अदालतों की इमारतें सिर्फ पत्थर और दीवारों से नहीं बनती हैं। उनका असली आधार जनता का भरोसा होता है। इसलिए, जब न्यायपालिका जैसे सर्वोच्च संवैधानिक मंचों से कठोर शब्द निकलते हैं, तो वे सिर्फ एक टिप्पणी नहीं रहते, समाज के लिए एक व्यापक संदेश बन जाते हैं। हाल में ‘तिलचट्टे’ और ‘परजीवी’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल ने एक नई बहस को उकसाया है।
बीती 15 मई को वरिष्ठ अधिवक्ता पदनाम से जुड़ी सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने उन लोगों पर चिंता जताई, जो वैध योग्यता या पेशेवर क्षमता के बिना मीडिया, सोशल मीडिया और आरटीआई एक्टिविज्म के जरिए संस्थाओं पर लगातार हमला करते हैं। उन्होंने कुछ तत्वों के लिए ‘तिलचट्टे’ और ‘परजीवी’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया।
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हालांकि, बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी पूरे युवावर्ग या सभी एक्टिविस्टों के लिए नहीं थी, बल्कि उन लोगों के लिए थी जो गलत तरीकों से व्यवस्था का दुरुपयोग करते हैं। यह स्पष्टीकरण जरूरी था और उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन, इसके बावजूद एक असहज सवाल बना रहता है कि क्या इतनी तीखी भाषा जरूरी थी?
भारत का युवा पहले ही भारी दबाव में जी रहा है। बेरोजगारी बढ़ रही है। प्रतियोगिता लगातार कठिन होती जा रही है। लाखों पढ़े-लिखे युवा नौकरी, अवसर और पहचान की तलाश में भटक रहे हैं। ऐसे माहौल में जब ऊंचे संवैधानिक पदों से व्यापक टिप्पणियां आती हैं, तो कई लोगों को लगता है कि उनकी निराशा और संघर्ष को समझने के बजाय उनका मजाक बनाया जा रहा है। लोकतंत्र में असहमति रखने वाला हर व्यक्ति दुश्मन नहीं होता है।
यह भी उतना ही सच है कि मीडिया, सोशल मीडिया और आरटीआई का दुरुपयोग हुआ है। कुछ लोग व्यक्तिगत एजेंडा चलाते हैं। कुछ यूट्यूब चैनल सनसनी बेचते हैं। कुछ लोग आरटीआई को सूचना के अधिकार की जगह निजी बदले का हथियार बना देते हैं। अदालतों पर भी कई बार बिना तथ्यों के आरोप लगाए जाते हैं। सोशल मीडिया पर न्यायपालिका के खिलाफ फर्जी अभियान चलाए जाते हैं। यह सब चिंता का विषय है।
मीडिया ट्रायल के उदाहरण हमारे सामने हैं। जेसिका लाल हत्याकांड, आरुषि तलवार मामला और सुशांत सिंह राजपूत केस में टीवी स्टूडियो अदालत से पहले फैसले सुनाने लगे थे। चीखती बहसों और सनसनीखेज रिपोर्टिंग ने निष्पक्ष सुनवाई पर असर डाला। सुप्रीम कोर्ट खुद कई बार मीडिया को चेतावनी दे चुका है कि न्यायिक मामलों में संयम जरूरी है।
इसी तरह, अदालतों ने आरटीआई के दुरुपयोग पर भी चिंता जताई है। कई मामलों में अधिकारियों ने कहा कि निरर्थक और बार-बार दाखिल आरटीआई आवेदन कामकाज को प्रभावित करते हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी कुछ मामलों में माना कि बदले की भावना से डाली गई आरटीआई व्यवस्था में ‘भय’ पैदा करती हैं। यह चिंता पूरी तरह गलत नहीं कही जा सकती है।
लेकिन, तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। टिप्पणीकार प्रो पारस नाथ चौधरी कहते हैं, "इसी आरटीआई कानून ने भ्रष्टाचार के कई बड़े मामलों को उजागर किया। इसी ने आम नागरिक को सवाल पूछने की ताकत दी है। कई स्वतंत्र पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सत्ता के दुरुपयोग को सामने लाने का साहस दिखाया है। लोकतंत्र में असहज सवाल पूछना अपराध नहीं होना चाहिए।"
समस्या यह है कि आज हर आलोचना को दुश्मनी और हर सवाल को षड्यंत्र मान लेने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। यही प्रवृत्ति संस्थाओं और जनता के बीच दूरी पैदा करती है। अदालतों की ताकत सिर्फ अवमानना की शक्ति में नहीं, बल्कि जनता के नैतिक विश्वास में होती है।
एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि अदालत की गरिमा बनाए रखने का सबसे अच्छा तरीका उसके फैसलों की गुणवत्ता और न्यायपूर्ण व्यवहार है। यह बात आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। बड़े पदों पर बैठे लोगों के शब्दों में कठोरता नहीं, संतुलन ज्यादा दिखाई देना चाहिए।
न्यायिक स्वतंत्रता लोकतंत्र की रीढ़ है और उसकी रक्षा हर हाल में होनी चाहिए। लेकिन, सम्मान और रचनात्मक आलोचना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।
एक विविध, बेचैन और तनावग्रस्त समाज में अदालतों की भूमिका सिर्फ कानून लागू करने की नहीं बल्कि भरोसा पैदा करने की भी है। इसलिए, न्यायपालिका से निकले शब्द ऐसे होने चाहिए जो लोगों को जोड़ें, तोड़ें नहीं। अदालतों की असली ताकत डर पैदा करने में नहीं, बल्कि न्याय और संवेदनशीलता के साथ विश्वास कायम करने में है।

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