घूंघट की घुटन से मुक्ति, खामोश बगावत की आहट...


उत्तर प्रदेश के प्रयागराज ज़िले के एक छोटे से गांव की धूलभरी गलियों में, एक 18 वर्ष की लड़की सुनीता रानी, दुल्हन बनकर आई। चेहरा लाल घूंघट में ढका हुआ था। स्कूल की दहलीज़ अभी पीछे छूटी ही थी कि वह एक ऐसी दुनिया में दाख़िल हो गई, जहां रिवायत का मतलब था, ख़ामोशी और ओझल रहना। उस सुबह किसी ने उसका चेहरा नहीं देखा, बस घूंघट देखा गया। वही उसकी पहचान बन गया। उसका नाम मिटकर “बहू” हो गया, सर ढका रहे, नज़रें झुकी रहें और ज़ुबान बंद।

घूंघट सिर्फ़ कपड़ा नहीं था, हुक्म था, न देखो, न बोलो, न इजाज़त के बिना बाहर निकलो। इसे ‘मर्यादा’ कहा जाता था। उसके  लिए यह घूंघट की घुटन थी। हंसी भी क़ायदे में बंधी थी। मर्द बोलते थे, औरतें सिर्फ सुनती थीं।

यह घूंघट सिर्फ़ चेहरा नहीं छुपाता था बल्कि पहचान भी मिटा देता था। शादियों में दुल्हनें एक-सी लगती थीं। भीड़ में औरतें रास्ता खो देती थीं, कभी-कभी ख़ुद को भी। ऐसे में अजीब-क़िस्से जन्म लेते, किसी ने घूंघट न करने पर बीवी को तलाक़ दे दिया, कोई घूंघट में ग़लत बस में बैठकर दूसरे गांव पहुंच गई। इन क़िस्सों को “संस्कृति” कहकर टाल दिया जाता, लेकिन इनके पीछे एक गहरी त्रासदी छुपी थी। सुनीता को स्कूल की बेंच और ब्लैकबोर्ड याद आते थे, जहां मास्टरजी उसे “तेज़ समझदार” कहते थे। वह चिंगारी अब भी ज़िंदा थी।

इतिहास बताता है कि घूंघट कोई सनातन हिंदू परंपरा नहीं, बल्कि उधार ली गई रिवायत है। प्राचीन भारत की मूर्तियों और ग्रंथों में महिलाएं बिना घूंघट के दिखाई देती हैं, ख़ासकर दक्षिण और पूर्व भारत में। माना जाता है कि सातवीं सदी में फ़ारसी असर और बाद में मुग़ल दौर में यह रिवायत मज़बूत हुई। कुछ क्षेत्रों में इसे शान और हैसियत का निशान माना गया जो धीरे-धीरे पितृसत्ता का औज़ार बन गया। परिवार की “इज़्ज़त” के नाम पर यह औरतों की आज़ादी पर ताला बन गया, जिसे समाज सुधारकों ने ज़ुल्म कहा।

महात्मा गांधी ने पर्दा प्रथा को “अमानवीय और अनैतिक” बताया और लिखा कि यह स्वराज के रास्ते में रुकावट है। समाजवादी चिंतक डॉ राम मनोहर लोहिया ने भी घूंघट को पिछड़ेपन की निशानी बताते हुए इसके ख़ात्मे की मांग की। फिर भी यह चलन ज़िंदा रहा, क्योंकि ख़ामोशी से ताक़त को फ़ायदा होता है।

सुनीता की ज़िंदगी में पहला मोड़ तालीम से आया। ताने मिले, “ज़्यादा पढ़-लिखकर क्या करेगी?” लेकिन उसने पढ़ाई पूरी की। फिर 2018 में वह आशा कार्यकर्ता बनी। शुरुआत में घूंघट में ही वह घर-घर जाकर टीकाकरण, पोषण और सुरक्षित डिलीवरी की बात समझाने लगी। औरतें उसकी बात सुनती थीं, क्योंकि वह उन्हीं में से एक थी।

धीरे-धीरे घूंघट सरकने लगा, पहले मीटिंग में, फिर रास्ते में, और आख़िरकार घर में। कोई नारा नहीं, कोई शोर नहीं, बस ख़ामोश हौसला। डॉक्टरों से बात करना, रजिस्टर भरना, सवालों के जवाब देना, सब उसने सीखा। इल्म से हिम्मत आई, काम से इज़्ज़त मिली, और कमाई से आवाज़। गांव ने यह बदलाव देखा। जो बुज़ुर्ग पहले डांटते थे, अब सेहत के लिए उससे मशविरा लेने लगे। जो औरतें हंसती थीं, वे भी अपना घूंघट ढीला करने लगीं, बग़ावत में नहीं, सुकून में।

देशभर के सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन शहरों में यह चलन कम हो रहा है। महिला केंद्रित योजनाओं ने लाखों ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया है। भारतीय सिनेमा ने भी घूंघट पर सवाल उठाए हैं। ‘पाकीज़ा’ और ‘उमराव जान’ जैसी फ़िल्मों में घूंघट में क़ैद औरतों की तन्हाई दिखी। हाल की फ़िल्म ‘लापता लेडीज़’ में एक-से घूंघट की वजह से दो दुल्हनों का अदला-बदली होना, इस रिवायत की बेवक़ूफ़ी को हंसी में उजागर करता है।

आज तमाम शिक्षित महिलाएं बिना घूंघट चल रही हैं। उनकी चाल में भरोसा है। आंखों में चमक, उत्साह है। बच्चे उनका चेहरा देखते हैं, बेटियां घूंघट से परे सपने देखती हैं। घूंघट अब भी कई घरों में टंगा है, इज़्ज़त के नाम पर। लेकिन, सुनीता, आशा, रानी, देवी जैसी युवा महिलाओं की कहानियां इस प्रथा की गिरफ़्त ढीली कर रही हैं। बदलाव शोर से नहीं आता, आहिस्ता, हौले-हौले आता है, शिक्षा से, कानून से, सोशल मीडिया से। जब कोई औरत अपना घूंघट उठाती है और ग़ायब होने से इंकार कर देती है, तब एक नई सुबह की शुरुआत होती है।



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