
बाबा जयगुरूदेव के वार्षिक भण्डारें में प्रवचन सुनते भक्तगण एवं पाश्र्व में नाम योग साधना मन्दिर
मथुरा। जयगुरुदेव नाम योग साधना मन्दिर में चल रहे बाबा जयगुरुदेव जी महाराज के छः दिवसीय वार्षिक भण्डारा सत्संग मेला के पाँचवे दिन संस्था के अध्यक्ष पंकज बाबा ने श्रद्धालुओं को गुरु का वचन स्मरण कराते हुये कहा कि परमार्थ का अर्थ जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करना है। आज हमारे बीच गुरु महाराज देह रूप में मौजूद नहीं है। लेकिन शब्द रूप से समस्त प्रेमियों के घट-घट में विराजमान है। गुरु इस भूल भ्रम के देश से और अन्दर की अज्ञानता को निकालकर अपने सच्चे देश ले जाते हैं। महात्मा समझाते हैं कि जब से यह जीवात्मा, परमात्मा से अलग होकर इस माया के देश में आई, तब से जड़ चेतन का यह गाँठ खुलने के बाबजूद और मजबूत होती जा रही है। जब तक यह जीवात्मा काल प्रभु के देश से निकल नहीं जायेगी, तब तक सुख शान्ति नहीं मिल सकती है। इस धरा पर सन्त जीवों को समझाने के लिये आते हैं। यह देश, कौम, मजहब आपका नहीं है। आपका मजहब मालिक का इश्क, प्रेम है। जिस परमात्मा ने आपको यहाँ भेजा है वहीं हमको, आपको समझाने के लिये भेजा है। हममे और आपमें कोई भेद नहीं है। हम धन-दौलत के नशे में, बेटे-बेटियों, मान बड़ाई में सुख ढूँढते हैं और उसमें जितना उलझते जाते हैं, उतना ही दुःखी होते जा रहे हैं। यह संसार एक रंगशाला है अपने ख्याल को हम जितना ही संसार को अपना बनाने में लगायेंगे,उतना ही अधिक हमारा ख्याल अन्त समय में सांसारिक मोह की तरफ जाता है। इस तन में अपना काम कर ले और मन को समझाते रहे-‘मन रे अब क्यों गुमान करना, तन तो तेरा खाक मिलेगा।’ हमारे मन ने ही दुनियाँ के मोह को पैदा किया है। इस मन के अधीन होकर भाई-भाई, एक मुल्क दूसरे मुल्क का दुश्मन बन जाता है। हम जवानी के अहंकार में जिस देह से प्यार करते हैं, उसके राख को कोई घर में रखना पसन्द नहीं करता। इसलिये सच्चे गुरु की खोज कर अपना काम कर लेना चाहिये। भण्डारा के महा प्रसाद में मथुरावासियों ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया। श्रद्धालु अब अपने घरों को वापस लौटने लगे हैं।






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