ज़िंदगी को करीब से समझना हो और चंद अल्फाज़ों में समेटना हो तो शायरी से बेहतर भला क्या हो सकता है। कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं जो शायरी कहने, पढ़ने या लिखने को फिज़ूल समझते हों लेकिन बहुत से ऐसे भी होते हैं, जिनकी ज़िंदगी इसके इर्द-गिर्द ही घूमती रहती है।





