
एक सच्चे गांधीवादी नेल्सन मंडेला ने दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद नीति की सरकार से मानवाधिकार, स्वतंत्रता और अश्वेतों की भागीदारी हासिल करने के लिए लोकतांत्रिक तरीके अपनाए। नेता के रूप में नेल्सन मंडेला की महात्मा गांधी, इटली के गरिबाल्डी और सोवियत संघ के लेनिन जैसे प्रखर सुधारवादियों से तुलना की जा सकती है।
इन सुधारवादियों ने स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा के लिए जीवन पर्यन्त संघर्ष किया। मंडेला ने दक्षिण अफ्रीका के शासकों की जातीय भेदभाव की रंगभेद नीति के खिलाफ संघर्ष किया। उनके अथक संघर्ष से अश्वेत लोगों को समान अधिकार मिले। अश्वेत लोगों को समानता, स्वतंत्रता, मानवीय गरिमा और जीवन के अधिकार से वंचित रखा जाता था। नेल्सन मंडेला ने श्वेत शासकों के दमन का विरोध किया और उन्हें 27 वर्ष जेल में काटने पड़े। अंतत: 1990 में शीतकाल में प्रिटोरिया सरकार ने मंडेला को रिहा किया। भारत सरकार ने नेल्सन मंडेला को 1980 में नेहरू शांति पुरस्कार और 1990 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाज़ा। भारत रत्न का सम्मान अब तक केवल दो विदेशियों को दिया गया है। डॉक्टर मंडेला से पहले भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए सीमान्त गांधी खान अब्दुल गफ्फार खां को यह सम्मान दिया गया था। समूचे विश्व ने नेल्सन मंडेला की महान नेता के रूप में प्रशंसा की। इस नेता ने अफ्रीकी नेशलन कांग्रेस के साथ मिलकर अपने देश में अश्वेत नागरिकों की मुक्ति के लिए रचनात्मक विद्रोह शुरू किया। विश्व ने स्वतंत्रता के मंडेला के संघर्ष को मान्यता दी और उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। मंडेला स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा के लिए साहस और संघर्ष की प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में सत्ता के सुचारू हस्तांतरण में सहायता दी और इस दौरान रक्तपात तथा नफरत से देश को बचाया। संयुक्त राष्ट्र संघ 18 जुलाई मंडेला दिवस के रूप में मनाता है।
बचपन-नेल्सन मंडेला का जन्म 18 जुलाई 1918 को हुआ था और वे वहां मादिबा के रूप में लोकप्रिय थे। उनके पिता तेम्बू जनजाति के मुखिया थे। नेल्सन मंडेला ने कानून के युवा विद्यार्थी होते हुए अल्पसंख्यक श्वेत शासन का राजनीतिक विरोध करना शुरू किया। नेल्सन मंडेला की युवाकाल में मुक्केबाजी में रूचि थी और उन्हें भारी वजन श्रेणी में रखा जाता था। उन्हे बाद में विद्यालय के शिक्षक ने अंग्रेजी नेल्सन नाम दिया जबकि उनके दादा का नाम मंडेला था।
राजनीतिक संघर्ष-मंडेला 1942 में अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस में शामिल हुए और गतिशील युवा लीग की 1944 में सह-अध्यक्ष के रूप में स्थापना की। उनके पिता थेम्बू जनजाति के प्रमुख थे और थेम्बू नरेश के सलाहकार भी थे। नेल्सन मंडेला ने अश्वेत लोगों पर श्वेत शासकों के अत्याचारों का स्वयं अनुभव किया। वे 22 वर्ष की आयु में जोहान्सबर्ग पहुंचे जहां उनकी मुलाकात सक्रिय क्रांतिकारी वाल्टर सिसुलू से हुई। मंडेला ने कानून की पढ़ाई शुरू की। उन्होंने सिसुलू और ओलीवर ताम्बो के साथ मिलकर श्वेत शासकों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया जिसे प्रिटोरिया प्रशासन ने कुचल दिया। अफ्रिकानर प्रभुत्व वाली नेशनल पार्टी की 1948 के चुनाव में विजय के फलस्वरूप जातीय आधार पर अलगाव की रंगभेद नीति को कानून बनाया गया। मंडेला 1952 में अवज्ञा अभियान और 1955 में कांग्रेस ऑफ द पीपुल आंदोलन के कारण अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस में प्रमुखता से जाने जाने लगे। कांग्रेस ऑफ द पीपुल ने स्वतंत्रता के घोषणापत्र को स्वीकार किया जिससे रंगभेद नीति विरोधी प्राथमिक कार्यक्रम बनाया जा सका। शुरू में इसे अहिंसक व्यापक संघर्ष के प्रति वचनबद्ध रखा गया और मंडेला और उनके साथियों ने मार्च 1960 में शार्पविले में निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी के बाद सशस्त्र कार्रवाई करने की पहल की। उन्होंने रंगभेद नीति समूह पर प्रतिबंध लगाने का भी विरोध किया। 1961 में वह अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस की सशस्त्र शाखा, उमखोंतो वी सिज्वे के कमांडर बने। इसके बाद अगले साल अगस्त में उन्हें गिरफ्तार किया गया और वे 5 वर्ष तक जेल में रहे। जून 1964 में उन्हें सशस्त्र कार्रवाई की योजना बनाने में शामिल होने के लिए आजीवन कारावास की सजा दी गई। उन्होंने कुख्यात रोबेन द्वीप जेल में कैदी के रूप में रहने की शुरूआत की और केपटाउन तट से दूर छोटे द्वीप में इस जेल में कड़ी सुरक्षा थी। उन्हें अप्रैल 1984 में केपटाउन में पोलसमूर जेल में भेजा गया और दिसम्बर 1988 में पारर्ल के निकट विक्टर वरस्टर जेल में रखा गया जहां से उन्हें बाद में रिहा किया गया।
27 वर्ष की जेल यात्रा-
मंडेला ने अपनी जेल यात्रा के दौरान अफ्रीकांस बोलना सीखा और वहां के इतिहास की जानकारी ली। मंडेला ने जेल में रहते हुए ट्रांसकेई क्षेत्र की स्वतंत्रता स्वीकार करने की बानतुस्तान नीति को स्वीकार करने और वहां जाकर बसने की सहमति देने के बदले में सजा माफ किए जाने की जेलरों की पेशकश ठुकरा दी। दक्षिण अफ्रीका और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रंगभेद नीति के विरोधियों में प्रमुख मंडेला स्वतंत्रता और समानता के सांस्कृतिक प्रतीक बन गए। वे फरवरी 1990 तक जेल में रहे और उन्हें अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के सतत् अभियान और अंतर्राष्ट्रीय दबाव के कारण रिहा किया गया। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति एफ डब्लु डि क्लार्क ने 2 फरवरी 1990 को अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस और अन्य रंगभेद विरोधी संगठनों पर लगा प्रतिबंध हटाया। मंडेला को 11 फरवरी 1990 को विक्टर वरस्टर जेल से रिहा किया गया। 1993 में रंगभेद व्यवस्था को समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मंडेला और राष्ट्रपति डि क्लार्क को संयुक्त रूप से नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। मंडेला ने 1994 में अपनी आत्मकथा- लोंग वाक टू फ्रीडम में 1980 और 1990 के दौरान हिंसा में डि क्लार्क के कथित रूप से शामिल होने और रक्तपात में अपनी पूर्व पत्नी विन्नी मंडेला के बारे में कुछ स्पष्ट नहीं किया। उन्होंने हालांकि बाद में मंडेला: द ऑथोराइज्ड बायोग्राफी में इन मुद्दों पर चर्चा की। जेल यात्रा के दौरान जब उन्हें फरवरी 1985 में श्वेत शासकों ने बातचीत के लिए आमंत्रित किया तो उन्होंने कहा कि केवल स्वतंत्र व्यक्ति ही बातचीत कर सकता है और कैदियों को समझौते या अनुबंध करने का कोई हक नहीं है। आपकी स्वतंत्रता और मेरी स्वतंत्रता को जुदा नहीं किया जा सकता।
जेल यात्रा के बाद का जीवन-मंडेला ने जेल से रिहा होने के बाद अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस का नेतृत्व फिर संभाला और 1990 और 1994 के बीच बहुदलीय वार्ता में अपनी पार्टी का नेतृत्व किया जिसके फलस्वरूप देश में पहले बहुजातीय चुनाव कराए गए। देश के पहले अश्वेत राष्ट्रपति के रूप में 1994 से 1999 के बीच उन्होंने अल्पसंख्यक रंगभेद नीति वाली सरकार से सत्ता के हस्तांतरण को सुचारू बनाया। इस दौरान दक्षिण अफ्रीका के उनके पूर्व श्वेत विरोधियों तथा अन्य ने मंडेला के नेतृत्व की प्रशंसा की। 1999 में राष्ट्रपति के पद से निवृत्त होने के बाद मंडेला ने कई सामाजिक और मानवाधिकार संगठनों के मुद्दों की जोरदार वकालत की। वह महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी प्रखर राय देते हुए सम्मानित वरिष्ठ नेता और विचारविद् बन गए। एड्स के विरूद्ध संघर्ष मंडेला की प्राथमिक चिंताओं में शामिल था और उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर एड्स के प्रति जागरूकता बढ़ाने का बीड़ा उठाया। उन्होंने एड्स पर काबू पाने के 46664 धन संग्रह अभियानों का समर्थन किया। ये संख्या उनके जेल में रहने के दिनों की संख्या के बराबर मानी गई। उन्होंने कहा कि एड्स के बारे में खुले तौर पर चर्चा की जानी चाहिए। उन्होंने 2007 में एक गैर-सरकारी संगठन द ऐल्डर्स के अंतर्गत विश्व के प्रमुख नेताओं, शांति समर्थकों और मानवाधिकार की आवाज़ उठाने वाली हस्तियों जैसे कि कॉफी अन्नान, जिमी कार्टर, इला भटृ, ग्रो हरलेम ब्रंडटलैंड और ली झाओझिंग के साथ मिलकर आवाज उठाई। इस संगठन का मकसद वरिष्ठ हस्तियों की सामूहिक बुद्धिमत्ता के इस्तेमाल से विश्व की कुछ समस्याओं का समाधान निकालना था। हालांकि उन्होंने पड़ोसी देश जिम्बावे को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर बहुत कम राय जाहिर की। जोहान्सबर्ग में 2010 के फीफा वर्ल्ड कप के समापन समारोह में वह अंतिम बार सार्वजनिक रूप से दिखाई दिए। उन्होंने गरीबों और जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए नेल्सन मंडेला फाउंडेशन की शुरूआत की।
पुरस्कार और सम्मान-
विश्व में स्वतंत्रता में मंडेला के योगदान के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने उन्हें अभूतपूर्व सम्मान दिया। महासभा ने नवम्बर 2009 में घोषणा की कि 18 जुलाई मंडेला के जन्म दिवस को मंडेला दिवस के रूप में मनाया जाएगा। मंडेला के 94वें जन्म दिवस पर 18 जुलाई 2012 को दक्षिण अफ्रीका के एक करोड़ बीस लाख स्कूली बच्चों ने विशेष रूप से तैयार किए गए गीत के जरिए उनको सम्मानित किया। मंडेला की मानवाधिकार और स्वतंत्रता के लिए उनके बलिदानों के कारण अंतर्राष्ट्रीय सराहना की गई। उन्हें 1980 में भारत द्वारा नेहरू शांति पुरस्कार दिया गया। उन्हें 1990 में भारत में सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया। नेल्सन मंडेला जातीय भेदभाव के खिलाफ मानवीय संघर्ष के प्रतीक बन गए। पूर्वी जर्मनी ने उन्हें स्टार आफ इंटरनेशनल फ्रेंडशिप और वेनेजुएला ने साइमन बोलिवर पुरस्कार से नवाजा। उन्हें सखारोव पुरस्कार और मानवाधिकार पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।
नेल्सन मंडेला विरोधकर्ता, कैदी और शांति स्थापित करने वाले थे। उनका निधन 5 दिसम्बर 2013 को हुआ और यह दिन समूची धरती पर सभी मानवों के लिए स्वतंत्र रूप से जीने का जश्न बन गया। वह राष्ट्रपिता, अंतर्राष्ट्रीय आदर्श और महान व्यक्तित्व बन गए। उन्होंने ये साबित किया कि नेतृत्व करने वाले भले ही चले जायें लेकिन उनकी बुद्धिमत्ता कायम रहती है। उनकी करूणा, विनम्रता, देखभाल करने की भावना, सहनशीलता से सुनने और कहने के गुण मानवीय इतिहास पर अमिट छाप छोड़ गए हैं।
नेल्सन मंडेला ने महात्मा गांधी की प्रशंसा की। महात्मा गांधी ने 1890 में दक्षिण अफ्रीका में समानता और स्वतंत्रता के अहिंसक संघर्ष की शुरूआत की थी। मंडेला 1999 में जब देश के पहले अश्वेत राष्ट्रपति के पद से निवृत हुए तब उनका कोई प्रतिद्वंदी नहीं था और उन्हें विश्व में धर्मनिरेपेक्ष संत, मानवीय महानता के प्रतिरूप और शांति तथा बुद्धिमत्ता के आदर्श के रूप में सर्वाधिक सम्मानित व्यक्ति माना गया। वह अफ्रीका के इतिहास में ऐसे दुलर्भ व्यक्त्तित्व बन गए जिन्होंने एक कार्यकाल के बाद दूसरी बार राष्ट्रपति चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया। अमरीका के जॉर्ज वाशिंगटन की तरह उन्होंने यह समझा कि वह हरेक कदम जो आगे बढ़ायेंगे वह अन्य लोगों के लिए अनुसरण का आधार बना जायेगा। मंडेला आजीवन राष्ट्रपति बने रह सकते थे लेकिन वह जानते थे कि लोकतंत्र में ऐसा उचित नहीं है। राष्ट्रपति के रूप में उनके निवृत्त होने के बाद उनके जीवन में दो बार राष्ट्रपति का चुनाव हुआ लेकिन उनके बाद राष्ट्रपति बनने वाले उनके बराबरी नहीं कर सके और यही लोकतंत्र है। मंडेला हर लिहाज से महान थे। मंडेला की यह विरासत है कि उन्होंने मानवीय स्वतंत्रता का दायरा विसतृत किया। वह हर स्थिति में सहनशील थे फिर भी उनमें कुरीतियों के प्रति सहनशीलता थी। नेल्सन मंडेला ने न्याय में आजीवन विश्वास किया।






Related Items
सबकी चेहती अक्षरा जल्द देंगी GOOD NEWS