दाऊजी मंदिर में अनूठी परंपरा है समाज गायन की

बलदेव। श्री शेषावतार ब्रजराज ठाकुर दाऊदयाल के मंदिर में समाज गायन की अनूठी परंपरा है। मंदिर प्रंागण में बसंत पंचमी से ही 45 दिवसीय होली महोत्सव शुरू हो जाता है। बसंती गीत, धमार गायन, ढप ढोल, मृदंग, झंाझ, मजीरा के स्वर सुनाई  दे रहे हैैं। समाज गायन के स्वर बाल भोग तथा शयन आरती के समय गंूजते रहते है। बंसत पंचमी से ही रात्रि समाज गायकी में पेड़ा, लड्डू, मेवा बाटी आदि का वितरण डोल पंचमी तक चलता है। दाऊजी महाराज के श्रृंगार में बसंती वस्त्र, होलाष्टक डोल पंचमी तक धवल वस्त्र चंदन की जगह चेहरे पर गुलाल लगाया जाता है। शेषावतार ब्रजराज को जामा, चोला, पटुका, सिरपेच, मुकुट धरण कराया जाता है। मुकुट धारण कराके चाँदी का लकुट लट्टू धारण कराया जाता है। किरीर, बांक, चंद्रिका, मोर मुकुट सिर पर धारण कराने के साथ गालों पर गुलाल के साथ ही ब्रज राज शेषावतार के अलबेले स्वरूप के दर्शन कर श्रद्धालु, भक्त भी अलबेली सरकार की जय के स्वर के साथ श्रद्धा भक्ति के साथ झूम उठते हैं। ब्रज और फाग का अन्योन्याश्रित संबंध है। ‘‘ब्रज ते शोभा पफाग की, ब्रज की शोभा फाग’’ राजा नागरी दास ने तो यहां तक कहा है। होली के अभाव में बैकुण्ठ के वैभव को भी हेय समझा है। स्वर्ग बैकुण्ठ में होरी जो नाहिं तो कोरी कहां लै करैं ठकुराई’’ ब्रज के भक्त कवियों द्वारा रचे हुए होली के पद इतने प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, जो ब्रजभाषा गेय साहित्य के विशिष्ट अंग माने जाते हंै। ब्रज मंडल आज मची होरी खेलत श्री बलदेव लाडिलो, संग लिये रेवत जौरी अनूठे संगीत समाज गायकी की अपनी अलग ही विशेषता है। संगीत समाज गायकी की अपनी अलग ही विशेषता है। संगीत समाज गायकी में सायं के समय गर्भग्रह के ठीक सामने बाल गोपाल, युवा, वद्ध नित्य प्रति समाज गायकी में भाग लेकर गायन, वादन करते है। इस अवसर पर मंदिर के गर्भग्रह के सम्मुख जगमोहन में तिल रखने की जगह नहीं रहती है। जनता में चाहे होली का प्राचीन उत्सव विकृत होता जा रहा हो, ब्रज के प्रमुख देवालयों में अभी तक पुरानी परंपराओं का ही निर्वाह किया जा रहा है। ब्रज राज शेषावतार ठा. दाऊजी महाराज के उत्थापन के समय तीसरे पहर भांग भोग के दर्शन विशेष रूप से होते हैं। दूधिया, रबडी, गुलाब, संतरे, कभी खस की, हरियल भांग का रंग विचित्र होता है जिसने कभी भांग नहीं पी हो वह तो चुल्लू में उल्लू वाली कहावत को ही चरितार्थ करता है। भांग, घोंट छानकर तो संगीत समाज गायकी का आनंद तथा स्वर श्री उच्च होकर ब्रजवासी बरबस नृत्य तथा मटकने को मजबूर हो जाते हंै। ब्रज में श्री हलधर पीठ बलदेव पर बल्लभ संप्रदायी प्रभावित है। बल्देव जी व माता रेवती के विग्रह स्वरूपों के प्राकट् में श्री बल्लभाचार्य महाप्रभु जी के पौत्र गोकुल नाथ जी को श्रेय है। होली के दिन सांय होली पूजन का दृश्य मनोहारी होता है। शेषावतार बलराम के अत्यधु हल मूसल लेकर संगीत समाज के साथ गायन, वादन के स्वरों के बीच ऐरी सखी निकसे है दाऊदयाल, ब्रज के पूजन होरी होली के तीसरे दिन, धूल के दूसरे दिन, चैत्र कृष्णा द्वितीया को मध्य संगीत समाज की गायन कला अपने चिर यौवन पर रहती है। चैत्र कृष्णा द्वितीया को होली उत्सव का मुकुट मणि हुरंगा में आत्मा परमात्मा के एकीकरण का तत्व प्रकट होता है। सेवायत पंडा समाज के बाल, युवा, वृद्ध, नर नारी गोप गोपिका स्वरूप में हुरंगा खेलते है। देवताओं को लुभाने वाला बलदेव का हुरंगा है। संगीत समाज के स्वरों के साथ उड़त गुलाल लाल भये बादर का साक्षात दर्शन दाऊजी मंदिर प्रांगण में दर्शकों को देखने को मिलता है। ब्रज के राजा के सानिध्य में होने वाली अनूठी होली हुरंगा की संगीत समाज की गायकी भी अनूठी है। अनूठी होली हुरंगा विश्व परिदृश्य के लिए आकर्षण का केन्द्र है। इस बार यह एैतिहासिक हुरंगा 18 मार्च को आयोजित होगा।  

 


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