही उन्होंने मैसूर, बड़ौदा, कराची, हैदराबाद, बैंगलोर, पूना, ग्वालियर, इंदौर, कोल्हापुर, नागपुर, बीजापुर, धारवाड़, सूरत और नासिक सहित दर्जनों नगरों को जल संकट से मुक्त कराने में अहम भूमिका निभाई।

विश्वेश्वरैया ने कावेरी नदी पर कृष्णा राजा सगरा बांध के निर्माण की देखरेख से लेकर इसके उद्घाटन तक का निरीक्षण किया। यह बांध एशिया का सबसे बड़ा जलाशय था। इसके अलावा विश्वेश्वरैया ने बिहार राज्य में गंगा नदी के ऊपर बनाए गए मोकामा ब्रिज के स्थान के लिए अपनी बहुमूल्य तकनीकी सलाह दी थी।

ज्ञात हो कि कृष्णा राजा सगर बांध कर्नाटक के मांड्या जिले में बनाया गया एक गुरुत्वाकर्षण बांध है। इसकी क्षमता लगभग 1,368,847,000 घन मीटर है। यह बांध लगभग 10,619 वर्ग किमी के जलग्रहण क्षेत्र को कवर करता है।

इन उपलब्धियों के अलावा मांड्या में कृष्णा राजा सागर बांध को डिजाइन व तिरुमला और तिरुपति के बीच सड़क निर्माण की योजना तैयार करने का श्रेय भी विश्वेश्वरैया को ही जाता है। उन्होंने साल 1895 में सुक्कुर की नगर पालिका के लिए जलकुंडों का डिजाइन और निर्माण भी किया था। उन्होंने ब्लॉक प्रणाली के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वह एक ऐसे इंजीनियर थे, जिन्होंने आजादी से पहले 1934 में भारतीय अर्थव्यवस्था की योजना बनाई और देश के विभिन्न भागों को बाढ़ से बचाने में भी इन्होंने अहम भूमिका निभाई। बेंगलुरु स्थित जयानगर प्लांट की लेआउट डिजाइनिंग और इस पर वैश्विक स्तर की योजना बनाने का श्रेय भी इन्हीं को जाता है।



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