बेटी है तो कल हैः कस्तूरबा विद्यालय के अभिप्रेरण शिविर में छलका एक बालिका का दर्द

गोवर्धन। आखिर हमारे समाज और आस पास के इस पुरूष प्रधान माहौल मंे ऐसा क्या हैं जो लडकियां अपने आप को आरम्भ से ही बेहद कमजोर महसूस करती है। लड़कियों मंे लोगो को ऐसी कौन सी कमी नजर आती है जो उन्हें लड़को में नहीं दिखाई देती। वे लड़कों को क्यों इतना अग्रणी और लड़कियों को क्यों पिछड़ा हुआ समझते है। ये उदगार कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय में चल अभिप्रेरण शिविर में एक छात्रा ने स्वतः स्फूर्त भावना के साथ व्यक्त किये। 

इसी विद्यालय की कक्षा 8 की छात्रा करिश्मा कुन्तल का मानना है कि हमारे समाज के कुछ माँ बाप लड़कियों को पढना लिखना अच्छा नहीं समझते वहीं कुछ माँ बाप पढ़ाई में भेदभाव भी करते है। वे लड़के को तो अंग्रेजी माध्यम के बड़े स्कूल में दाखिला दिलाते है और लड़की को बगैर खर्चे वाले सरकारी स्कूल में दाखिला दिलाएंगे। वहीं उनके लिये कोई फर्क नहीं पड़ता कि लड़का चाहे किसी भी कक्षा में कितनी ही बार फेल हो जाये उसे दोबारा भर्ती करा ही दिया जाता है वहीं यदि लड़की किसी कक्षा में फेल हो गयी तो उसका स्कूल जाना ही बन्द करा देते है। छात्रा के अनुसार वे मां बाप कुछ ऐसा समझते है कि लड़के को तो उन्होंने स्वयं जन्म दिया है जबकि लड़की को वे किसी कूड़ेदान से उठाकर लाये है। लड़की की शादी भी करेंगे शादी तक एक भारी बोझ बतौर उसके साथ घर में बर्ताव किया जाता है वहीं शादी करने के बाद मां बाप एक ही बात दुहराते है कि बेटी हमने तेरी शादी में बहुत पैसा खर्च किया है। छात्रा ने पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि जो मां बाप अपने बेटे को तो अपनी पूरी सम्पति का मालिक बना देते है लेकिन उन्ही माँ बाप की नजरो में उस बेटी का उतना भी हक नहीं है जितना उसकी शादी की खर्च होता है। जितना वे मां बाप अपने बेटे का मानते है उतने जीने का अधिकार अपनी बेटी को क्यो नहीं देते है। ये भेदभाव का नजरिया लड़कियो के प्रति कब तक बनाए रखेंगे। लडकियां को चाहिये कि वे मजबूती के साथ आगे आकर इसका एक विशेष अभियान चला कर लोगो को जागरूक करे और उन्हें बतायें कि बेटी है तो कल है नही ंतो कुछ भी नहीं है।


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