दिशाहीन विकास ने वृंदावन को किया विकृत


कुछ वर्षों पूर्व प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने बृज मंडल के नियोजित विकास और पुराने वैभव को लौटाने के लिए एक पूर्व पुलिस अधिकारी को बृज तीर्थ विकास बोर्ड की कमान सौंप दी थी। निर्माण और सहूलियत विकास के दर्जनों प्रोजेक्ट्स पर करोड़ों रुपये खर्च हो गए, लेकिन न बृज भक्ति, न ही आध्यात्मिकता, न ही विरासत संवर्धन, न ही यमुना मैया की दुर्दशा को सुधारने के लिए कोई काम किया गया। सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण का काम भी लटका हुआ है।

वृंदावन, जो कभी श्रद्धा और विरासत का अभयारण्य हुआ करता था, अब व्यवसायीकरण और पर्यावरण क्षरण के चंगुल में फंस चुका है। एक तीर्थ स्थान को आधुनिक पर्यटन कैसे बर्बाद कर सकता है, देखने के लिए वृंदावन आइए। पर्यटन और दिशाहीन विकास ने इस पवित्र नगरी को विकृत स्वरूप में बदल दिया है। साथ ही, आध्यात्मिकता और स्थिरता के बीच के नाजुक संतुलन को बिगाड़ कर रख दिया है।

प्रभु भक्ति और सादगीभरी ग्रामीण संस्कृति के संतुलन को लाभ-संचालित एजेंडों ने रौंदकर रख दिया है। आधुनिकता के शोर ने दिव्यता की फुसफुसाहट को दबा दिया है, जो कभी इसके पवित्र उपवनों और प्राचीन मंदिरों के माध्यम से गूंजती थी। इस निराशाजनक स्थिति को सुधारने और वृंदावन को उसके पुराने गौरव को वापस लाने के लिए सुधारों का एक व्यापक पैकेज जरूरी है।

पर्यटकों की आमद को नियंत्रित करने और शहर की आत्मा को निगलने वाले अनियंत्रित व्यावसायीकरण को रोकने के लिए कड़े नियम लागू किए जाने चाहिए। भूमि की पवित्रता को संरक्षित रखने के लिए मात्रा से अधिक गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित करते हुए सतत पर्यटन प्रथाओं को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

इसके अलावा, शहर की सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए विरासत संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। प्राचीन मंदिरों, घाटों और विरासत स्थलों के जीर्णोद्धार परियोजनाओं को भविष्य की पीढ़ियों के लिए उनके संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए सावधानी और विशेषज्ञता के साथ शुरू किया जाना चाहिए।

आध्यात्मिकता और स्थिरता की कीमत पर प्रगति की बेतहाशा खोज ने पवित्र शहर पर गहरा दाग छोड़ दिया है। आने वाली पीढ़ियों के लिए इसकी विरासत को संरक्षित करते हुए, वृंदावन को श्रद्धा और सद्भाव के मार्ग पर वापस लाने का समय आ गया है।

सर्व प्रथम, वृंदावन को हेरिटेज सिटी घोषित किया जाए। ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं और आधुनिक टाउनशिप्स के निर्माण पर रोक लगे। यमुना के शुद्धीकरण के लिए ठोस योजनाएं बनें। योगी राज से पूर्व बृज फाउंडेशन ने बृज मंडल के समग्र विकास का एक खाका प्रस्तुत किया था और अनेक प्रोजेक्ट्स धरातल पर उतारे थे। फिर एक जंग छिड़ी, न जाने क्यों सामंजस्य नहीं बैठा, और एक सकारात्मक पहल को भटका दिया गया।

क्या सभी स्टेक होल्डर्स एक मंच पर नहीं आ सकते? क्या निजी स्वार्थ या अहम इतने बड़े हो गए हैं जो सबके मिलजुलकर कार्य करने में बाधा बन रहे हैं। अच्छा यही होगा कि बृज के सभी संत, बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता मिलकर एक उजड़ते चमन को बचाने की जोरदार पहल करें। सिर्फ सरकार के भरोसे श्री कृष्ण की लीला भूमि नहीं बचेगी।



Related Items

  1. कंक्रीट और कारोबारी बाजार को भेंट तो नहीं चढ़ रही पवित्र तीर्थ स्थलों की रूह!

  1. राजनीतिक उलझनों के बीच कर्नाटक में बह रही है विकास की बयार

  1. गुरु दत्त की विरासत संग पुणे में होगा विश्व सिनेमा का संगम




Mediabharti