उत्तराखंड आपदा का एक साल : निशान अब भी हैं बाकी...

लेखक.. पवन तिवारी

ठीक एक साल पहले आज ही का दिन उत्तराखंड के लिए किसी काले दिन से कम नहीं था। उत्तराखंड में आई भीषण दैवीय अपदा ने उत्तराखंड के दिल में ऐसा जख्म दिया कि आज एक साल हो जाने के बाद भी उस जख्म के घाव हरे हैं। उस दौरान 'देवभूमि' कही जाने वाली उत्तराखंड की जमीन में किसी भी देव के पदचिह्न नहीं बल्कि लाशों का अंबार दिखाई दे रहा था।

उत्तराखंड में आई भीषण तबाही इस बात का संकेत है कि जब भी इंसान प्रकृति की बनाई हुई चीजों से खिलवाड़  करने की कोशिश करेगा तब-तब प्रकृति के कहर को उसे झेलना पड़ेगा। 

बीते साल की त्रासदी का साया अब भी उत्तराखंड पर मंडरा रहा है। उत्तराखंड में पर्यटन व्यवसाय पर निर्भर लोगो के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यात्रियों का भरोसा कैसे बहाल किया जाए। अब की बार तीर्थयात्रियों की संख्या में आई गिरावट ने यहां के होटल और गेस्टहाउस कारोबार की कमर तोड़ कर रख दी है। प्रकृति के बीच बसे इस प्रदेश में एक साल गुजर जाने के बाद भी नर कंकालो का मिलना बदस्तुर जारी है।

इस सबको को देखते हुए, तबाही में मारे गए लोगों की संख्या का आंकलन करना बेहद मुश्किल हैं। तबाही के बाद से कई गांव में फिर से जीवन शुरू नहीं हो पाया है। इस तबाही का कारण इंसान ही है जो अपनी आवश्कताओं की पूर्ति के लिए दिन-प्रतिदिन प्रकृति के साथ खिलवाड़ करता जा रहा है। हम लोग अब भी इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं है कि इस तबाही का वास्तविक कारण हम ही थे।

पुनर्वास के दावे करने वाली सरकार अभी तक आपदा से जूझ रहे वाशिंदों के लिए सुरक्षित विस्थापन की राह नहीं तलाश पाई है। केदारनाथ में आई आपदा की पहली बरसी पर देशभर में हजारों आंखें आज फिर से नम हो गई हैं। किसी अपने के खो जाने का दर्द हर उस दिल में है जो उस तबाही के दौरान किसी न किसी तरह उत्तराखंड में मौजूद था। आज भी उनकी आंखों में अपनों की यादों में आंसू उमड़ आते हैं... या फिर कोई विचलित मन आज भी उम्मीद लिए अपने अपनो की तलाश में उत्तराखंड पहुंच जाता हैं।

घाटी में बिखरे पत्थर प्राकृतिक न्याय की अवधारणा का सबूत हैं। इस बार इनसे सबक लेने की जरूरत है। प्रकृति को प्राकृतिक तरीके से चलने दें क्योंकि प्रकृति ही जीवन धारा है। यह बची रही तो जीवन यात्रा यूं ही चलती रहेगी। अन्यथा पलायन के लिए धरती छोटी पड़ जाएगी।


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