संगीत के शिखर पर रहे हैं बिस्मिल्ला खान

सविता पांडे

बिस्मिल्लाह!! दादा रसूल बख्श खान के होंठों से नवजात को देखकर यही शब्द निकला था। ण्ण्ण्और उस नन्हे बच्चे का नाम बिस्मिल्ला खान हो गया। बड़ा होने पर बिस्मिल्ला खान ने पिता.दादा.परदादाओं की शहनाई.वादन की कला.परंपरा को आगे बढ़ाया और समूचे देश की आवाज बन गए। 

एक असाधारण आवाज देशराग। उनकी शहनाई के स्वर हमारे देश की सांस्कृतिक विरासतए प्रसिद्धि और जनमानस के अंतरंग में बसी हूक बन गए। सदियों पुरानी शहनाई में समाई आवाज उनके प्रयासों से शास्त्रीय हो गई। बिस्मिल्लाह और शहनाई एक.दूसरे के पर्याय बन गए। बिस्मिल्लाह खान के पुरातन वाद्य की स्वरलहरियां देशों.विदेशों में गूंजती और प्यार तथा शांति के राग छेड़ती जातीं। एक सहज.सरल भावुक एवं पारिवारिक इन्सान जो संगीत को आजीवन जीता रहाण्ण्ण् एक अनमोल रतनण्ण्ण् भारत रत्नण्ण्ण् बिस्मिल्लाह खानण्ण्ण्

अखिल भारतीय संगीत समारोहए कलकत्ता 1937 में बिस्मिल्ला शहनाई के छिद्रों में अपनी कला और राग समेटे हुए आए और इस तरह शहनाई भारतीय संगीत का एक केंद्रीय स्वर बन गई।

धर्म और जाति जैसे मनोभावों और बंधने से ऊपर उठकर बिस्मिल्लाह खान सरस्वतीए विद्या और कला के सच्चे उपासक बन गए। पांचों वक्त नमाज अता करते। वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर समेत अन्य धर्मस्थलों पर भी शहनाई बजाते बिस्मिल्लाह सर्व.धर्म समभाव की मिसाल थे। उनका प्रिय और अपना शहर बनारसए मां गंगा के तट और जल तरंगें भी अपनी सुध.बुध खो नाच उठतीं।

भीरुंग रावत की गलीए डुमरांवए बिहार में 21 मार्चए 1916 को पैगम्बर खान और मिठ्ठन की संतान बिस्मिल्ला का जन्म हुआ। बड़े भाई शमसुद्दीन के साथ मिलता.जुलता नाम कमरूद्दीन इनके लिए रखा गया।

भोजपुरए बिहार के रजवाड़ों और नक्कार खानों में पुराने समय से ही इनके पुरखे शहनाई.वादन का सम्मान हासिल करते आए थे। पिता पैगम्बर खान स्वयं डुमरांव रियासत के महाराजा केशव प्रसाद सिंह की सभा में शहनाई बजाया करते थे।

छह वर्ष की उम्र में ही बिस्मिल्ला गंगा नदी के तट पर बसे अपने ननिहाल वाराणसी चले गए। वहां विश्वनाथ मंदिर में शहनाई.वादन से जुड़े अपने रिश्तेदार अली बख्श ष्विलायतुष् से शहनाई वादन की शिक्षा ग्रहण की। अली बख्श के संरक्षण में बिस्मिल्लाह खान ने इस क्षेत्र में महारत हासिल की और बड़े होने पर एक प्रसिद्ध नाम ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय धरोहर और भारत रत्न हो गए। स्वतंत्रता.पूर्व भारत में बिस्मिल्लाह खान भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक अप्रतिम उदाहरण और हिंदू. मुस्लिम एकता का पर्याय बन गए।

बिस्मिल्लाह खान एक महान रुहानी कलाकार थे जिन्हें 1947 में भारत की स्वतंत्रता के मौके पर दिल्ली के लाल किले पर शहनाई बजाने का गौरव प्राप्त है। 26 जनवरीए 1950 को भारत के पहले गणतंत्र दिवस समारोह में भी उस्ताद का राग कैफी समारोह की जान बन इतिहास में शुमार हो गया। यह तब की बात है जब शहनाई वादकों को इमारतों या समारोह स्थलों के प्रवेश द्वार पर बैठा दिया जाता था। इस परंपरा से आगे बढक़र बिस्मिल्लाह खान ने शहनाई को केंद्रीयता का सम्मान दिलाया। पंडित नेहरू के समय से ही यह परंपरा बन गई कि स्वतंत्रता दिवस पर झंडारोहण और प्रधानमंत्री के भाषण के बाद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई के राग छिड़ जाते। दूरदर्शन द्वारा इसका सीधा प्रसारण भी किया जाता।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने भारतीय सिनेमा में भी शहनाई वादन किया और इस तरह चलचित्रों में समाकर घर.घर में अपनी दस्तक दी। कन्नड़ फिल्म ष्सनादी अपन्नाष् में अपन्ना की भूमिका के लिए शहनाई बजाई। महान फिल्मकार सत्यजीत रे की ष्जलसाघरष् में अभिनय किया तो ष्गूंज उठी शहनाईष् ;1959द्ध के लिए आवाज दी। जाने.माने निर्देशक गौतम घोष ने इनकी जीवनी पर एक डॉक्यूमेंट्री ष्संगे मिल से मुलाकातष् बनाई। शहनाई के साथ फिल्मों में उनका आखिरी परफॉरमेंस फिल्म ष्स्वदेशष् ;2004द्ध के गाने ष्ष्ये जो देश है तेराण्ण्ण्ष्ष् के लिए रहा। वह अपने शिष्यों को तालीम के समय यह गुरुमंत्र जरूर देते थे कि सुरों से इस तरह लगाव रखो कि दुनिया पर छा जाओ। उस्ताद बिस्मिल्ला खान ने बचपन से ही शहनाई प्रेम को इबादत बना लिया और उन्हें संगीत साधना के लिए देवी सरस्वती के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने और मंदिरों और गंगा के घाट पर शहनाई बजाने में कभी परहेज नहीं रहा।

दक्षता से आलाप लेने के लिए सांस साधते उस्ताद बिस्मिल्लाह खान काफी उदार प्रवृत्ति के थे। एक साधारण.सरल इंसान जो भावुक और रचनात्मक भी था और जिसने रागों के साथ प्रयोग कर संगीत की गाथा में नए अध्याय जोड़े। सम्मेलनों में पसरी शांति को तोड़ती शहनाई की मधुर.मद्धिम और प्रवाहमयी स्वरलहरियां श्रोताओं के दिलो.दिमाग में बस जातीं। सुप्त मानसिक तरंगों के कोई तार झंकृत कर जातीं।

शास्त्रीय कलाकारों और संगीत पारखियों की नजरों में शुमार बिस्मिल्लाह खान ने अपनी जिंदगी में मात्र तीन शागिर्द बनाए. बलजीत सिंह नामधारीए किरपाल सिंह और गुरबख्श सिंह नामधारी।

सर्वविद्या की राजधानी वाराणसी की सांस्कृतिक परंपरा और गंगा.यमुनी तहजीब के प्रतिनिधि रहे विश्व प्रसिद्ध शहनाई.वादक ने अस्सी वर्ष से भी अधिक समय तक कला.साधना की और भारत रत्न ;2001द्धए पद्म विभूषण ;1980द्धए पद्म भूषण ;1968द्धए पद्म श्री ;1961द्धए संगीत नाटक अकादमी अवार्ड ;1956द्ध समेत कई पुरस्कार और सम्मान बटोरे।

21 अगस्त 2006 को हेरिटेज हॉस्पीटलए वाराणसी में बीमारी से जूझता यह महान कलाकार इस असार.संसार से विदा हो गया। इनके जाने से भारतीय शास्त्रीय संगीत को झटका तो लगा ही शहनाई.वादन की आधारशिला ही हिलकर ढह गई। आजीवन शहनाई का रियाज करते बिस्मिल्लाह खान वाराणसी के फातिमा कब्रगाह में अपनी शहनाईए जिसे वह ष्बेगमष् कहा करते थे के साथ नीम की ठंडी छांव में सदा के लिए सो गए। कहते हैं कि ध्वनियां कभी नष्ट नहीं होतीं। आज बिस्मिल्लाह खान अपनी खामोश शहनाई के साथ भले ही चिरनिद्रा में सो रहे हों उनकी स्वर.तरंगें आज भी बज रही हैं। म्यूजिकए थियेटर और डांस के क्षेत्र में संगीत नाटक अकादमीए नई दिल्ली का ष्उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कारष् के रूप मेंए उस्ताद की शहनाई के संगीत की आवाज कलाकारों के बीच थोड़ी.थोड़ी फैल रही है. अनूगूंज बनकर। 

उस्ताद कहा करते थे कि यदि दुनिया का अंत हो भी गया तो भी संगीत जिंदा रहेगा।

 

 


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