शिल्पियों की भूमि है रघुराजपुर

सुचित्रा साहू

रघुराजपुर, कला प्रेमियों का स्‍वप्‍न स्‍थान पूरा गांव जैसे कला और दस्‍तकारी का खुला संग्रहालय हो। इस गांव में 100 से अधिक परिवार रहते हैं और उनमें ज्‍यादातर परिवार किसी न किसी प्रकार की दस्‍तकारी से जुड़े हैं। यहां के शिल्‍पी कपड़े, कागज और ताड़ के पत्‍तों पर अपने कुशल हाथों से जादू कर देते हैं।

 

यह छोटा सा गांव ओडिशा के पुरी जिले में स्थित है। इस गांव के चारों तरफ ताड़, आम, नारियल और गर्म जलवायु के अन्‍य पेड़ों के साथ-साथ पान के पत्‍तों का बाग भी है। लेकिन, रघुराजपुर की अपनी पहचान है और वह ओडिशा की कला और शिल्‍प की समृद्ध परंपरा का प्रतिनिधित्‍व करता है।

 

रघुराजपुर पट्टचित्र के लिए प्रसिद्ध है। उडिया भाषा में ''पट्ट'' का मतलब कैनवास और ''चित्र'' का मतलब तस्‍वीर है। इसे हाथ से बनी ''पट्टी'' पर बनाया जाता है, जो कपड़ों की कई परतों को एक-दूसरे से चिपकाकर तैयार की जाती है। चित्रकारी के लिए कलाकार हाथ से बनाए हुए प्राकृतिक रंगों का इस्‍तेमाल करते हैं। ओडिशा में पट्टचित्र की बड़ी पुरानी परंपरा है। पट्टचित्र का विषय बहुधा पौराणिक और धार्मिक कहानियां होती हैं।

 

कलाकार इन कहानियों को इस प्रकार तस्‍वीर में उतारता है कि उसे देखकर पूरी कहानी समझी जा सकती है। पट्टचित्रों में मूलरूप से भगवान श्री जगन्‍नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के चित्र होते हैं। रघुराजपुर का हर घर एक नई कहानी कहता है। घरों की दीवारों पर चित्र बने होते हैं। अन्‍य शिल्‍पों में प्रस्‍तर कला, कागज से बने खिलौने, टसरचित्र, काष्‍ठ कला, ताड़ के पत्‍तों पर चित्रकारी भी शामिल हैं। इन्‍हें कलाकार तैयार करते हैं और यही गांव वालों की आजीविका का मुख्‍य साधन है। रघुराज पुर का हर परिवार किसी न किसी प्रकार की दस्‍तकारी से जुड़ा है। यहां तक कि सात-आठ साल की छोटी आयु के बच्‍चे भी पट्टचित्रकारी करते हैं। शिल्‍पी अपना उत्‍पाद विभिन्‍न गैर सरकारी संगठनों के जरिए बाजार में बेचते हैं। कई गैर सरकारी संगठन दस्‍तकारी उत्‍पादों के प्रोत्‍साहन, प्रशिक्षण और विपरण के काम में गांव की सहायता करते हैं। इस गांव के कलाकार ओडिशा और दूसरे राज्‍यों में आयोजित विभिन्‍न मेलों और प्रदर्शनियों में हिस्‍सा लेते हैं।

 

रघुराजपुर गोतीपुआ नामक नृत्‍य के लिए भी जाना जाता है, जो ओडिशी नृत्‍य का आरंभिक स्‍वरूप है। प्रसिद्ध ओडिशी नृत्‍य के गुरु स्‍वर्गीय पदमविभूषण गुरु केलुचरण महापात्रा इसी गांव में पैदा हुए थे। गोतीपुआ नृत्‍य में किशोर आयु के लड़के, लड़कियों के लिबास में नृत्‍य करते हैं। इस गांव के नृत्‍य कलाकार अब राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय मंचों पर अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं।

 

रघुराजपुर में सालभर विदेशी मेहमानों सहित लोगों का आना लगा रहता है। पर्यटक अमेरिका, इंग्‍लैंड, चीन, नेपाल, जापान, इटली जैसे देशों से आते हैं। भारत के पर्यटकों का भी गांव में आगमन होता रहता है। यहां आकर पर्यटकों को ओडिशा की समृद्ध कला और दस्‍तकारी का परिचय मिलता है। अपनी कला के बल पर ये कलाकार आत्‍मनिर्भर हैं और उन्‍हें रोजगार की तलाश में अपने घर को छोड़ने की जरूरत नहीं होती। यह गांव एक आदर्श पर्यटन स्‍थल के रूप में उभरा है। भारत में शायद ही कहीं किसी और गांव में कला के इतने रूप एकसाथ देखने को मिलते हों।

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