बाबा जयगुरूदेव के वार्षिक मेले के अन्तिम दिन उमड़ भक्तों का सैलाब

बाबा जयगुरूदेव के वार्षिक भण्डारे में प्रवचन सुनते भक्त एवं उन्हें सम्बोधित करते पंकज बाबा

 

मथुरा। बाबा जयगुरुदेव जी के पावन वार्षिक भण्डारा सत्संग मेला के आखिरी दिन राष्ट्रीय उपदेशक डाॅ. करुणा कान्त एवं सतीश चन्द्र जी ने श्रद्धालुओं को सम्बोधित किया। सतीश जी ने बताया कि जब धरती, चाँद, सूरज, आकाश, ईश्वर, ब्रह्म, पारब्र्रह्म लोक कुछ नहीं था तो केवल एक अनामी महाप्रभु थे। अनामी इसलिये कहा जाता है कि उसकी कोई पैमाइश, नाप नहीं की जा सकती है, उसका कोई नाम नहीं है। महापुरुष जिस नाम को जगाते हैं इस मृत्युलोेक में, उसी नाम से सुरतों का कल्याण होता है। उस समय कुल मालिक अन्र्तमुख थे, उस समय कोई विस्तार नहीं था। जब उनकी मौज हुई तो बाहर अपनी शब्द, नाम की धार भेजी। शब्द की तरंगो से अपनी हैसियत अलख, अगम और सतलोक में स्थापित किया। इन तीनों में उस अनामी महापुरुष का रूप है, यहाँ कोई कष्ट, कलेश सुरतों को नहीं है। सतलोक से शब्द की तरंग, धार से, सुरतों को नीचे भेजा गया। सारी कायनात शब्दों से बनी है। डाॅ. करुणा कान्त जी ने कहा कि सन्तों ने अपने सत्संग में फरमाया है कि बुरे कर्म करने पर जीवात्मा को विभिन्न प्रकार के नर्को में कठोर यातना दी जाती है। जैसे भाड़ में रेत और चना गर्म करके, रेत डालकर भूना जाता है। उसी प्रकार जीवों को भूना जाता है। अग्नि में जलाया जाता है। भयंकर बदबूदार गन्दगी में डालकर सड़ाया जाता है, तेल में उबाला जाता है। इस प्रकार के सजा भोगते-भोगते युग बीत जायेगा, छुटकारा नहीं मिलेगा। वहाँ आप की चीख पुकार को कोई सुनने वाला नहीं है। यहाँ सब सुरतें लिंग शरीर में रखी जाती है। इसलिये वक्त के रहते कहीं भी महापुरुष की खोजकर अपना काम बना लेना चाहिये। मेले का विधिवत समापन की घोषणा करते हुये संस्था के अध्यक्ष श्री पंकज जी महाराज ने कार्यक्रम में अपना सद्भाव व सहयोग देने के लिये अधिकारियों कर्मचारियों, पत्रकारों, व्यापारियों, सेवादारों को धन्यवाद दिया एवं मथुरा नगरवासियों तथा क्षेत्रीय जनता का आभार प्रकट किया।


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