अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बौखलाहट अब साफ झलक रही है। यूरोपीय संघ पर उनकी कैप्स-लॉक वाली, बचकानी और अपमानजनक टिप्पणियां कोई साधारण बयान नहीं हैं। ये भारत-यूरोपीय संघ के ऐतिहासिक “मदर ऑफ ऑल डील्स” पर झुंझलाहट का नतीजा हैं।
लेकिन, असल में ये उससे कहीं गहरी हैं, एक व्यक्ति और उसके पीछे के पूरे राजनीतिक आंदोलन का एक खौफनाक आत्मचित्र, जो पश्चिमी सभ्यता की उन बुनियादों को ही तोड़ रहा है, जिन पर अमेरिका खड़ा है।
यह नीति नहीं, एक दबंग की आदिम दहाड़ है। आवाज़ को विज़न समझ बैठना, और बेइज्जती को ताकत। यूरोप को “कंगाल”, “बच्चा” या “नकारा” कहना महाद्वीप का अपमान ही नहीं, यह उस इतिहास पर थूकना है, जिससे अमेरिका की पहचान बनी है। ज्यादातर अमेरिकी उसी यूरोप की संतान हैं। वही यूरोप, जिसने पुनर्जागरण की रौशनी दी, वैज्ञानिक सोच को मजबूती, साहित्य-कला को नई ऊंचाइयां, और लोकतंत्र को दर्दनाक मगर एक परिपक्व रास्ता दिया। अमेरिका का संविधान, संस्थाएं, विचार, सब पर यूरोप की गहरी छाप है। ऐसे में यूरोप का मजाक उड़ाना आत्म-अपमान से कम नहीं है।
हकीकत यह है कि यूरोप कोई खेल का मैदान नहीं, जहां “डैडी टैक्स” जैसे जुमलों से तालियां बटोरी जाएं। यूरोपीय संघ का €15 ट्रिलियन का अकेला बाजार दुनिया का सबसे परिष्कृत, नियम-आधारित आर्थिक ढांचा है। अमेरिका का सबसे बड़ा यह ट्रेड पार्टनर हर साल 600 अरब डॉलर से ज्यादा अमेरिकी सामान-सेवाएं खरीदता है। लाखों अमेरिकी नौकरियां इसी पर टिकी हैं। ऐसे साझेदार का उपहास आर्थिक आत्महत्या है और अमेरिका के अपने आंकड़े यह चीख-चीखकर बता रहे हैं।
अमेरिका आज व्यापार घाटे से जूझ रहा है। बाजार अस्थिर है। महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही है। ट्रंप के टैरिफ, जिन्हें वह ताकत का प्रतीक बताते हैं, असल में अमेरिकी उपभोक्ताओं पर छुपा टैक्स हैं। यह सच्चाई लच्छेदार भाषणों से नहीं बदलती है।
इस तमाशे में सबसे डरावनी है, खामोशी। अमेरिका की तथाकथित लिबरल अंतरात्मा कहां सोई हुई है? विश्वविद्यालय, थिंक-टैंक, संपादकीय बोर्ड, मानवाधिकार संगठन, सब क्यों चुप हैं? जो दुनियाभर में लोकतंत्र की खामियां तलाशते हैं, वे अपने घर की सांस्कृतिक-कूटनीतिक आगजनी पर क्यों मौन हैं? यह चुप्पी कायरता नहीं बल्कि मानसिक जड़ता का संकेत है। ऊपर आइवरी टावरों में बहस, नीचे नींव जल रही है, और फायर ब्रिगेड वाले सो रहे हैं!
ट्रंप की ‘रणनीति’ कूटनीति के सर्व मान्य सिद्धांतों को चुनौती दे रही है। न भाषा का सहूर, न ही तथ्यों का सम्मान, ‘जसपाल भट्टी का उल्टा-पुल्टा शो’ चल रहा है। उपनाम गढ़ना, कैप्स-लॉक ट्वीट, स्कूली गालियां, यह राज्यकला नहीं है। 70 साल के वैश्विक गठबंधन मयखानों की तकरार और बार-फाइट में बदल रहे हैं। यह ताकत नहीं बल्कि असुरक्षा का द्योतक है। नियम-आधारित व्यवस्था, जिसने युद्ध रोका, समृद्धि फैलाई, गरिमा की बात की, क्या अहंकार, सौदेबाजी और धमकी से बदली जा सकती है?
असल खतरा इसी सोच में है। संस्थाओं का धीमा और मुस्कुराता क्षरण। यूरोप को संदेश साफ, तुम्हारा इतिहास बेकार, साझेदारी मुफ्त और परिपक्वता कमजोरी है। लेकिन, यह एक रणनीतिक भूल है। गठबंधन स्थायी नहीं होते हैं। बाजारों की याददाश्त लंबी होती है। सब्र, सदियों पुरानी सभ्यताओं का भी, सीमा पर है। सवाल तैर रहा है कि कब तक यूरोप ऐसे ‘सहयोगी’ की बेरुखी या दुश्मनी सहता रहेगा?
भारत-ईयू डील कोई तंज नहीं बल्कि भविष्य का खाका है। दुनिया की दूसरी लोकतांत्रिक ताकतें इसमें जुड़ेंगी और नवाचार करेंगी। अमेरिका जोकर बने तो उसकी मर्जी। यूरोप निर्भरता बदल रहा है। ट्रंप की बौखलाहट अमेरिकी पतन का मील का पत्थर साबित होगा। देश उस ताकत के हाथों हाइजैक हो रहा है, जो विरासत से नफरत करती है और आपसी निर्भरता को समझने में अक्षम है। हर बचकानी गाली के साथ यह अमेरिका को “महान” नहीं, बल्कि ‘अप्रासंगिक’ बना रहा है।
दुनिया आगे बढ़ रही है। एक तरफ, दुनियाभर में लोग जहां गंभीरता के साथ भविष्य के सौदे कर रहे हैं। वहीं, अमेरिका जहरीली छाया में चिल्लाता हुआ, खुद को शर्मिंदा करता, सबको खतरे में डालता, पीछे छूट रहा है।






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