मथुरा। नवरात्र में देवी माँ की जगह जगह पूजा होती है। कोई फल फूल से पूजन करता है तो कोई मिठाई का भोग लगता है, लेकिन मथुरा में एक जगह ऐसी है जहाँ देवी का पूजन लाठियों से किया जाता है। मथुरा के नरी सेंमरी गाँव में नवरात्र मेले के आखिरी दिन देवी की यह विशेष लाठी पूजा होती है और इस विशेष पूजा को देखने के लिए दूर दूर से भक्तगण यहाँ पहुंचाते है। घोडे पर सवार होकर हाथ में लाठी डंडे लेकर दौड़ते ये लोग किसी से लड़ने नहीं जाते बल्कि ये देवी माँ का पूजन करने जाते है।
दरअसल मथुरा के नरी सेंमरी गाँव में केला देवी का बेहद प्राचीन मंदिर है, इस मंदिर की विशेष धार्मिक मान्यता है। इसीलिए हर साल यहाँ नवरात्र के मौके पर बहुत बड़े मेले का आयोजन होता है। इस मेले के आखिरी दिन यानि नवमी को यहाँ देवी माँ की लाठियों से पूजा की जाती है। सैकडो साल से मंदिर में यही परंपरा चली आ रही है। लाठियों से ये पूजन भक्तो की देवी माँ से लडाई नहीं है बल्कि देवी माँ के पूजन के लिए भक्तो की आपसी लडाई है। आज से लगभग साढे सात सौ साल पहले जब यहाँ रहने वाले ठाकुर समुदाय के दो पक्ष सूर्यवंशी और चंद्रवंशी देवी माँ के पूजन को लेकर बहस करने लगे तो देवी माँ ने दोनों पक्षों से कहा था कि जो पक्ष लाठियों से जीत जायेगा, वही मेरी पहले पूजा करेगा। लेकिन जब लड़ते लड़ते पूजन का वक्त निकल गया तब देवी माँ ने दोनों पक्षों से हर साल इसी तरह अपना पूजन करने की बात कही और तब से लेकर आज तक यही परंपरा चली आ रही है। आज भी ठाकुर समुदाय के दोनों पक्ष घोडे पर सवार होकर हाथ में लाठियाँ लिए मंदिर जाते है और देवी माँ की चैखट पर लाठियाँ मरते है। इस विशेष पूजा को देखने के लिए दूर दूर से भक्तगण यहाँ आते है। इस मंदिर की परंपरा के अनुसार नवरात्र मेले के समापन के मौके पर आखिरी दिन होने वाली नवमी की इस लट्ठ पूजा का विशेष महत्त्व होता है, और इसीलिए इस विशेष पूजा में शामिल होने के लिये ठाकुर समुदाय के दोनों पक्षों को साल भर इस दिन का बड़ी बेसब्र से इंतजार रहता है।





