
'केप कैमोरिन में मां कुमारी के मंदिर में इंडियन रॉक के ठीक अंतिम छोर पर जब मैं तल्लीनता के साथ बैठा हुआ था तो मेरे मन में एक विचार आया। हम इतने सारे संन्यासी भटक रहे हैं और लोगों को मेटाफिजिक्स का पाठ पढ़ा रहे हैं- यह सब बावलापन है। क्या हमारे 'गुरुदेव' यह नहीं कहा करते थे 'खाली पेट भजन नहीं होता'? हम एक राष्ट्र के तौर पर अपनी विशेषता खो चुके हैं और यही भारत में कायम सभी तरह की बुराइयों का मुख्य कारण है। हमें आम आदमी की चेतना को जगाना है।''
स्वामी विवेकानन्द ने 'एकल भारत के अपने विज़न' के बारे में यही कहा है। कन्याकुमारी में इंडियन रॉक के ठीक अंतिम छोर (बाद में यह नरेन्द्र रॉक मेमोरियल के नाम से जाना गया) पर ध्यान लगाने के दौरान स्वामी विवेकानन्द के जेहन में यह विज़न कौंधा था। भारत की आम जनता की दुर्दशा से अत्यन्त मर्माहत होकर स्वामी विवेकानन्द ने उन्हें मातृभूमि की सेवा एवं आत्म बलिदान की भावना को आत्मसात करने के लिए प्रेरित किया था।
''मैं भारतीय हूं और हर भारतीय मेरा भाई है।'' ''अबोध भारतीय, गरीब एवं फक्कड़ भारतीय, ब्राह्मण भारतीय, अछूत भारतीय मेरा भाई है।'' ''भारतीय मेरा भाई है, भारतीय मेरा जीवन है, भारत के देवी-देवता मेरे भगवान हैं, भारत का समाज मेरी बाल्यावस्था का झूला है, मेरी युवावस्था को आनंदित करने वाली वाटिका है, पवित्र स्वर्ग है, मेरी वृद्धावस्था का वाराणसी है।'' ''भारत की धरती मेरा परम स्वर्ग है, भारत की अच्छाइयां मेरी अच्छाइयां हैं।'' ये सभी महान देशभक्त संत स्वामी विवेकानन्द के उद्गार थे जो भारतीयों में एक राष्ट्र के तौर पर अपनी पहचान को जगाने में मददगार रहे हैं।
वैसे तो राष्ट्रवाद के अभ्युदय को पश्चिमी प्रभाव की देन माना जाता है लेकिन स्वामी विवेकानन्द का राष्ट्रवाद भारतीय आध्यात्मिकता एवं नैतिकता से पूरी तरह ओत-प्रोत है। औपनिवेशिक भारत में जबरदस्त ढंग से उभरे राष्ट्रवाद की अवधारणा में उनका अहम योगदान रहा था और उन्होंने 20वीं शताब्दी में भारत की कामयाब छलांग सुनिश्चित करने में विशेष भूमिका निभाई थी। 20वीं शताब्दी के युवाओं पर उनका जबरदस्त प्रभाव रहा है।
भुवनेश्वरी देवी और विश्वनाथ दत्त के यहां 12 जनवरी, 1863 को जन्मे नरेन्द्र नाथ दत्त ही आगे चलकर स्वामी विवेकानन्द कहलाए। वह एक संन्यासी थे और 'रामकृष्ण परमहंस' के मुख्य अनुयायी थे। उन्होंने पश्चिमी दुनिया को 'वेदांत' एवं 'योग' जैसे अनमोल भारतीय दर्शन शास्त्र से परिचय कराया। विभिन्न आस्थाओं के आपसी जुड़ाव के बारे में जागरूकता पैदा करने और 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हिन्दूवाद को वैश्विक मंच पर बड़ी दृढ़ता के साथ पेश करने का श्रेय स्वामी विवेकानन्द को ही जाता है।
डॉ. राधाकृष्णन का यह साफ मानना रहा है, ''राष्ट्रवाद एक सियासी धर्म है जो पुरुषों के दिलों एवं अंतर्निहित अपेक्षाओं को झकझोर कर रख देता है और इसके साथ ही उन्हें सेवा करने एवं आत्म बलिदान के लिए प्रेरित करता है, जबकि इस तरह का कमाल दिखाने में तमाम हालिया विशुद्ध धार्मिक आंदोलन विफल रहे हैं।'' इस तरह के अवलोकन से बहुत पहले स्वामी विवेकानन्द ने भारतीयों के दिलो-दिमाग को कुछ इसी तरह से पूरी ताकत, जोशो-खरोश एवं निर्भयता के साथ झकझोर कर रख दिया था, जिससे वह राष्ट्र सेवा एवं आत्म बलिदान के लिए पूरी तरह से तैयार हो गए थे।
स्वामी विवेकानन्द का राष्ट्रवाद आध्यात्मिकता से जुड़ा हुआ है। वह भारत के अभ्युदय को आध्यात्मिक लक्ष्य से जोड़ने में सफल रहे थे, जो इस देश की प्राचीन परंपरा रही है। उनका कहना था, ''हर राष्ट्र को अपने सपनों को साकार करना है, हर देश को अपना एक संदेश भेजना है, हर राष्ट्र को सफलतापूर्वक अपना मिशन पूरा करना है। अतः हमें निश्चित रूप से यह समझना पड़ेगा कि हमारी अपनी संतति का मिशन क्या है, उसे किन-किन सपनों को साकार करना है, उसे राष्ट्रों की दौड़ में कौन सा स्थान हासिल करना है और उसे विभिन्न संततियों में सामंजस्य बैठाने में क्या भूमिका निभानी है।''
उनकी राष्ट्रीयता का स्वरूप भौतिकवादी नहीं, बल्कि पूर्णतया आध्यात्मिक है, जिसे भारतीय जीवन में सभी शक्तियों का स्रोत समझा जाता है। पश्चिमी राष्ट्रवाद के विपरीत, जो प्रकृति में धर्मनिरपेक्ष है, स्वामी विवेकानंद का राष्ट्रवाद धर्म पर आधारित है, जोकि भारतीयों की जीवन शक्ति है। आम लोगों के लिए गहरी चिंता, स्वअभिव्यक्ति के लिए समानता और स्वतंत्रता, सार्वभौमिक भाईचारे के आधार पर विश्व का आध्यात्मिक एकीकरण और कर्मयोग, जोकि आध्यात्मिक एवं राजनीतिक, दोनों तरह की स्वतंत्रता पाने की आचार नीतियों की एक प्रणाली है, उनके राष्ट्रवाद का आधार थी।
उनकी लेखनी और भाषणों में जादुई प्रभाव होते थे। उनके शब्द न केवल भारतीयों के दिमाग को उद्वेलित करते थे, बल्कि मातृभूमि के लिए प्रेम भी जगाते थे। उन्होंने अपने देशवासियों के दिलो-दिमाग में पूजा करने के लिए एकमात्र देवी के रूप में भारत माता की स्थापना की। उन्होंने मुनाफा कमाने की ब्रिटेन की नीतियों का पर्दाफाश करने को प्रेरित किया ये भारतीय हितों के पूरी तरह और राष्ट्रीयता की भावना को प्रज्जवलित किया। भारतीय परिप्रेक्ष्य में यूरोप की औपनिवेशिक नीतियों की व्याख्या करके उन्होंने ब्रितानी शासकों को निरुत्साहित किया। जैसाकि उन्होंने कहा कि 'नए भारत को हल जोतकर थककर चूर हो जाने वाले किसानों की झोपड़ियों से, मछुआरों, मोचियों और सफाईकर्मियों के दिलों से उभरने दो। उसे टिकिया बेचने वालों की तंदूरों से, किराने की दुकानों से प्रस्फुटित होने दो। उसे फैक्टरियों से, हाट-बाजारों से निकलने दो। उसे जंगलों, झुरमुटों से, पहाड़ियों और पर्वतों से फूटने दो'।
स्वामी विवेकानंद के भाषणों एवं लेखों ने भारतीयों के दिलो-दिमाग में साहस और दृढ़ता की भावना का संचार किया, जिससे कि वे हर तरह के विरोध की स्थिति में अवसरों की तलाश कर सकें। अरविन्दो घोष ने इसके बाद की पीढ़ी में इसी भावना का पोषण किया। सर्वोच्च बलिदान के लिए तैयार भारतीय सोच ने 'अहिंसा' और 'सत्याग्रह' पर आधारित गांधी जी के स्वतंत्रता आंदोलन की सफलता के लिए आधार मुहैया कराया।
स्वामी विवेकानंद ने आध्यात्मिकता को विविधता से भरे भारत के सभी धार्मिक तत्वों के समन्वय बिन्दु के रूप में देखा, जो राष्ट्रीय धारा को एकजुट करने में समर्थ था। स्वामी विवेकानंद की तरह, अरविन्दो घोष और महात्मा गांधी ने भी महसूस किया कि धर्म और आध्यात्मिकता भारतीयों की रगों में बसी है और उन्होंने धर्म और आध्यात्मिकता की ताकत को जागृत करने के जरिये भारत की समग्रता के लिए काम किया।
साल 1893 में शिकागो में दिए गए भाषण ने उन्हें विश्व धर्म संसद में सबसे बड़ा व्यक्तित्व और भारत को धर्म की जननी के रूप में स्थापित किया। स्वामी विवेकानंद ने 'विश्व की सबसे प्राचीन कोटि के संत, वैदिक व्यवस्था के संन्यासी, ऐसे धर्म जिसने विश्व को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति दोनों का पाठ-पढ़ाया' की तरफ से दुनिया के युवाओं का स्वागत करते हुए 'शिव महिमा स्रोतम्' के दो व्याख्यात्मक अवतरणों को उदृत किया। 'जिस प्रकार विभिन्न स्थानों से निकलने वाली अलग-अलग जलधाराएं अपने जल को समुद्र में समाहृत कर लेती हैं, इसी प्रकार हे ईश्वर, विभिन्न प्रवृत्तियों के माध्यम से लोग जिन विभिन्न रास्तों का अनुसरण करते हैं, चाहे वे सीधी हों या टेढ़ी-मेढ़ी सब मुझमें मिल जाती हैं' और 'जो कोई, जिस किसी रूप में मेरे पास आता है, मैं उसके पास पहुंचता हूं; सभी मनुष्य विभिन्न रास्तों के लिए संघर्ष कर रहे है, जो अंत में मुझमें मिल जाती हैं'।
उनका भाषण भले ही छोटा था, लेकिन इसने संसद की सार्वभौमिकता की भावना और आशय को स्वर दिया। संसद में दिए गए उनके और अन्य भाषण में सार्वभौमिकता का समान विषय रहा, जिसमें धार्मिक सहिष्णुता पर जोर दिया गया।
21वीं सदी की शुरुआत से ही विश्व अराजक स्थिति का सामना कर रहा है और एक प्रकार के संक्रमण काल से गुजर रहा है। मानव इतिहास की इस बेला में सार्वभौमिक भाईचारे और सद्भावना के आधार पर राष्ट्र और विश्व के आध्यात्मिक एकीकरण को बढ़ावा देने वाले स्वामी विवेकानंद का संदेश और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। उनके संदेशों में व्यक्तियों व राष्ट्रों का शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व सुनिश्चित करते हुए युद्धों को टाल सकने की क्षमता है।





