साल 1870 के दशक के मध्य में तकरीबन 30 वर्ष की आयु के आसपास एक सुगठित डील-डौल वाले गौर वर्ण के व्यक्ति को पुणे की गलियों में एक थाली और चम्मच हाथों में लेकर दौड़ते हुए देखा जा सकता था। चम्मच से थाली को बजाते हुए वह अपने अगले भाषण के बारे में घोषणा करता रहता था। वह अनुरोध करता था, "सभी को शाम को शनिवार-वाड़ा मैदान में आना है। हमारे देश को आज़ाद होना ही चाहिए। अंग्रेज़ों को भगाया जाना चाहिए। मैं अपने भाषण में बताऊंगा कि यह कैसे किया जाना है।"

Related Items
जब स्वच्छता बन गई एक बड़ा जन-आंदोलन...
एक अद्भुत तराना, जो बन गया जन आंदोलन...
सिर्फ इमारतें ही नहीं, साहित्य और स्वतंत्रता संग्राम का भी गढ़ रहा है आगरा