
मुडि़या पूर्णिमा मेले को जिला प्रशासन ने बनाया स्थानीय लोगों पर कहर
अधीनस्थों ने सच के बजाय पिछले रिकाॅर्ड के आधार पर कराया निरीक्षण
बाॅक्स में
खून के आंसू रूलाती है विद्युत आपूर्ति, पेयजल आपूर्ति पर नहीं किसी का ध्यान,आन्यौर मंे स्वास्थ्य केन्द्र के बदतर हालात,विद्युत सुधारों से पनपा गर्मी व पेयजल संकट, हर वर्ष बदले जाते है नये विद्युत तार और खम्बे, बजट की सर्वाधिक बर्बादी करता है विजली विभाग,चुपचाप होती है मेले की प्रशासनिक व नागरिक बैठकें, आम लोगों की सच्चाईयों से दूर होती हैं मेला तैयारियां,परिक्रमा के चैड़ीकरण में भूले राधाकुण्ड और जतीपुरा को,23 करोड़ खर्च पर भी नहीं जाना मैली मानसी गंगा का दर्द, अस्तित्व बचाने को जूझ रहा राधाकुण्ड स्थित पशु चिकित्सालय, पूरी परिक्रमा में रूलायेगा श्रद्धालुआंे को कंकरीला डाबर का मार्ग,चोर, जेबकट, उठाईगीरों और स्नैचरों के नहीं हुए ठोस इन्तजामात,
गोवर्धन। गिरिराज धाम मेें अगले माह लगने वाले विश्व प्रसिद्ध मुडि़या मेले की तैयारियों का विगत दिनों जिलाधिकारी वी0 चन्द्रकला द्वारा किया गया निरीक्षण बहुत ही प्रभावपूर्ण और अधीनस्थों का सिर दर्द बना रहा। लेकिन इसके बावजूद ये निरीक्षण यहां मेले और स्थानीय मुददों से जुड़े कई अहम सवालों को अधूरा छोड़ गया। जिलाधिकारी ने यहां की सप्त कोसीय परिक्रमा मार्ग में जगह जगह खामिया और अव्यवस्थाओं को देखकर अधीनस्थों को कडी हिदायतें दी और साथ ही उन्हें सभी कार्य जल्द से जल्द पूरा करने की चेतावनी भी दी। लेकिन इस दौरान मौजूद रहे अधिकारियों के लाव लश्कर और सरकारी अमले ने जिलाधिकारी को चारों ओर से इस तरह घेर रखा था कि कोई भी स्थानीय व्यक्ति या श्रद्धालु उन्हें मेले या अन्य किसी स्थानीय मुददें से जुड़े सुझाव अथवा समस्याऐं अवगत नहीं करा सके। उन्हें केवल पिछले वर्षो के सरकारी आंकड़ों के आधार पर ही अधिकारियों ने क्षेत्र का निरीक्षण करा दिया। जिससे जिलाधिकारी चाहते हुए भी गिरिराज धाम के दर्द का सच नहीं जान पायी और उनका ये निरीक्षण अपने औचित्य पर कई सवाल छोड़ गया।
विदित हो कि अगामी जुलाई मंे लगने वाले गिरिराज धाम के विश्व प्रसिद्ध राजकीय मेले मुडि़या पूर्णिमा की तैयारियां युद्ध स्तर पर जारी है। इन तैयारियों के निरीक्षण को विगत दिनों जिलाधिकारी बी0 चन्द्रकला अधिकारियों के साथ गोवर्धन पहुंची और उन्होंने दानघाटी मंदिर में पूजा अर्चना कर सप्तकोसीय परिक्रमा का निरीक्षण किया था। जिसमें उन्होंने खामियां देख अधिकारियों को कडी हिदायतें एवं कार्य जल्द पूरा करने के निर्देश दिये एवं राधाकुण्ड व गोवर्धन में गंदगी देख अधिशाषी अधिकारी रजनीश शर्मा को फटकार लगायी और जल्द सफाई के निर्देश भी दिये। मुखार बिन्द मंदिर में दर्शन कर मंदिर में एकत्रित गंदगी साफ कराने के सेवायतों को निर्देश दिये। परिक्रमा चैडीकरण में पीडब्लूडी के अधीक्षण अभियन्ता अनिल कुमार को 3 करोड़ की राशि पर 300 लेवर लगाकर जल्द कार्य कराने के निर्देश दिये। लेकिन जिलाधिकारी का ये निरीक्षण इस बार भी पिछले जिलाधिकारियों के जैसा ही रहा जिलाधिकारी चाहते हुए भी गिरिराज धाम का सच नहीं जान पायी और यहां की पीड़ा दबी की दबी रह गयी। वास्तव में डीएम अपने इस निरीक्षण में वही सब देख सकीं जो साथ मौजूद प्रशासनिक अमले ने उन्हें दिखाया या अपने पिछले रिकाॅर्ड में से उन्हें बताया। मेला क्षेत्र का वास्तविक सच डीएम साहिबा जान ही नहीं पायी। यहां स्थानीय लोगों से संवाद या उनके सुझाव एवं समस्याऐं डीएम साहिबा तक पहुंच ही नहीं पाये और बेहतर निरीक्षण की वाह वाही लूट कर अधिकारियों ने चैन की सांस ली। जबकि सच तो ये है कि पांच दिन के इस मेले की व्यवस्थाओं के नाम पर जिला प्रशासन द्वारा मानवता के साथ ऐसा घिनौना खेल खेला जाता है जिसकी पूरी सच्चाई जानकर किसी भी अधिकारी दिल पसीज जायेगा। हर साल यहां के लोगों पर किसी भयंकर त्रासदी के जैसी साबित होने वाली मुडि़या पूर्णिमा मेले की ये तैयारियां स्थानीय लोगों के लिये कहर बनकर गुजरती है। इन तैयारियों की भयावहता से भयभीत लोग भगवान से प्रार्थना करने लगते है कि भगवान ये मेला हमारे यहां आया ही न करे। वास्तव में दुनिया भर के श्रद्धालुओं की विभिन्न संस्कृतियों एवं गिरिराज धरा के लोगों की सेवा सत्कार के समन्वय का येे विशाल मेला अब पूरी तरह प्रशासनिक अमले के अतिक्रमण की चपेट चढ़ गया है। हर साल अतिक्रमण हटाने के नाम पर विध्वंस मचाने वाला प्रशासन स्वयं अपनी हदों को भूलकर किये गये अपने अतिक्रमण को हटाने का प्रयास कभी नहीं करता जिससे कि पुनः स्थानीय लोग आगे आकर सहयोग सहायता और सेवा सत्कार का श्रद्धालुओं से समन्वय करा सकें। यही मेला पूर्व में अपनी तत्कालीन विशालता के साथ यहां के संक्षिप्त संसाधनों, संकरे रास्तों, सीमित प्रशासनिक आवश्यकताऐं आदि के बीच स्थानीय सहयोग, धार्मिक औैर सेवा की भावना आदि के साथ सरलता से सम्पन्न हो जाता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इस मेले में बढ़े प्रशासनिक हस्तक्षेप के कारण ये मेला स्थानीय लोगों के लिये आफत बन गया है। पहले जहां लोग इस स्वतः स्फूर्त मेले की विशालता को लेकर रोमांचित और गदगद होते थे वहीं अब इस मेले की प्रशासनिक भयवहता को लेकर कोसते नजर आते हैै। बेइन्तहां बढ़े प्रशासनिक हस्तक्षेप के बावजूद प्रशासन द्वारा न तो मेले के लिये कोई बेहतर व्यावस्थाऐं हो पाती है और न ही मेला बिना हादसों के सम्पन्न हो पाता है। व्यापक व्यवस्थाओं के बावजूद व्यवस्थाऐं कमजोर रह जाती है और हर बार छिटपुट हादसे घटित हो ही जाते है।
पांच दिवसीय ये मेला तो खैर जैसे तैसे अपनी ही गति से सम्पन्न हो ही जाता है लेकिन इससे पूर्व के करीब दो माह का गर्मियों का समय मेले की तैयारियों के नाम पर यहां के लोगों पर कहर बन कर टूटता है। यहां के लोग हर बार मेले की तैयारियों के नाम पर छले जाते है और हर बार उनका शोषण किया जाता है। सर्वाधिक बेकदरी बिजली विभाग द्वारा की जाती है। भीषण गर्मी के बीच समूचे प्रदेश में छाये बिजली संकट के दौरान ही विभाग द्वारा मेले में अबाधित विद्युत आपूर्ति देने के दावों के साथ यहां लगातार दो माह तक मेला तैयारियां की जाती है साथ ही दिन रात आपूर्ति काट कर यहां काम किया जाता है। हर वर्ष होने वाले इन विद्युत सुधारों में पिछले वर्ष के सुधार इतने कमजोर और बेकार होते है एक वर्ष भी वे सुधार सुचारू नहीं रह पाते और कभी कोई अधिकारी पिछले वर्ष के उन सुधारों की हकीकत जानने का प्रयास भी नहीं करता। हर वर्ष यहां सुधारों के नाम पर व्यापक स्तर पर वही विद्युत तार, सीलिंग्स, पोल आदि बदले जाते है, वही झूलती विद्युत लाइनें ठीक की जाती है जो पिछले साथ ठीक किये गये थे। हर साल विभाग द्वारा परिक्रमा मार्ग की विद्युत लाइने दुरूस्त करने के नाम पर रात दिन काम किया जाता है और प्रचण्ड गर्मी में भी पूरे पूरे दिन विद्युत आपूर्ति बन्द रख लोगों को खून के आंसू रूलाया जाता है। इस एक ओर तो बिजली संकट पैदा होता है वहीं पेयजल संकट भी गहराने लगता है। जबकि क्षेत्र की पेयजल आपूर्ति पर कभी कोई ध्या नही देता। मेले के दौरान अनेकों अस्थायी चिकित्सा कैम्प लगवाये जायेगे लेकिन आन्यौर और राधाकुण्ड में स्थित स्थायी चिकित्सालयों की बदहाली किसी को नहीं दिखती। न तो यहां कभी चिकित्सक आते है और न ही कभी ये खोले जाते है बल्कि ये चिकित्सालय मलबों के ढेर में तब्दील हो चुके है। हर वर्ष मेले के लिये यहां चलने वाले चैैड़ीकरण अभियान मंे कभी भी जतीपुरा और राधाकुण्ड के परिक्रमा मार्ग का चैड़ीकरण नहीं किया जाता बल्कि हर बार गोवर्धन के ही चैड़े बाजारों को उजाड़ एवं उखाड़कर गरीबों के रोजगार से दो दो हाथ किये जाते है। इस बार परिक्रमा मार्ग के हो रहे चैड़ीकरण के दौरान भी राधाकुण्ड जतीपुरा का खयाल किसी को नहीं आया है। 23 करोड़ खर्च करने के बावजूद आज तक मानसी गंगा झील की गन्दगी का मैला पानी शायद डीएम साहिबा को दिखाई नही दिया। आखिर क्यों 23 करोड़ के पानी को पी जाने वालों से हिसाब नहीं मांगा जाता। हर साल लोक निर्माण विभाग द्वारा गिरिराज धाम और उससे जुड़े लगभग सभी सम्पर्क मार्गो को एक मोटे बजट से ठीक कराया जाता है लेकिन पिछले बजट से बनबायी गयी सड़क की गुणवत्ता को हर बार नजरन्दाज किया जाता है। इसके बावजूद करोड़ो परिक्रमार्थी कंकरीले डाबर रोड पर ही अपने घायल हुए पैरों से परिक्रमा कर खुद को धन्य बताते हुए लौट जाते है। विगत दिनों में इस क्षेत्र में हुई ताबड़ तोड़ लूट, चोरी और स्नैचिंग की वारदातों एवं हर वर्ष मेले में होने हजारों वारदातों के बावजूद इस बार भी कोई ठोस योजना इन अपराधियों से निपटने के लिये नहीं बन पायी हैं। स्थानीय लोगों और कस्बे के बीचों बीच थाना परिसर में होने वाली मेले की तैयारियों की प्रशासनिक नागरिक बैठकें अब बन्द हाॅल और कस्बे के बाहर के सभागारों में सम्पन्न होने लगी है। इससे स्थानीय लोग अब बैठकों में उपस्थित रहकर अपनी और क्षेत्र की पीड़ाऐं भी व्यक्त कर पाने में कतराने लगे है। इसीलिये ये मेला स्थानीय सहयोग और आम लोगों का मेला न रहकर केवल प्रशासनिक मेला बन गया है। लोग अब इस मेले की विशालता के साथ ही इसकी प्रशासनिकता से कतराने और घबराने लगे है। मेला तैयारियों के नाम पर मेले से पूर्व के दो माह यहां के लोग इस कहर से बचने को पलायन कर जाते है। लेकिन अधिकतर लोग जो कहीं जा नहीं पाते वो इस त्रासदी को झेलने के लिये मजबूर होते है।





