चिकित्सक नहीं, फार्मासिस्ट और वार्ड बाॅय कर रहे उपचार
मथुरा। सरकार आम ग्रामीणों को चिकित्सा मुहैय्या कराने के कितने ही दावे क्यों न करें, ग्रामीण क्षेत्रों में हालात बदतर है। सफेद हाथी की तरह अस्पताल भवन तो खड़े हैं लेकिन चिकित्सक तैनात नहीं है। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी वहां अपनी हाजरी लगा खाना पूर्ति कर रहे हैं। मरीज अस्पताल से वापस लौट झोलाछाप या फिर निजी नर्सिंग होम में जेब कटवाने को मजबूर हैं।
यही हाल है सुरीर स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र का है, जहां आसपास गांवों को मिला कर करीब पचास हजार लोगों के इलाज के लिए स्थापित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सुरीर पर इन दिनों मरीजों के इलाज की सुविधाओं का भारी अभाव है। वर्तमान में यहां किसी डॉक्टर की भी तैनाती नहीं है। फार्मासिस्ट समेत गिने-चुने तीन-चार कर्मचारियों के भरोसे यहां इलाज की खानापूर्ति हो रही है। इस स्वास्थ्य केंद्र पर भवन तो करोड़ों की लागत से बन रहे हैं, लेकिन नए भवनों में बैठने के लिए डॉक्टर एवं कर्मचारी तो दूर इनको खोलने तक को स्टॉफ की किल्लत बनी है। जिससे इन भवनों का कोई औचित्य लोगों की समझ में नहीं आ रहा है। ग्रामीण क्षेत्र में धड़ल्ले से निजी क्लीनिक, नर्सिग होम, पैथोलॉजी, अल्ट्रासाउंड सेंटर आदि खुल रहे हैं। अधिकांश में सरकार द्वारा निर्धारित मानक की अनदेखी हो रही है और इलाज के नाम पर मरीजों का शोषण कर नाजायज एवं मनमानी रुप से फीस व चिकित्सा जांच शुल्क वसूले जा रहे हैं।
व्यापार मंडल के अध्यक्ष ब्रह्मानंद गुप्ता के अनुसार भवन बना देने से स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ होने वाली नहीं हैं। पहले डॉक्टर एवं सुविधाओं की व्यवस्था की जानी चाहिए। भूपेन्द्र सिंह राजपूत का कहना है कि स्वास्थ्य केंद्र सुरीर पर भवन तो बन रहे हैं, लेकिन इलाज के लिए सुविधाओं एवं डॉक्टरों की तैनाती की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। जिससे यह भवन सफेद हाथी की तरह खड़े दिखाई दे रहे हैं।





